शुक्रवार, 7 अगस्त 2020 | 09:01 IST
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आज की नहीं उत्तराखंड की संस्कृति?


सरदार पटेल के दिमाग में कुमाऊं-गढ़वाल का भूगोल बैठ गया था, पर तब देश की दौलत उन्हें इजाजत नहीं दे रही थी। पं. विजया लक्ष्मी पंडित जब-जब खाड़ी इस्टेट अल्मोड़ा आती थीं, उन्हें कुमाऊं की चिंता सताती थी। पं नेहरू अल्मोड़ा-जेल के अपने बंद कमरे से कुछ क्षणों के लिए अपनी खुर्पी के साथ जब कारागार-प्रांगण में श्रमरत रहते थे, उन्हें अल्मोड़े के अपने अलग अंदाज का ‘‘चैमासा’’ यहां की कुछ खासियत बताता था, और जब-जब वे खाड़ी इस्टेट में अपनी राजनीतिक गतिविधियों से थककर, विश्राम के कुछ दिन बिताना चाहते थे, उन्हें कुमाऊं का वैशिष्ट्य कुछ सोचने के लिए विवश कर देता था। उनके पिताजी पं. मोतीलाल नेहरू ‘इंडिपेंडेट’ पत्र में कार्यरत काली-कुमाऊं-केसरी हर्ष देव ओली को उत्तराखण्ड का पंडित कहकर उनके प्रति सम्मान का भाव रखते थे। पं. गोविंद बल्लभ पंत ने तराई-भाबर को कृषि-पात्र बनाते हुए अलग उत्तराखण्ड का भाव संजोया था। इंदिरा गांधी ने 1980 में बागेश्वर में आम सभा में इस क्षेत्र के प्रति अपने पूर्वजों एवं अपने लगाव को ध्वनित किया था, और पं. नारायण दत्त तिवारी ने ‘‘इंदिरा माता खुश छन’’ कह कर जनता का मनोबल बढ़ाया था, और डॉ.. देवी दत्त पंत, प्रख्यात भौतिकविद्, शिक्षा-निदेशक उ.प्र. व प्रथम कुलपति कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल ने लखनऊ में रहकर अलग उत्तराखण्ड के जन्म का स्वप्न देख लिया था, जिसकी अभिव्यक्ति अपने एम.पी. के चुनाव में उन्होंने बागेश्वर में की थी। कहने का आशय यह है कि साहित्य, संस्कृति व कला के क्षेत्र में, या फिर किसी भी अन्य जाने-माने प्रसंग में उत्तराखण्ड की अपनी अलग पहचान कायम करने में ये अठारह वर्ष अलग से अपनी कोई भूमिका नहीं निभाते हैं, वरन् परम्परा के अनुरूप ही प्रत्येक क्षेत्र में अपनी अस्मिता की संवृद्धि में आगे आए हैं। तथापि, हमें अपने नए राज्य के प्रारंभिक अठारह वर्षों का ऋषिवत् स्वागत करना चाहिए। आम जनता ने नवागत चैतन्य के परिप्रेक्ष्य में कहीं-न-कहीं, कुछ-न-कुछ अवश्य किया होगा। अष्टादश अंक का विगत अठारह वर्षों में कुमाउंनी व गढ़वाली साहित्य के क्षेत्र में निश्चित रूप से क्रांति आई है। अपनी दुधबोलि में साहित्यकारों ने अपने भावों का प्रस्फुटन किया है। यद्यपि कुमांउ नी और गढ़वाली की सभी ध्वनियों को समेटने में देवनागरी लिपि के चिह्न अपर्याप्त हैं, फिर भी लेखकों ने अपने धर्म से विरत नहीं होना चाहिए। लोकोक्तियों और लोक-कथानकों के सूत्रों के सहारे अनेक कुमाउंनी व गढ़वाली कविताएं साहित्य के क्षेत्र में आई हैं। मनोरंजन एवं शिक्षाप्रद लोकथायें उत्तराखण्डवासियों को खूब पसंद हैं। विशेष रूप से उत्तराखण्ड से बाहर रहने वाले कुमाउंनी व गढ़वाली यहां के लोकसाहित्य के माध्यम से अपनी जमीन की सुगंध प्राप्त कर लेते हैं।

 



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