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सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार के नोटबन्दी के फैसले पर मुहर क्यों लगाई ?


8 नवंबर, 2016 को मोदी सरकार ने नोटबन्दी का बड़ा फैसला लिया था। इस फैसले के  बाद नोटों को बदलवाने में लोगों को भारी मशक्कत करनी पड़ी थी। तब मोदी सरकार ने देशहित में, आतंकी फंडिग रोकने और करप्शन पर चोट करने के लिए हजार और पांच सौ के नोट बन्द कर दिए थे। नोट बदलने के दौरान देश में लंबी लंबी लाइनें लगी थीं। लाइनों में लगने से कई लोगों की मौत हुई थी। इससे कारोबार पर भी असर पड़ा। विपक्ष ने इस फैसले पर सवाल उठाए थे। बाद में कई रिपोर्ट्स में बताया गया कि नोटबन्दी से देश को कोई फायदा नहीं हुआ। जितना कैश उस समय था, उतना ही बाद में वापस बैंकों में लौट गया। यानी जिन कारणों से नोटबन्दी की गई थी, वो हासिल नहीं हो पाए। लेकिन मोदी सरकार लगातार नोटबन्दी को सही ठहराती रही। कुछ लोग नोटबन्दी के खिलाफ कोर्ट पहुंच गए।  कोर्ट में फैसले को गलत बताते हुए वरिष्ठ वकील चिदंबरम ने तर्क दिया था कि सरकार कानूनी निविदा से संबंधित किसी भी प्रस्ताव को अपने दम पर शुरू नहीं कर सकती है। ये केवल आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर किया जा सकता है।

वहीं, 2016 की नोटबंदी की कवायद पर फिर से विचार करने के शीर्ष अदालत के प्रयास का विरोध करते हुए सरकार ने कहा था कि अदालत ऐसे मामले का फैसला नहीं कर सकती है जब 'घड़ी को पीछे करने' से कोई ठोस राहत नहीं दी जा सकती है।  58 याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने अब फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले 4-1 के बहुमत से फैसले को सही करार दिया। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने इस पर विपक्ष को लताड़ा।

अपने फैसले में पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा है कि यह निर्णय कार्यकारी की आर्थिक नीति होने के कारण उलटा नहीं जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि नोटबंदी से पहले केंद्र और आरबीआई के बीच सलाह-मशविरा हुआ था। इस तरह के उपाय को लाने के लिए दोनों के बीच एक समन्वय था। कोर्ट ने कहा है कि नोटबंदी की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। आरबीआई के पास विमुद्रीकरण लाने की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है और केंद्र और आरबीआई के बीच परामर्श के बाद यह निर्णय लिया गया।

इससे पहले शीर्ष अदालत ने सात दिसंबर को केंद्र और भारतीय रिजर्व बैंक को निर्देश दिया था कि वे 2016 के फैसले से संबंधित सारे रिकॉर्ड उनको सौंपे। इसके बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस पीठ में न्यायमूर्ति बी आर गवई, ए एस बोपन्ना, वी रामसुब्रमण्यन और बी वी नागरत्ना भी शामिल हैं। उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता पी चिदंबरम और श्याम दीवान सहित आरबीआई के वकील और याचिकाकर्ताओं के वकीलों, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी की दलीलें सुनी थीं। इस फैसले से मोदी सरकार को बड़ी राहत दी है। इससे ये भी साफ हो गया है कि सरकार का फैसला सही था।

 

 



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