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कुमाऊं की कत्यूर घाटी- जहां आज भी स्वर्णिम इतिहास दिखता है


बागेश्वर की कत्यूर घाटी से पहाड़ों के बीच सूरज देवता के दर्शन। ये सूरज इन ठंडे पहाड़ों में जीवन की बौछार करता है। गोमती और सरयू नदी के बीच फैले 150 वर्ग किलोमीटर के इलाके को कत्यूर घाटी के नाम से जाना जाता रहा है, जिसमें करीब 200 गांव शामिल होते हैं। अल्मोड़ा में कौसानी से आगे हरछीना से कत्यूर की शुरुआत होती है। गोमती नदी के प्रवाह क्षेत्र में बसा यह परगना तीन पट्टियों में बंटा हुआ है— मल्ला, बिचला और तल्ला कत्यूर। जब कत्यूर शासक अपनी राजधानी को जोशीमठ से बैजनाथ लाए थे, तभी से कत्यूर घाटी का ऐतिहासिक महत्व बढ़ गया। आज भी सेलीहाट, तैलीहाट, रणचूलाकोट, गढ़सेर और झाली-माली के रूप में इस राजधानी के खंडहर मौजूद हैं। मूल रूप से खश प्रजाति वाले कत्यूर वंश का सबसे शक्तिशाली राजा ललितशूरदेव था, जिसका शासन काली कुमाऊँ तक फैला हुआ था। कहते हैं कि इसने यहाँ की सभी पुरातन जनजातियों—किरात, नाग, दैत्य, दानव, चाण्डाल आदि को अपने अधीन कर लिया था। पता चलता है कि कत्यूरी बड़े पराक्रमी, कला प्रेमी और विद्वानों का आदर करने वाले हुआ करते थे. इनका राज्य इस पर्वतीय क्षेत्र का स्वर्णिम काल हुआ करता था।

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