रविवार, 21 जुलाई 2019 | 08:50 IST
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ढलती उम्र की ढलान का सहारा आखिर कौन बनेगा, कौन समझेगा पलायन के इस दर्द को


जिंदगी की उलझनों में, वो इतने उलझ गए, सदिया बीत गई, उम्र ढ़लती गई, कब जवां हुए कुछ पता ही नहीं चला, आज पलटकर देखा, अपने बीते दिन को, तो पता चला कि आखिर बचपन कहां खो गया।  जीवन की कश्मकश में आज बच्चों का उनसे बचपन ही छीन लिया। प्रतिस्पर्दा की अंधी दौड़ में बच्चे खेलना ही भूल गए।

किसी ने क्या खूब कहा है। बचपन हर गम से बेगाना होता है। जिसमें न तो किसी के लिए कोई ईष्या होती है, और ही किसी को धोखा देने की भावना। जिंदगी में जब भी हम मुसीबतों से घिरे होते है अपने बचपन के उन दिनों को याद करते हैं जब सिर्फ और सिर्फ मौज मस्ती का ही आलम होता था। कितने प्यारे थे वो दिन जब दादी कहानी सुनाया करती थी । जब हमें चोट लगती थी तो मां बड़े ही प्यार से मरहम लगाया करती थी। लेकिन जैसे- जैसे बड़े हुए बचपन भी खोता चला गया। वक्त बीतता गया कब जवानी आई और कब बूढ़ापा , पता ही नहीं चला। मां की वो बचपन की मार आज जीवन की कसौटी पर खरा उतारती है। आज प्रतिस्पर्धा इतनी बड़ गई है कि खेलने की उम्र में बच्चों के कांधों पर करियर बनाने के नाम पर किताबो का बोझ डाल दिया जाता है। वो नन्हा और मासूम मन कितना चंचल , निर्डर था जो कुछ भी करने की हिम्मत रखता था। यहीं नही आज का बचपन सिर्फ एक इलेक्ट्रोनिक डिवाइस पर निर्भर रह गया है। जिसका परिणाम और भी खतरनाक रूप में सामने आ रहा है। आज बच्चे अपना बचपन एक ही कमरे के अंदर मोबाइल पर गेम खेलकर बिता रहे है। इस दौड़ भरी दुनिया की भीड़ में बचपन एक कमरे में सिमट कर रह गया है। अब माता-पिता सोचते हैं कहीं उनके बच्चे के कपड़े गंदे तो नहीं हुए, बच्चा मिट्टी में तो नहीं खेल रहा । लेकिन वो पुराना दौर कितना अच्छा था। जब बच्चे घर के बाहर मिट्टी में खेलते थे और मिट्टी के छोटे- छोटे घर बनाया करते थे। उस मिट्टी के छोटे से घर में वे अपनी जिंदगी देख लिया करते थे। वो गुड़िया और गुड्डों का खेल बच्चों में खेल –खेल में लड़ाई होना और फिर सब कुछ भूलकर एक साथ खेलना। इस बदलती दुनिया में जैसे बचपन भी कहीं बदल गया है। बच्चे आज बचपन से दूर इंटरनेट जैसी बंद तकनीक चीजों से ज्यादा जुड़ रहे है जहां उनका साथी या तो स्मार्ट फोन है या बंद कमरे का कंम्पूटर जिससे उनका बचपन कहीं न कहीं खत्म होता जा रहा ।      

 



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