सोमवार, 8 अगस्त 2022 | 06:38 IST
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‘राइट टू रिपेयर’ कानून- ‘एक तीर से कई निशाने’ लगाएगी मोदी सरकार


क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप अपने खराब मोबाइल को ठीक कराने के लिए किसी कंपनी के कस्टमर केयर में गए और आपको मोबाइल का पार्ट्स  रिपेयर करने या दूसरा लगाने की इतनी भारी कीमत बता दी गई, आप चकरा गए। आपको लगने लगा कि मरम्मत की जो रकम ये बता रहे हैं, उसमें थोड़ा सा पैसा और लगाकर आप नया मोबाइल ही खरीद सकते हैं। कंपनी का टेक्निशियन भी आपको यही नसीहत देता है और आप हैरान परेशान लौट जाते हैं। फिर मौजूदा मोबाइल को कचरे के डिब्बे में डालकर आप नया मोबाइल खरीदने की तैयारी में लग जाते हैं। जल्द ही मोदी सरकार इसमें आपको बड़ी राहत देने वाली है वो भी नया कानून बनाकर।

 

आपको शायद ये नहीं पता होगा कि कई कंपनियां पुराने मोबाइल सेट के अपडेट जारी नहीं करतीं, उसके सर्वर को स्लो कर देती हैं- यानी हर हाल में ऐसा इंतजाम करती हैं कि ताकि आपको झक मारकर नया मोबाइल खरीदना ही पड़े। दरअसल इसके जरिए वो बाजार में अपने नए सामान के लिए नए कस्टमर तैयार करती रहती हैं, इसमें सभी कंपनियां शामिल रहती हैं. यानी एक तरह से इस ‘लूट’ में सबकी मिलीभगत होती है, ताकि बाजार में ग्राहक लुटता रहे।

 

इसी तरह महंगी कार, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन आदि  खरीदते हैं, लेकिन आपको उनके पाट्र्स केवल उसी के सर्विस सेंटर में महंगे दामों में खरीदने पड़ते हैं, जबकि लोकल मार्केट में वही सामान आधी कीमत पर मौजूद रहता है, लेकिन अगर आपने बाहर से लगवा दिया तो कंपनी आगे की गारंटी-वारंटी खत्म करने की धमकी देती हैं। दरअसल ये सब बातें उस वारंटी कार्ड में छोटी छोटी लिखी होती हैं

जिसे शायद ही कोई कस्टमर कभी पढ़ पाता हो। जब कभी मामला कंज्यूमर कोर्ट में जाता है तो कंपनी ये कहकर बच जाती है कि उसने तो पहले ही लिखकर दे दिया था।

 

नई उम्र के युवाओं को ये बात बहुत नॉर्मल लगती होगी, लेकिन पुराने ज़माने के लोगों को ये बात हजम नहीं होती कि दस-पन्द्रह हजार रुपये का इलेक्ट्रॉनिक गैजेट आज दो-तीन साल भी नहीं चलता, जबकि बीस साल पहले जब वे फ्रिज, टीवी, वाशिंग मशीन या मिक्सर ग्राइंडर खरीदते थे तो वो कम से कम आठ-दस साल चलते थे। अब मोदी सरकार इसका पक्का इंतजाम करने जा रही है, ताकि कंपनियों की ओर से की जा रही हजारों करोड़ की ये ‘लूट’ बन्द हो सके।

 

जल्द ही मोदी सरकार आपको ‘राइट टू रिपेयर’ का अधिकार देने जा रही है। इस कानून के पास होने के बाद दुनिया भर की कंपनियां आपके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को ठीक करने से इनकार नहीं कर सकेंगी। अमेरिका और यूके सहित यूरोप के कई देशों में पिछले साल पहले ये अधिकार मिल चुका है- और भारत में भी अब इसको लागू करने की तैयारी है।

 

राइट टु रिपेयर में मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स समेत वाशिंग मशीन, रेफ्रिजरेटर , एसी, फर्नीचर और टेलीविजन जैसे कन्यूमर ड्यूरेबल्स शामिल होंगे। ऑटोमोबाइल और एग्रीकल्चरल इक्विपमेंट्स यानी आपकी कार के स्पेयर पार्ट्स से लेकर किसानों के काम आने वाले उपकरण भी राइट टु रिपेयर के दायरे में आएंगे। मतलब कि अगर आप इन सामान को खरीदते हैं और इनमें वारंटी पीरियड के बाद भी कोई खराबी आती है तो कंपनियां मजबूर होंगी इन्हें ठीक करने के लिए । वो ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकतीं कि इसकी वारंटी खत्म हो गई और इस मॉडल का पाट्र्स आना बन्द हो गया है।

 

अब बात करते हैं कि राइट टू रिपेयर कानून की जरूरत आखिर पड़ी क्यों ? दुनिया भर के ग्राहकों का मानना है कि कंपनियां जान-बूझकर ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाती हैं, जो कुछ वक्त बाद खराब हो जाए. स्थानीय बाजार में उसके पार्ट्स नहीं मिलते और न ही रिपेयरिंग हो पाती है। और ये सच भी है। एक्सपर्ट भी इस बात की तसदीक करते हैं कि कंपनियां जानबूझ कर अपने उत्पाद ऐसे बनाती हैं कि उन्हें ठीक करना मुश्किल हो या जानबूझकर स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल बना दिया जाता है।

 

पिछले कुछ सालों में कंपनियों के प्रोडक्ट्स की क्वालिटी लगातार गिर रही है। एक रिसर्च के मुताबिक 2004 से 2012 के दौरान होम अप्लायंसेस की क्वालिटी में तेजी से गिरावट आई है। 2004 में इलेक्ट्रॉनिक मशीनें पांच सालों तक ठीक से चला करतीं और इसके बाद भी लगभग साढ़े तीन फीसदी मशीनें खराब हो रही थीं। साल 2012 में ये प्रतिशत बढ़कर 8.3 हो गया. इसके बाद आ रही मशीनें पांच साल भी ठीक से नहीं चल पा रही हैं.

 

मार्च 2021 में यूरोप के कई देशों ने कानून लाकर वॉशिंग मशीन, डिश वॉशर्स, फ्रिज और टीवी स्क्रीन बनाने वाली कंपनियों को उस मॉडल का बनना बंद होने के 10 साल बाद तक स्पेयर पार्ट उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। अब सरकारें चाहती हैं कि ऐसा ही नियम फोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट बनाने के लिए भी हो। जुलाई 2021 में अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन ने राइट टु रिपेयर के फेवर में सर्वसम्मति से मतदान किया।

 

अमेरिका में प्रेसिडेंट बाइडेन ने जब राइट टू रिपेयर बिल पर दस्तखत किए तो उन्हें कंपनियों की ओर से भारी विरोध का सामना करना पड़ा। अमेरिका से पहले यूके में ये बिल आ चुका था।

 

कई कंपनियां जैसे एपल, माइक्रोसॉफ्ट और टेस्ला इस कैंपेन के खिलाफ हैं। वे न तो सामान खुद सुधारने की गारंटी दे रही हैं और न ही थर्ड पार्टी यानी स्थानीय मैकेनिकों को इसकी इजाजत दे रही हैं. उनका तर्क है कि उनका प्रोडक्ट उनकी बौद्धिक संपत्ति है. ऐसे में उनके उत्पाद की मरम्मत की ट्रेनिंग और सामान खुले बाजार में उपलब्ध कराने से उनकी खुद की पहचान खत्म हो जाएगी.

 

इन्हीं सब मुश्किलों को सुलझाने के लिए भारत में मोदी सरकार ‘राइट टु रिपेयर बिल लाने की तैयारी में है। उपभोक्ता मामलों के विभाग ने देश में 'राइट टु रिपेयर' फ्रेमवर्क बनाने के लिए एक कमेटी भी बना दी है।

 

इस कानून के आने के बाद कंपनी ग्राहक के पुराने सामान की मरम्मत से इनकार नहीं कर सकती। कंपनी यह भी नहीं कह सकेगी कि सामान पुराना हो गया। यानी कंपनी कस्टमर्स को नया सामान खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है।

 

एक्सपर्ट का मानना है कि राइट टू रिपेयर कानून से पांच लाख नए रोजगार पैदा होंगे। कंपनियों को नए इंजीनियर्स भर्ती करने पड़ेंगे, ताकि इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की मरम्मत हो। इसके अलावा जब कंपनियों को अपने पाट्र्स ओपेन मार्केट में देने पड़ेंगे तो बहुत से युवा खुद अपना स्रविस सेंटर शुरू कर सकेंगे, उससे भी एक मैकेनिक मार्केट तैयार होगा। कुलमिलाकर करीब दस लाख नए रोजगार पैदा होंगे, जो कि मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर जाना जाना जाएगा।

 

इसके अलावा जब जल्दी जल्दी नए गैजेट्स नहीं खरीदने पड़ेंगे तो उसको खरीदने में इस्तेमाल होने वाला धन देश से बाहर नहीं जाएगा। इस तरह कहीं न कहीं विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी।

 

लेकिन नए कानून में सरकार को इस बात का ध्यान रखना होगा कि कंपनियां सर्विस चार्ज के तौर पर इतनी ज़्यादा फीस न मांग लें कि फिर वही हालात पैदा हो जाएं। ग्राहक अपना गैजेट ठीक करवाने की बजाय, नया लेना ही बेहतर समझे। अगर ऐसा हुआ तो इस कानून को जो असली मकसद है, वो पूरा नहीं हो पाएगा।

 

अब बात करते हैं, इससे जुड़े इससे भी बड़े संकट की- जिसकी वजह से पूरी दुनिया के कई देश ये कानून लागू करने पर मजबूर हुए हैं। वो है ई-वेस्ट यानी इलेक्ट्रॉनिक कचरा।

 

संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल करीब 60 लाख टन ई-कचरा पैदा होता है, अमेरिका में 75 लाख, चीन में 65 लाख, जापान में 25 लाख और पूरी दुनिया में करीब 6 करोड़ टन। इसी तरह ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2020 रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में करीब 5 करोड़ 36  लाख मीट्रिक टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हुआ था,  जोकि 2030 में बढ़कर 7 करोड़ 40 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच जाएगा।

 

आमतौर पर पैदा होने वाले ई-कचरे का केवल बीस फीसदी हिस्सा ही रिसाइकिल हो पाता है यानी करीब डेढ़ करोड़ ई-कचरे का रिसाइकिल हो भी जाता है तो हर साल चार से साढ़े चार करोड़ टन ई-कचरा बचा रहता है, जो धरती को ‘बर्बाद’ कर रहा है। इसमें कम्प्यूटर, फोन, फ्रिज, एसी से लेकर टीवी, बल्ब, खिलौने और इलेक्ट्रिक टूथब्रश जैसे गैजेट तक शामिल हैं. ई-कबाड़ में लेड, कैडमियम, बेरिलियम, या ब्रोमिनेटड फ्लेम जैसे घातक तत्व पाए जाते हैं. ताजा रिपोर्टें और अध्ययन बताते हैं कि भारत में ई-कचरे को न सही ढंग से इकट्ठा किया जाता है और न ही वैज्ञानिक तरीके उसका निस्तारण हो पाता है।

 

एक और चौंकाने वाला आंकड़ा देखिए। दुनिया में करीब दो तिहाई ई-कचरे का निपटान हो ही नहीं पाता, अगर ये हो पाता तो इसमें मौजूद सोना, चांदी, तांबा, प्लेटिनम और अन्य कीमती सामग्री निकाली जा सकती और इसकी बाजार में कीमत 41 लाख 3 हजार 277 करोड़ रुपये के बराबर होती, जो कि कई देशों की जीडीपी के बराबर है। और जिस कचरे का हम निपटान कर भी पाते हैं, उसे लैंडफिल यानी ज़मीन में गड्ढे खोदकर भर दिया जाता है। इससे ज़मीन के रास्ते ज़हरीले रसायन पर्यावरण में फैलते हैं। जब ई-कचरे को जलाया जाता है तो इससे निकलने वाले ज़हरीले रसायन हवा में घुलकर इंसान को कैंसर जैसी कई घातक बीमारियों का तोहफा दे रहे हैं।

 

राइट टू रिपेयर कानून का एक बड़ा फायदा ये होगा कि दुनिया भर में कचरे के अंबार में कमी आएगी। कानून आने के बाद कंपनियां एक बार फिर मजबूर होंगी, क्वालिटी वाला सामान बनाने के लिए। तो मोदी सरकार ने एक तीर से कई निशाने साधने की तैयारी कर ली है, जिसका फायदा आने वाले समय आपको मिलेगा।



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