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संजीव को हिंदी में तो नीलम शरण को इंग्लिश में मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार


नई दिल्ली। वर्ष 2023 के साहित्य अकादमी पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। हिंदी के लिए संजीव के उपन्यास 'मुझे पहचानो' और अंग्रेजी में नीलम शरण गौर के उपन्यास 'रेक्युम इन रागा जानकी' को चुना गया है।
संजीव मूल रूप से उप्र के सुल्तानपुर और नीलम शरण गौर प्रयागराज की रहने वाली हैं। 24 भाषाओं में दिए जाने वाले इस पुरस्कार में नौ कविता-संग्रह, छह उपन्यास, पांच कहानी-संग्रह, तीन निबंध और एक आलोचना की पुस्तक शामिल है। 
12 मार्च 2024 को कामायनी सभागार में पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। साहित्य अकादमी 12 मार्च को अपने 70 वर्ष पूरे कर रही है, इसलिए समारोह महत्वपूर्ण होगा। पुरस्कार स्वरूप सभी विजेताओं को एक लाख रुपये और प्रमाणपत्र प्रदान किया जाएगा।
11 से 16 मार्च को साहित्य उत्सव आयोजित किया जाएगा, जिसमें 150 भाषाओं के साहित्यकारों को आमंत्रित किया गया है। 13 मार्च को संवत्सर व्याख्यान होगा, जिसे प्रसिद्ध पटकथा लेखक और गीतकार गुलजार संबोधित करेंगे। इस दौरान अलग-अलग भाषाओं के 150 सत्रों का आयोजन होगा। हर भाषा के लिए तीन निर्णायकों का मंडल बनाया गया है। ये पुरस्कार 2017 से 2021 के बीच पहली बार प्रकाशित कृतियों के लिए दिए गए हैं।
पंजाबी के लिए स्वर्णजीत सवी के कविता संग्रह मन दी चिप और उर्दू के लिए सादिका नवाब सहर के उपन्यास राजदेव की अमराई को पुरस्कृत किया जाएगा। उर्दू में दूसरी बार किसी महिला को पुरस्कार दिया जा रहा है। इससे पहले र्कुअतुल एन हैदर को पतझड़ की आवाज के लिए 1967 में पुरस्कृत किया गया था।
कविता के लिए डोगरी में दऊं सदियां एक सीर के लिए विजय वर्मा को, गुजराती में सैरन्ध्री के लिए विनोद जोशी, कश्मीरी में येथ वावेह हेले सांग कौस जेले के लिए मंशूर बनिहाली, मणिपुरी में याचंगबा नांग हालो के लिए सोरोख्खैबम गंभिनी को, ओडिआ में अप्रस्तुत मृत्यु के लिए आशुतोष परिडा, राजस्थानी में पलकती प्रीत के लिए गजेसिंह, संस्कृत में शून्ये मेघगानम के लिए अरुण रंजन मिश्र, सिंधी में हाथु पाकिदीजैन के लिए विनोद आसुदानी को पुरस्कृत किया जाएगा।
उपन्यास लेखन में बाड्ला में जलेर ऊपर पानी के लिए स्वपनम चक्रवर्ती को, मराठी में ¨रगाण के लिए कृष्णात खोत को और तमिल में नीरवाजी पडुवुम के लिए राजशेखरन को चुना गया है। कहानी संग्रह में असमिया के लिए डा. प्रणवज्योति डेकर श्रेष्ठ गल्प के लिए प्रणव ज्योति डेका को, बोडो में जिउ-सफरनि दाखवन के लिए नंदेवश्वर दैमारी को, कोंकणी में वर्सल के लिए प्रकाश एस पर्येंकार को, संताली में जाबा बाहा के लिए तुरिया चंद बासकी, तेलुगु में रामेश्वरम काकुलु मारिकोन्नि के लिए टी पतंजलि शास्त्री को पुरस्कृत किया जाएगा।
निबंध लेखन में कन्नड में महाभारत अनुसंधानदा भारतयात्रे के लिए लक्ष्मीशा तोल्पडि़, मैथिली में बोध संकेतन के लिए बासुकीनाथ झा को और नेपाली में नेपाली लोकसाहित्य और लोकसंस्कृतिको परिचय के लिए युद्धवीर राणा को पुरस्कृत किया जाएगा। आलोचना लेखन में मलयालम में मलयाला नोवेलिंटे देशकालंगल के लेखक ईवी रामकृष्णन को पुरस्कार के लिए चुना गया है।
उप्र के सुल्तानपुर के बांरकलां गांव में 6 जुलाई, 1947 को पैदा हुए राम सजीवन प्रसाद उर्फ संजीव इस समय नोएडा में रहते हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बंगाल के कुलेरी में हुई। आसनसोल और कोलकाता में उच्च शिक्षा प्राप्त की। 38 वर्षों तक वहां एक निजी रासायनिक प्रयोगशाला में कार्य करने के बाद स्वतंत्र लेखन करते रहे। चार वर्ष से अधिक समय तक 'हंस' पत्रिका में संपादन का कार्य किया।
उन्होंने तीस साल का सफरनामा, आप यहां हैं, दुनिया की सबसे हसीन औरत, प्रेतमुक्ति, प्रेरणास्त्रोत और अन्य कहानियां, ब्लैक होल, आरोहण (कहानी संग्रह) आदि लेखन किया है। बाल साहित्य विशेष रूप से लिखा है। 400 से अधिक कहानियां लिखी हैं। वह शोधपरक व वर्जित विषयों पर लेखन के लिए जाने जाते हैं। संजीव ने बताया कि लगभग सौ पृष्ठों का उपन्यास मुझे पहचानो सती प्रथा पर केंद्रित है। यह उपन्यास तद्भव पत्रिका के नवंबर, 2019 अंक में पहली बार छपा। उसके बाद 2020 में सेतु प्रकाशन ने प्रकाशित किया।
नीलम ने आइएएस बनने के दौर में लेखन को चुना। अंग्रेजी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुनी गईं प्रो. नीलम शरण गौर का जन्म 12 अक्टूबर, 1955 में इलाहाबाद अब प्रयागराज में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा वहीं सेंट मेरी स्कूल में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर करने के बाद वहीं अंग्रेजी की प्राध्यापक बन गईं और अध्यापन के साथ लेखन कार्य शुरू कर दिया।
उन्होंने 1993 में ग्रे पिजन एंड अदर स्टोरीज लिखी। इसके बाद उनका उपन्यास आया स्पीकिंग आफ 62, इसका हिंदी में अनुवाद भी उन्होंने 62 की बातें नाम से किया। उन्होंने छह उपन्यास और चार लघु कथा संग्रह लिखे हैं। उन्होंने कहा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आइएएस बनने की तरफ अधिकतर छात्रों का रुझान होता था। लेकिन, मुझे लेखन में ही रुचि थी। यहां पढ़ाने को मिल गया, तो बहुत हर्ष हुआ। ऐसा माहौल मिला कि वर्षों से लेखन का सिलसिला जारी है।

 



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