शनिवार, 24 अगस्त 2019 | 04:23 IST
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तीन तलाक विधेयक पारित होने पर मुस्लिम महिलाओं ने किया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रिया अदा


बीते कई दिनों से राष्ट्रीय मुद्दा बना ट्रिपल तलाक़ अब एक इतिहास भी बन गया। इस परंपरा को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाला विधेयक करीब चार घंटे की बहस के बाद मंगलवार को राज्यसभा में पास हो गया। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इसे सदन में पेश किया था। इस दौरान गर्मागर्म बहस हुई और जेडीयू, अन्नाद्रमुक ने सदन से वाकआउट किया। जिसके बाद लोकसभा के बाद मंगलवार को राज्यसभा में भी तत्काल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) बिल पास हो गया। इस बिल के पास होने के बाद पीड़िताओं और अन्य मुस्लिम महिलाओं ने देश भर में जश्न मनाया। पीड़ित मुस्लिम महिलाओं ने कहा, जिंदगी में आया नया सवेरा इसके लिए हम देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का शुक्रिय अदा करते है। क्योंकि उनके वजह से हम आज ‘‘सशक्त’’ महसूस कर रही हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने इस विधेयक को महिलाओं के प्रति न्‍याय की जीत बताया। प्रधानमंत्री ने अपने कई ट्वीट के जरिए विधेयक के पारित होने को नारी की जीत बताते हुए कहा कि इससे समाज में  समानता को बढ़ावा मिलेगा। उन्‍होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं के प्रति ऐतिहासिक रूप से चली आ रही गलती में सुधार कर लिया गया है।  प्रधानमंत्री ने कहा कि इससे आदिम और मध्‍य कालीन प्रथा को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया गया है।

श्री मोदी ने कहा कि यह उन मुस्लिम महिलाओं के अनोखे साहस को नमन करने का अवसर है जिन्‍होंने तीन तलाक की वजह से बहुत अन्‍याय झेले हैं। इस विधेयक को राष्‍ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद एक बार में तीन तलाक की प्रथा निष्क्रिय और अवैध होने के साथ संज्ञेय अपराध बन जाएगी। विधेयक के अंतर्गत पीडित मुस्लिम महिलाओं और उनपर निर्भर बच्‍चों के लिए भत्‍ता दिए जाने का प्रावधान भी है। जिस विवाहिता मुस्लिम महिला को तलाक दिया जाता है, अगर वह मजिस्‍ट्रेट से मुकदमा वापस लेने का अनुरोध करती है और मजिस्‍ट्रेट उसे स्‍वीकृति दे देता है तो मुकदमा वापस लिया जा सकता है।

तीन तलाक बिल के पारित होने के बाद देश भर में मुस्लिम महिलाओं के जश्न मनाया। तो कई महिला संगठनों ने इस बिल के पारित होने पर खुशी जताई। ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने कहा कि यह महिलाओं की जीत है। मुस्लिम महिलाओं को सम्मान से जीने का अधिकार मिलेगा। हिंदू मैरिज एक्ट की तर्ज पर ही मुस्लिम मैरिज एक्ट बनना चाहिए। कानून ऐसा हो, जिसमें पति-पत्नी के बीच सुलह की गुंजाइश बनी रहे। मुस्लिम महिलाओं से भी उनकी राय ली जाए। अल्पसंख्यक आयोग की सदस्य रुमाना सिद्दीकी ने कहा कि अब पति तीन तलाक देना तो दूर, सोचेंगे तक नहीं। संसद में बिल पास होने से मुस्लिम महिलाओं को सिक्योरिटी मिलेगी।

क्या था शाहबानो केस
दरअसल, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो 5 बच्चों की मां थीं। उनके शौहर ने सन् 1978 में ही तलाक़-तलाक़-तलाक़ कहते हुए उनसे पत्नी का दर्जा छीन लिया था। मुस्लिम पारिवारिक क़ानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ऐसा कर सकता है। अपनी और बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाहबानो पति से गुज़ारा लेने के लिए अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही 7 साल गुज़र गए।

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फ़ैसला दिया जो हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए लेकिन तब भी रूढ़िवादी मुसलमानों को कोर्ट का फ़ैसला मजहब में हस्तक्षेप लगा।

जाहिर है असुरक्षा की भावना के चलते उन्होंने इसका विरोध किया। लिहाज़ा, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी मांगें मान लीं और इसे धर्म-निरपेक्षता की मिसाल के रूप में पेश किया। तब सरकार के पास 415 लोकसभा सांसदों का बंपर बहुमत था, लिहाज़ा, मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून 1986 में आसानी से पास हो गया।

क्या लिखा है इस कानून में?  
मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून के अनुसार जब मुसलमान त़लाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुज़ारा नहीं कर सके तो कोर्ट उन संबंधियों को उसे गुज़ारा देने का आदेश दे सकता है जो मुस्लिम क़ानून के अनुसार उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। परंतु, ऐसे रिश्तेदार अगर नहीं हैं अथवा गुज़ारा देने की स्थिति में नहीं हैं, तो कोर्ट प्रदेश वक्फ़ बोर्ड को गुज़ारा देने का आदेश देगा।

इस प्रकार से मुस्लिम महिला के शौहर के गुज़ारा देने का उत्तरदायित्व और जवाबदेही सीमित कर दी गई। मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून राजीव गांधी के कार्यकाल में एक बदनुमा दाग़ की तरह माना जाता है, क्योंकि कांग्रेस के उस फ़ैसले ने एक मज़लूम मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता पाने से वंचित कर दिया और भविष्य में तलाक़ की विभीषिका झेलने वाली हर मुस्लिम महिला को और ज़्यादा लाचार कर दिया।

दरअसल, उस समय कट्टरपंथी मुसलमानों को छोड़कर हर किसी ने राजीव गांधी की तुष्टिकरण वाली नीति की आलोचना की थी। तत्कालीन सांसद मोहम्मद आरिफ खान ने इसके विरोध में इस्तीफा दे दिया था। वह क़ानून आज भी कांग्रेस के उस असली चरित्र को सामने लाता है, जिसके कारण सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी यह पार्टी विलेन बन गई और आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। उस फ़ैसले को कांग्रेस का राजनैतिक लाभ के लिए अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण का सटीक उदाहरण माना जाता है।

 लेकिन 30 जुलाई 2019 को मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को इस कानून से आज़ादी का रास्ता साफ कर दिया। लोकसभा के बाद मंगलवार को राज्यसभा में भी तत्काल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) बिल पास हो गया। इस बिल के पास होने के बाद पीड़िताओं और अन्य मुस्लिम महिलाओं ने देश भर में जश्न मनाया।



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