सोमवार, 8 अगस्त 2022 | 07:26 IST
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‘रेवड़ी कल्चर’ पर मोदी का बयान कहीं ‘बड़े ख़तरे’ का संकेत तो नहीं ?


पीएम मोदी ने ‘रेवड़ी कल्चर’ यानी मुफ्त बांटने की सरकारों की आदत पर आज बड़ा हमला किया। केजरीवाल जी ने इसे मौका समझकर लपक लिया और मोदी की सियासी चाल में फंस गए। श्रीलंकाई संकट और यूरोप में छाई मंदी के बरअक्श अगर रसातल में जाते रुपये को देखें तो कल आप किसको जिम्मेदार ठहराने वाले हैं ?


मोदी ने आज क्यों दिया ये बयान और केजरीवाल ने फौरन रिएक्शन देकर कैसे कर दी बीजेपी की मदद, ये आगे बताएंगे। 
क्या देश के नागरिकों को फ्री में सुविधाएं देना ‘घातक’ साबित हो सकता है? क्या ‘फ्री रेवड़ी कल्चर’ कहीं हमारी हालत भी श्रीलंका जैसी नहीं कर देगा ? ये सवाल आजकल हर ओर गूंज रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने आज जालौन में इसी ‘रेवड़ी कल्चर’ पर हमला करके सियासी घमासान छेड़ दिया। मोदी जी के बयान पर पलटवार करने दिल्ली के सीएम केजरीवाल जी फौरन कूद गए और यूपी में नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव ने भी अपना विरोध जताया।

 

तो आइये समझते हैं कि क्या वाकई फ्री बांटने से देश का नुकसान होगा या जनता की मदद होगी, जैसे केजरीवाल जी दावा करते रहते हैं ? 


हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शीर्ष अधिकारियों के साथ एक बैठक की। इस बैठक में  कई अफसरों ने चेताया कि कुछ राज्य सरकारें, जिस तरह से मुफ्त वस्तुएं और सुविधाएं बांट रही हैं, उससे हमारे यहां भी श्रीलंका जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। इन अफसरों की मानें तो कर्ज में डूबे राज्य मुफ्तखोरी वाली योजनाएं चलाकर अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क कर रहे हैं।

 


अर्थव्यवस्था और राज्य की माली हालत को ताक पर रखकर लगभग सभी पार्टियों व सरकारों ने गहने, लैपटॉप, टीवी, स्मार्टफोन से लेकर चावल, दूध, घी तक बांटा है या बांटने का वादा किया है। यह मुफ्तखोरी की पराकाष्ठा है। मुफ्त दवा, मुफ्त जाँच, लगभग मुफ्त राशन, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त विवाह, मुफ्त जमीन के पट्टे, मुफ्त मकान बनाने के पैसे, बच्चा पैदा करने पर पैसे, नसबंदी करने पर पैसे, मुफ्त बिजली मुफ्त, तीर्थ यात्रा मुफ्त । यानी पैदा होने से लेकर मृत्यु तक सब कुछ मुफ्त। मुफ्त बाँटने की होड़ मची है। दिल्ली और पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार तो खुलेआम मुफ्त देने की वकालत करती ही रहती है। 

 


बुंदेलखण्ड एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन करने जालौन पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चेतावनी इसी के मद्देनजर थी। यानी लगातार घाटे में जाती अर्थव्यवस्था के चलते कहीं श्रीलंका जैसे हालात पैदा हो गए तो इसके लिए केवल बीजेपी की सरकारों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जाए, बल्कि ‘रेवड़ी कल्चर’ पर भी बात हों। यानी इस बयान के जरिए मोदी जी ने अपनी ओर उठ रही उंगली को कुछ हद तक उन नेताओं की ओर घुमा दिया है, जो खुलेआम ‘फ्री बीज’ या ‘रेवड़ी कल्चर’ की वकालत करते हैं। इसको थोड़ा और खुलकर समझिए। देश की अर्थव्यवस्था दिक्कत में है, रुपया रसातल में पहुंच गया और यूरोप के कारण एक बार फिर मंदी की आहट है। यूक्रेन- रूस युद्ध के ख़त्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं- ऐसे में अगर कोई ऊंच-नीच होती है, तो आप केवल हमको ही जिम्मेदार मत ठहरा देना, इनको भी उतना ही दोषी मानना। यानी जिस सियासी पिच पर मोदी ने गेंद हवा में उछाल दी है, उसे कैच करोगे तो विकेट आपका भी जाएगा। 
मोदी के बयान के बयान के बाद दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने फौरन प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने मोदी के बयान को इस तरह कोड किया कि जैसे ये केवल उन्हीं पर किया गया ‘हमला’ है। 

 


इसके जरिए उन्होंने अपना कद मोदी के बराबरी पर लाने की सियासी चाल भी चली, जो वे चतुराई के साथ करते रहते हैं। इसके अलावा उन्होंने दिल्ली में बांटी जा रही फ्री सुविधाओं को गर्व से पूरा गिनाया, जैसा वो अपनी हर सियासी रैली में करते रहते हैं। केजरीवाल ने मोदी सरकार पर भी आरोप लगाया कि वो अपने उद्योगपति दोस्तों का लोन माफ कर देते हैं। 

 


केजरीवाल की कई बातों में दम भी है। देखिए जहां तक गरीबों को शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, जैसी मूलभूत सुविधाएं हैं, ये तो सरकारों का दायित्व है, लेकिन अगर बिजली-पानी भी आप फ्री बांटने लगोगे तो जनता के टैक्स से आया खजाना खाली होगा ही। इसे भरने के लिए कहीं दूसरा इंतजाम करना पड़ेगा जैसे दिल्ली में शराब कल्चर को बढ़ावा देना मजबूरी हो गई। साथ ही बहुत से विकास के कामों पर असर पड़ेगा, जैसी टांसपोर्ट सिस्टम, अच्छी सड़कें आदि डेवलपमेंट के काम उस तरह से नहीं हो पाएंगे, जैसी कि जरूरत है। तो राजनेता केवल अपने पक्ष की ही बातें आपके सामने रखते हैं, उससे होने वाले नुकसान को वे जनहित की आड़ में छिपा जाते हैं। 

 


अब बात करते हैं मोदी सरकार की। क्या रेवड़ी कल्चर के लिए केवल विपक्षी सरकारें ही जिम्मेदार हैं। मोदी सरकार खुद किसान सम्मान निधि बांट रही है, जिसे कतई गलत भी नहीं माना जा सकता, जैसी देश के किसानों की हालत है, उनको और मदद की दरकार है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, यूपी, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, पंजाब, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु की सरकारों ने हजारों करोड़ रुपये की किसानों की कर्जमाफी की। इसे भी आप गलत नहीं ठहरा सकते। भले ही इसमें सियासी कारण शामिल हों, लेकिन किसान अन्नदाता है और उसे मदद नहीं करेंगे तो देश का पेट कैसे भरेगा ? 

 


2019 में आई आरबीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच साल में बैंकों से कर्ज लेने वालों के करीब साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये बट्टे खाते में पहुंच गए। इसमें ज़्यादातर रकम कारोबारियों की है।

 

 
हरियाणा और आंध्र प्रदेश की जगनमोहन रेड्डी सरकार हर बजुर्ग को सालाना 36,000 रुपये पेंशन दे रही है। इसी तरह केजरीवाल की मुफ्त बिजली स्कीम से जो सियासी फायदा हुआ है, उसको देखते हुए झारखंड, पश्चिम बंगाल सरकार भी मुफ्त बिजली बांटने जा रही है। तो कहीं न कहीं प्रधानमंत्री सभी राज्य सरकारों को शायद इस कल्चर पर लगाम लगाने की चेतावनी दे रहे हैं। हालांकि उनकी बात कितनी सुनी जाएगी, इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। कुल मिलाकर मानसून सत्र में इन सब पर जोरदार हंगामा दिखाई देगा। अभी इतना ही।



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