सोमवार, 30 मार्च 2020 | 12:28 IST
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आखिर क्यों राजनीति की बलि चढ़ते जा रहे हैं गांव ?


आखिर क्यों राजनीति की बलि चड़ते जा रहे है गांव ?

श्रवण सेमवाल 

पहाड़ों की दिलकश चोटियां और खुबसूरत वादियां भले ही सैलानियों को किसी स्वर्ग सरीखा एहसास कराती हों लेकिन कुदरत के इन खूबसूरत नजारों के बीच रोजमर्रा की जिंदगी इतनी मुश्किल है कि यहां के लोग किसी भी तरह वहां से बाहर निकलने की राह तलाशते ही नजर आते हैं। पहाड़ों के बारे में एक कहावत मशहूर है कि पहाड़ का पानी और की जवानी कभी वहां के काम नहीं आती। रोजगार को लेकर रोटी की डूढ़ में मौकों को तरासती आज की पीढ़ी के लिए, शिक्षा की समुचित व्यवस्था का अभाव और खेती में आने वाली मुश्किलों ने हमेशा से यहां के लोगों को अपनी जड़ों को छोडऩे के लिए मजबूर किया है। उत्तराखंड में पलायन अब इस हद तक पहुंच गया है कि यहां के गांव तेजी से वीरान होते जा रहे हैं। सरकार ने भी माना है कि पहाड़ों में गैर आबाद गांवों की संख्या 1,059 तक पहुंच गई है। गैर आबाद गांवों का मतलब है ऐसे गांव जहां अब कोई भी नहीं बचा है, भले ही गांव के पलायन को लेकर सरकार अपनी योजनाओं का कितना ही डिढोरा क्यों ने पीट ले पर सच्चाई यह है कि उत्तराखंड के गांव पलायन के कारण आज खंडहर बन चुके है। सच्चाई यह भी है कि जो लोग गांव में रह रहे है वह वे लोग है जो मजदूरी की बेबस पीढ़ा को सहते हुए इस आस में रूके है कि कभी तो सरकार को उन पर तरस आएगा। तभी तो वीरान पड़ी वह घाटिया सरकार को एहसास कराऐगी कि उत्तराखंड गांव का प्रदेश है शहरो का नही। पलायन से सूनी पड़ी उस मां की आश आज भी के बेटे का वह बचपन कराती है कि बेटे के वह शब्द की मां मैं गांव के लिए काम करूगा और गांव के लिए मरूगा। लेकिन यह क्या अलग राज्य के बाद तो पहाड़ के गांव पलायन से पिघल गये। युवा सरकार के सामने बेराजगारी के गीत गाता रहा औऱ सरकार पक्ष-विपक्ष की राजनीति में अपनी योजनाएं गिनाता रहा जब युवा की किसी ने नही सुनी तो उसने पहाड़ ही नही देश से ही पलायन करन में अपनी भलाई समझी । आकड़े बताते है कि विदेशों में सबसे ज्यादा होटलो में उत्तराखंड का युवा काम करता है। जहां तक पलायन की बात है, साल 2000 में उत्तराखंड अलग राज्य बनने के बाद गांवों से पलायन में और तेजी आई है, 2001 और 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर नजर डालें तो राज्य के 75 प्रतिशत गांव पलायन की वजह से खाली होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। जनसंख्या के आंकड़े दर्शाते हैं कि 2001 से 2011 के बीच उत्तराखंड की आबादी 19.17 प्रतिशत बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह वृद्धि सिर्फ 11.34 प्रतिशत है जबकि शहरी क्षेत्रों में 41.86 प्रतिशत रही। यह आकंड़ा राज्य बनने के तुरंत बाद का है लेकिन आज तो पलायन ने और भी भयानक रुप ले लिया है। युवाओं का पलायन बढ़ जाने से राज्य के पहाड़ी जिलों का निर्भरता अनुपात 1:1.34 हो गया है. इसका अर्थ है कि गांवों में सौ युवाओं के मुकाबले 134 वृद्ध हैं। आज भी गांव में परिवहन, पेयजल, बिजली, शिक्षा,और  चिकित्सा  गांव में नही पहुच पायी है। तकनीकी के इस दौर में भी गांव के बीमार व्यक्ति को इंटरपास क्लीनीकर से संतुष्ट होना पड़ रहा है और वह भी तब जब देश की मोदी सरकार गांव, किसान के साथ डिजिटल भारत की बात करते है।   आज भी उत्तराखंड में 5,000 से ज्यादा गांव सड़कों से जुड़ नहीं पाए हैं। राज्य की सरकार कहती है कि हमारी सरकार गांव के विकास के लिए तत्पर है। अगर गांवो का विकास हो रहा है तो प्रदेश की यह दहकती तस्वीर कैसी । उत्तराखंड की क्षैत्रीय पार्टी ते नेता काशी सिंह ऐरी कहते हैं, ''राज्य के गठन के बाद से लगभग 20 लाख लोग राज्य से पलायन कर चुके हैं। यह हालत तब थी जब 2013 की आपदा नहीं आई थी आपदा के बाद तो पलायन और अधिक बढ़ा है. इसी मसले पर बीजेपी नेता मुन्ना सिंह चौहान कहते हैं, 'कि 'यूपी से अलग होने के डेढ़ दशक बाद भी हम अपने विकास का खाका ही नहीं खींच सके, ऐसे में युवा पलायन नहीं करेगा तो क्या करेगा?  उसे न रोजगार मिल रहा है और न संसाधनों में हिस्सा. युवाओं की कोई जरूरत पूरी नहीं हो रही है यही कारण है कि पहाड़ का पानी और जवानी वहां के काम नही आ रही है। पलायन से पहाड़ का सिर्फ सामाजिक संतुलन ही नहीं, राजनैतिक संतुलन भी गड़बड़ा गया है। 2001 की जनगणना के आधार पर 2006 में हुए राज्य परिसीमन के तहत पहाड़ की 40 विधानसभा सीटों में से 6 सीटें जनसंख्या की कमी के चलते काट दी गईं, और यह 6 सीटें मैदानी क्षेत्र में बढ़ा दी गईं। इस तरह अब पहाड़ में सिर्फ 34 सीटें रह गईं और मैदान में 36 सीटें हो चुकी हैं, जबकि देखा जाए तो 9 जिले पहाड़ में आते हैं कुल चार जिले ही मैदान के लिए परिसीमित थे। 



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