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पौड़ी गढ़वाल सीट पर - अनिल बलूनी बनाम गणेश गोदियाल


उत्तराखण्ड की पांचों सीटों पर 19 अप्रैल को एक साथ वोटिंग होने वाली है और चुनाव प्रचार का घमासान अंतिम दौर में है। इस दौरान 
उत्तराखण्ड की सबसे हॉट सीट बन गई है पौड़ी गढ़वाल । प्रधानमंत्री मोदी के खास सिपहसालार अनिल बलूनी का मुकाबला है कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल से। सवर्ण वोटरों की अधिकता वाली इस सीट पर दोनों ही उम्मीदवार ब्राह्मण हैं और कद्दावर नेता हैं। गणेश गोदियाल जहां संघर्ष करते हुए कांग्रेस के बड़े नेता बने वहीं अनिल बलूनी ने कोटद्वार से राजनीति की शुरुआत की, लेकिन बाद में दिल्ली की राजनीति करने लगे। राज्यसभा सांसद रह चुके अनिल बलूनी को प्रधानमंत्री मोदी का खास सिलहसालार माना जाता है और उत्तराखण्ड में विकास के कई काम कराने में उनका बड़ा योगदान रहा है। लेकिन इस बार के चुनाव में उनका दिल्ली में रहना ही मुद्दा बन गया है। कांग्रेस लगातार ये आरोप लगा रही है कि दिल्ली में रहने वाले लोग स्थानीय लोगों की कैसे मदद कर पाएंगे। अनिल बलूनी को इसका जवाब देना भी मुश्किल पड़ रहा है। अब उनको पीएम मोदी के नाम का ही सहारा है, जिनकी गढ़वाल में काफी लोकप्रियता है। 
गढ़वाल संसदीय सीट का अपना मजबूत इतिहास है. देवभूमि उत्तराखंड के केदारनाथ से लेकर रामनगर के जंगलों और नैनीताल की तलहटी तक फैली ये गढ़वाल लोकसभा सीट करीब 330 किलोमीटर तक फैली है. इस सीट का प्रतिनिधित्व भक्तदर्शन, हेमवती नंदन बहुगुणा, भुवन चंद्र खंडूड़ी, सतपाल महाराज जैसे दिग्गजों ने किया. गढ़वाल की सियासी जमीन पर हमेशा जाति का मुद्दा हावी रहा है. बीजेपी और कांग्रेस ने गढ़वाल सीट में ब्राह्मण प्रत्याशी ही उतारे हैं. बीजेपी ने भी इस बार यहां से अनिल बलूनी को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस ने इस सीट पर अपने सबसे काबिल नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल को उतारा है.
आजादी के बाद देश में पहली बार 1952 में लोकसभा चुनाव हुए. इसके साथ ही गढ़वाल सीट अस्तित्व में आ गई थी. इस सीट पर साल 1952 से 1977 तक लगातार कांग्रेस का ही कब्जा रहा. इस लोकसभा क्षेत्र के तहत 14 विधानसभा सीटें आती हैं. ये 14 सीटें उत्तराखंड के पांच जिलों चमोली, पौड़ी, नैनीताल, रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल में फैली हुई हैं.
पौड़ी गढ़वाल ने उत्तराखंड को 5 मुख्यमंत्री दिए. देश के बड़े पदों पर भी पौड़ी का दबदबा है. देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानी CDS बिपिन रावत यहीं से थे, जबकि नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर यानी NSA अजीत डोभाल भी पौड़ी से ताल्लुक रखते हैं. इस समय के CDS अनिल चौहान भी पौड़ी के ही रहने वाले हैं। बताते हैं कि कहीं न कहीं अनिल बलूनी का भी बड़ा योगदान है इन पदों में। बलूनी चूंकि गुजरात से ही पीएम मोदी के करीबी बन गए थे, इसलिए दिल्ली में जितने भी उत्तराखण्डियों की मोदी से करीबी हुई, कही न कहीं अनिल बलूनी का हाथ रहा। वैसे 2019 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से बीजेपी ने तीरथ सिंह रावत को उतारा था, जो कुछ समय के लिए राज्य के सीएम भी बनाए गए। मोदी लहर में तीरथ ने बड़ी जीत भी दर्ज की थी. लेकिन कुछ ही समय बाद 
सीएम बनते ही उनके विवादित बयानों के कारण पार्टी ने तीरथ से किनारा कर लिया। इस बार बीजेपी ने तीरथ का टिकट काटकर अनिल बलूनी को मैदान में उतारा है. बलूनी पर्दे के पीछे रहकर बीजेपी के लिए काम करने वाले नेताओं में एक हैं. जब से गढ़वाल में बीजेपी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बताया है, तकरीबन छोटे-बड़े कई कांग्रेस नेता पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. 
बलूनी के चुनाव प्रचार का तरीका भी अलग है. वो रोज सुबह नाश्ते के बाद घर से प्रचार के लिए निकल जाते हैं. रोजाना कम से कम 250 किलोमीटर कार से यात्रा करते हैं. इस बीच जगह-जगह रुककर लोगों से मिलते हैं. कार्यकर्ताओं से बात करते हैं. कुछ सभाएं भी करते हैं. कभी-कभी रोड शो भी होते हैं. रात खत्म होने से पहले वो सहयोगियों के साथ मिलकर अगले दिन की प्लानिंग भी कर लेते हैं . उनकी सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि विरोधी उनको दिल्ली वाला कहकर जनता को समझाने में लगे हैं कि वे उनके काम नहीं आने वाले। वे वीआईपी नेता हैं और दिल्ली की राजनीति करते हैं। इससे निपटने के लिए अपने संघर्ष, यहां के लिए किए कार्य गिनाते हैं। साथ ही वे बताना नहीं भूलते कि उन्होंने कैंसर को मात देकर दूसरा जीवन पाया है और इसे उत्तराखण्ड को समर्पित कर दिया। 
विरोधी भले ही अनिल बलूनी को दिल्ली वाला बता रहे हों, लेकिन उनका जन्म 2 सितंबर 1972 को पौड़ी के ही गांव नकोट में हुआ था। 
अनिल बलूनी ने पत्रकारिता की पढ़ाई की है, 90 के दशक में 
कॉलेज के दिनों से ही राजनीति में सक्रिय थे. इस कारण दिल्ली में 
संघ के नेताओं से उनका मिलना जुलना लगा रहता था. इसी दौरान संघ और भाजपा के नेताओं से उनकी करीबियां बढ़ीं. भाजपा के  तत्कालीन राष्ट्रीय संगठन महामंत्री सुंदर सिंह भंडारी जब बिहार के राज्यपाल बने, तब बलूनी उनके ओएसडी बन गए। किस्मत अनिल पर मेहरबान थी और भंडारी का तबादला गुजरात हो गया। बलूनी भी गुजरात राजभवन गए काम देखने। जब नरेन्द्र मोदी को गुजरात का सीएम बनाया गया तो अनिल बलूनी राजभवन में होने के नाते सीधे उनके संपर्क में आ गए। बाद में जब मोदी पीएम बने तो अनिल बलूनी उनके साथ दिल्ली आए और उनको मीडिया देखने की जिम्मेदारी मिली। इस समय वे बीजेपी के राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता और मीडिया हेड हैं। अनिल बलूनी को पास कुल 1 करोड़ 10 लाख 27 हजार 401 रुपये की चल अचल संपत्ति है। जबकि राज्यसभा चुनाव के दौरान उनकी कुल संपत्ति 2 करोड़ 62 लाख 84 हजार 410 रुपये थी और कुल देनदारी 18 लाख 50 हजार 962 रुपये थी।
उनकी पत्नी दीप्ति जोशी सरकारी नौकरी पर हैं। उनकी पत्नी के पास 1 करोड़ 44 लाख 98 हजार 890 रुपये की चल अचल संपत्ति है। इसमें 1 करोड़ 8 लाख 26 हजार 890 रुपये की चल संपत्ति व 36 लाख 72 हजार की अचल संपत्ति है। 
गढ़वाल संसदीय क्षेत्र के जातीय समीकरण की बात करें तो यहां 
अस्सी फीसदी से ज़्यादा आबादी सवर्णों की है। इनमें से करीब आधे ठाकुर वोटर हैं, जबकि एक तिहाई ब्राह्मण वोटर हैं। केवल 18 फीसदी वोटर अनुसूचित जाति के हैं. इसीलिए यहां से ज़्यादातर ठाकुर नेता ही जीतते रहे, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने इस बार ब्राह्मण प्रत्याशी पर दांव लगा दिया है। 
1990 से पहले इस सीट पर कांग्रेस का एकक्षत्र राज रहा था, लेकिन उसके बाद इसे बीजेपी के मजबूत किले के तौर पर देखा जाने लगा है. बीजेपी नेता जनरल बीसी खंडूड़ी सबसे ज्यदा पांच बार यहां से सांसद बने। उन्होंने 1991 से लेकर 2014 तक लगातार इस सीट पर जीत हासिल की है. इस सीट से बीच में दो बार कांग्रेस की भी जीत हुई है और दोनों ही बार सतपाल महाराज ने चुनाव जीता है. सतपाल अभी बीजेपी में आ गए हैं और कैबिनेट मंत्री हैं.पौड़ी गढ़वाल की भौगोलिक स्थिति को देखें तो रामनगर, श्रीनगर और कोटद्वार को छोड़कर ज्यादातर हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में ही आता है. इस लोकसभा सीट का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसके क्षेत्र में बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के साथ हेमकुंड साहिब गुरुद्वारा भी आता है. मोदी सरकार ने यहां कई हाइवे बनवाएं हैं और कई पर काम चल रहा है, इसका फायदा अनिल बलूनी को मिल सकता है। लेकिन अंकिता भंडारी हत्याकाण्ड के आरोपियों को बचाने के जो आरोप कांग्रेस लगातार लगा रही है, उसने बलूनी की मुश्किल बढ़ा रखी है। 
 उधर 56 साल के कांग्रेस प्रत्याशी गणेश गोदियाल मूल रूप में पौड़ी जिले के बहेड़ी गांव पैठाणी के रहने वाले हैं। गोदियाल का बचपन गरीबी में बीता और बहुत संघर्षों के बाद वे इस मुकाम तक पहुंचे। गाय पालने से लेकर उन्होंने मुंबई की सड़कों पर सब्जी-फल तक बेचने का कारोबार किया। करीब 25 साल तक मुंबई में अपनी मेहनत और योग्यता से बड़े कारोबारी की लिस्ट में शामिल हुए। बाद में अपनी पैतृक भूमि में लौट आए और पौड़ी जिले के पिछड़े कहे जाने वाले राठ क्षेत्र को अपनी नई कर्मभूमि बनाया। गणेश गोदियाल जुलाई 2021 में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभाल चुके हैं। लेकिन 2022 का विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्हें कुर्सी से हटा दिया गया।
गणेश गोदियाल श्रीनगर सीट से विधायक का चुनाव भी हार गए थे। गोदियाल को पूर्व सीएम हरीश रावत का करीबी माना जाता है। गोदियाल ने बद्री केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष की भी जिम्मेदारी संभाली है। पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद होने वाले पहले चुनावों में कांग्रेस पार्टी थलीसैंण विधानसभा क्षेत्र में पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल निशंक को टक्कर देने के लिए दमदार प्रत्याशी की तलाश कर रही थी। तब पार्टी की नजर गणेश गोदियाल पर पड़ी, जो उस समय जोर-शोर से राठ महाविद्यालय की स्थापना में लगे हुए थे। सतपाल महाराज की सिफारिश पर पार्टी ने गणेश गोदियाल पर दांव खेला। लेकिन गणेश गोदियाल ने 2002 के चुनाव में निशंक को हराकर ऐतिहासिक​जीत दर्ज की। वर्ष 2007 में हुए विधानसभा चुनावों में गोदियाल निशंक के हाथों चुनाव हार गए। वर्ष 2012 के चुनाव से पहले हुए परिसीमन में थलीसैंण क्षेत्र श्रीनगर विधानसभा का हिस्सा बना। 2012 में उन्होंने श्रीनगर सीट से धन सिंह रावत को हराया, लेकिन साल 2017 में गोदियाल, धन सिंह से चुनाव हार गए
इस बीच  गणेश गोदियाल ने अंकिता भंडारी हत्याकाण्ड, पलायन, बेरोजगारी जैसे मुद्दे उठाकर अनिल बलूनी की नाम में दम कर रखा है। अब देखना है कि पौड़ी की जनता किसको चुनती है। 

 



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