रविवार, 21 जुलाई 2019 | 08:43 IST
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देश के अंतिम गांव माणा की जेठ पुजाई


  उत्तराखंड अपनी संस्कृति के लिए मशहूर हैं और अपने मेलों के लिए प्रसिद्ध है| राज्य में वर्ष भर मेलों में बहार रहती है| मेले सामाजिक मेल मिलाप का केंद्र होते हैं और हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा भी हैं। इसी लिए उत्तराखंड को मेलों ,संस्कृति और विचारों का  मिलन स्थल माना जाता  है। ऐसी ही एक मेला इन दिनों देश के अंतिम गांव माणा में चल रहा है। आज हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों मनाया जाता हैं जेठ पुजाई मेला।

देश के अंतिम गांव माणा में आयोजित हुई जेठ पुजाई मेले में स्थानीय लोगों के साथ देश-विदेश के यात्रियों ने भी भगवान घंटाकर्ण के दर्शन किए और भगवान घंटाकर्ण से देश में सुख-शांति-सतुष्टि के लिए प्रार्थना की। आइए हम आपको बताते हैं कि जेठ पुजाई क्या है।

सीमांत गांव माणा में पौराणिक परंपरा अनुसार प्रतिवर्ष जेठ पुजाई धार्मिक उत्सव का आयोजन होता है। जेष्ठ मास की संक्राति को भगवान घंटाकर्ण अपने शीतकालीन प्रवास स्थल से मेल मंदिर मे पहुंचते है। इस दिन पूरे दिन विशेष पूजाओं का अयोजन होता है। इस प्रकार की पूजाएं 15 जून से 15 नवम्बर तक चलती है। इसके बाद 15 नवबर को पूरे विधि-विधान व धार्मिक परंपराओ के साथ भगवान घंटाकर्ण पुनः अपने शीतकालीन प्रवास पर विराजमान हो जाते है। भगवान घंटाकर्ण के अपने मूल मंदिर में प्रवेश उत्सव को ही जेठ पुजाई कहा जाता है। 
जेठ पुजाई धार्मिक उत्सव को मेले का स्वरूप देने की शुरूआत वर्ष 2014 में हुई थी। वर्ष 2013 केदार आपदा के बाद तीर्थ यात्रियों व सैलानियों की संख्या भी कम होती गई। देश के अंतिम गांव में रौनक पहले जैसे बन पाए। इसके लिए माणा गांव के जागरूक नागरिको के साथ ही माणा गांव के देश-विदेश में उच्च पदों पर सेवानृवित वासियों ने इस धार्मिक उत्सव को मेले का स्वरूप देने का फैसला किया,और वर्ष 2014 में इसकी शुरूआत की गई।

जिसके बाद जेठ पुजाई उत्सव को तीन दिन के मेले का स्वरूप दिया गया। इस पुजाई में उत्तराखंड के नामी कलाकारों को आंमत्रित कर मेले के माध्यम से आपदा से उबरने का सफल प्रयास किया गया। 
 



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