साहित्य की दुनिया में मानवीय पीड़ा और मृत्युबोध एक ऐसा विषय है जो भाषाओं और सरहदों से परे है। इसी कड़ी में इस सप्ताह की चर्चित कविता (पोयम ऑफ द वीक) ब्रिस्टल में जन्मे कवि थॉमस लवेल बेडोस (1803-1849) की ‘ड्रीम-पेडलरी’ (Dream-Pedlary) है। 19वीं सदी की यह रचना शुरुआत में भले ही एक कल्पनाशील कौतूहल जगाती है, लेकिन धीरे-धीरे यह मृत्यु और नश्वरता की गहरी खाइयों में उतर जाती है। दिलचस्प बात यह है कि बेडोस जिस दर्द और ‘मुक्ति’ की बात करते हैं, उसका एक बेहद सशक्त प्रतिबिंब हमें भारतीय उपमहाद्वीप की शायरी में भी देखने को मिलता है।
सपनों का सौदागर और मृत्यु का गीत
कैरल रूमेंस अपने विश्लेषण में बताती हैं कि ‘ड्रीम-पेडलरी’ बेडोस की संभवतः सबसे बेहतरीन और संकलित की जाने वाली गीत-रचना है। कविता एक प्रश्न से शुरू होती है—”अगर सपने बिकाऊ होते, तो आप क्या खरीदते?” यह सवाल पाठक से सीधे संवाद करता है। यहाँ कुछ सपनों की कीमत महज एक ‘आह’ है, तो कुछ के लिए मृत्यु की घंटी (पासिंग बेल) चुकानी पड़ती है। जीवन के ताजे मुकुट से केवल एक गुलाब की पत्ती गिरने जैसा यह सौदा सुनने में जितना रूमानी लगता है, असल में उतना ही गंभीर है।
कविता के दूसरे हिस्से में कवि का स्वर बदल जाता है। वह पाठकों से मुखातिब होने के बजाय अपने भीतर झांकने लगता है। वह एक एकांत कुटिया और छायादार कुंजों की कामना करता है ताकि वह अपने दुखों को शांत कर सके। लेकिन असली वेदना तब सामने आती है जब वह ‘भूतों’ (बिछड़े हुए प्रियजनों) को जगाने की बात करता है। वह अपने खोए हुए बेटे (loved long-lost boy) को वापस बुलाना चाहता है ताकि वह उसे उसकी खुशी तक ले जा सके। मगर कड़वा सच यही है कि मृत्यु से परे कोई रास्ता नहीं जाता और कोई भी पुकार वहां तक नहीं पहुंचती।
तकनीकी शिल्प और संवेदना
आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो इस कविता का संगीत इसे पन्नों से उठाकर सीधे पाठक के जेहन में उतार देता है। इसकी लयबद्धता में उतार-चढ़ाव हैं—कभी यह डैक्टिलिक मीटर में चलती है तो कभी आयंबिक में, जो इसे एक विशेष प्रभाव देता है। “इफ देयर वर ड्रीम्स टू सेल” (If there were dreams to sell) पंक्ति का दोहराव और अंत्यानुप्रास (Rhyme Scheme) का सधा हुआ प्रयोग कविता की उदासी को गहरा करता है। बेडोस का यह मानना कि “जीवन एक सपना है और जागना ही मृत्यु है,” एक दार्शनिक ऊंचाई को छूता है।
भारतीय शायरी में दर्द का अक्स
बेडोस की यह पीड़ा भारतीय जनमानस के लिए अजनबी नहीं है। हमारे शायरों ने दर्द, जुदाई और गम को जितनी शिद्दत से बयां किया है, वह ‘ड्रीम-पेडलरी’ के भावों के समानांतर चलता है। जहां बेडोस सपनों के जरिए दुखों से बचना चाहते हैं, वहीं साहिर लुधियानवी उस मकाम का जिक्र करते हैं जहां, “ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ, मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया।” यह वही सुन्न कर देने वाली अवस्था है जिसकी तलाश पश्चिमी कवि भी कर रहा है।
जुदाई का दर्द और उसका प्रभाव गोपालदास नीरज की इन पंक्तियों में साफ झलकता है—”मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा, मैं रहूँ भूका तो तुझ से भी न खाया जाए।” यह आत्मीयता का वह स्तर है जहां प्रेमी और प्रेमिका का दर्द साझा हो जाता है। वहीं, अहमद फ़राज़ जुदाई की निरंतरता पर चोट करते हुए लिखते हैं, “इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की, आज पहली बार उस से मैं ने बेवफ़ाई की।” यहां बेवफाई भी एक तरह से दर्द से मुक्ति का प्रयास है।
जीवन, मृत्यु और मुक्ति की चाह
बेडोस अपनी कविता के अंत में निष्कर्ष निकालते हैं कि अगर प्रियजनों से मिलना है, तो खुद भी गुलाब की पत्ती की तरह गिरकर मरना होगा—यानी हमेशा के लिए सो जाना होगा। यह विचार मिर्ज़ा ग़ालिब के उस फलसफे से कितना मेल खाता है, जहां वे कहते हैं: “क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं, मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ।” ग़ालिब भी यही मानते हैं कि जीवन की कैद और गम की कैद एक ही है, और इससे रिहाई केवल मौत में है।
दुख बांटने की बात गनी एजाज़ करते हैं (“आओ दुख दर्द बाँट लें ‘एजाज़'”), लेकिन हकीकत यह है कि दर्द एक निजी अनुभव बनकर रह जाता है। जलील मानिकपूरी सही फरमाते हैं कि “हाल तुम सुन लो मिरा देख लो सूरत मेरी, दर्द वो चीज़ नहीं है कि दिखाए कोई।” अंततः, चाहे वह बेडोस हों या फरहत एहसास, हर कवि उस परम शांति की तलाश में है जो नींद या मृत्यु में ही संभव है। फरहत एहसास की ये पंक्तियां बेडोस की भावना का सटीक अनुवाद लगती हैं: “मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं, फिर उस के बाद गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं।”
सिदरा सहर इमरान की पंक्तियाँ, “प्यास बुझाने आते हैं दुख दर्द परिंदे रात गए,” इस बात की तस्दीक करती हैं कि दुख और सपने (ख्वाब) एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो आंखों में एक चश्मे की तरह जारी है। साहित्य का यह तुलनात्मक अध्ययन हमें बताता है कि भाषाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन मनुष्य के आंसुओं और उसकी पीड़ा का रंग हर जगह एक जैसा है।