बुधवार, 20 नवंबर 2019 | 11:49 IST
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जम्मू-कश्मीर, सुप्रीम कोर्ट का दखल देने से इनकार, कहा- मामला संवेदनशील, सरकार को वक्त मिलना चाहिए


जम्‍मू एवं कश्‍मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्‍छेद 370 को अप्रभावी बनाने और राज्‍य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के केंद्र सरकार के फैसले के बाद घाटी में जारी हालात को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट में दो टूक कहा कि वह इस मामले में हस्‍तक्षेप नहीं करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने इस मामले में पर्याप्‍त समय दिया है और वह अब दो सप्‍ताह बाद ही मामले की सुनवाई करेगा।

तहसीन पूनावाला ने यह याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि 5 अगस्‍त को इस फैसले के ऐलान से ठीक एक दिन पहले जम्‍मू-कश्‍मीर में अघोषित कर्फ्यू लगा दिया गया और कई नेताओं को नजरबंद कर दिया गया। उन्‍होंने कश्‍मीर से पाबंदी हटाने और नजरबंद नेताओं की रिहाई के लिए आदेश देने का अनुरोध किया था। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का रुख जानना चाहा। अदालत ने पूछा कि कश्‍मीर में आखिर यह सब कितने दिनों तक चलने वाला है?

 इसके जवाब में अटॉर्नी जनरल ने कहा, 'हम रोजाना हालात की समीक्षा कर रहे हैं। यह बेहद संवेदनशील मसला है और सभी के हित में है।' उन्‍होंने इस दौरान यह भी कहा कि कश्‍मीर में खून का एक कतरा भी नहीं बहा है और न ही किसी की जान गई है। इस पर शीर्ष अदालत ने मामले को स्‍थगित करते हुए कहा कि वह दो सप्‍ताह बाद इस पर विचार करेगी कि इस दिशा में क्‍या प्रगति हुई?

 

याचिका में कहा गया था कि जम्‍मू-कश्‍मीर में 4 अगस्‍त से ही अघोषित कर्फ्यू लागू है, नेता घरों में नजरबंद हैं, फोन, इंटरनेट, न्‍यूज चैनल सब बंद हैं। लोग मौलिक आवश्‍यकता की चीजों से भी वंचित हैं। उन्‍हें स्‍वास्‍थ्‍य जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं तो शैक्षणिक संस्‍थान, बैंक, खाद्यान्‍न और राशन आपूर्ति से संबंधित सभी प्रतिष्‍ठान भी बंद हैं। यह सब संविधान के अनुच्‍छेद 19 और 21 के तहत मिले जनता के अधिकारों को निलंबित करने जैसा और असंवैधानिक है।

याचिका में उन नेताओं को रिहा करने का अनुरोध भी किया गया, जिन्‍हें नजरबंद रखा गया है। इसमें कहा गया कि जम्‍मू-कश्‍मीर में जिन नेताओं को 4 अगस्‍त से ही नजरबंद किया है, उनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री से लेकर राज्‍य के मुख्‍यमंत्री भी शामिल हैं। कई विधायकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी मनमाने तरीके से हिरासत में लिया गया है या नजरबंद कर दिया गया है। उन्‍हें जल्‍द से जल्‍द करने का आदेश दिया जाए। याचिका में जम्‍मू-कश्‍मीर में फोन, इंटरनेट सेवा बहाल करने और न्‍यूज चैनलों पर प्रसारण शुरू करने के साथ-साथ राज्‍य में हालात का जायजा लेने के लिए न्‍यायिक आयोग के गठन की अपील भी की गई थी।



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