सोमवार, 15 जुलाई 2024 | 03:46 IST
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पसमांदा मुसलमान को दलित आरक्षण का दांव कितना कारगर ?


लोकसभा चुनाव के लिए यूपी की 80 लोकसभा सीटों पर बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी की नजर है। यूपी में बीजेपी को मुख्य टक्कर दे रही 
समाजवादी पार्टी विपक्षी गठबंधन में शामिल है, जबकि तीसरी बड़ी पार्टी मायावती की बीएसपी अभी तक किसी गठबधन में नहीं है। इस बीच प्रधानमंत्री मोदी ने पसमांदा मुसलमानों को अपने पाले में लाने का दांव चल दिया है। मुसममानों के बड़े तबको को बीजेपी जिस तरह अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है, उससे समाजवादी पार्टी का गणित बिगड़ गया है। लेकिन अखिलेश इससे पहले कि बीजेपी को जवाब देते मायावती ने मोदी के दांव पर छक्का मार दिया। पिछले कुछ समय से मुसलिमों को रिझाने में लगी मायावती ने पसमांदा मुसलिमों के पिछड़ेपन वाली बात का समर्थन किया, साथ ही एक कदम आगे बढ़कर उनके लिए आरक्षण मांग लिया। अब ये तो तय है कि बीजेपी धर्म-संप्रदायर और तुष्टीकरण  की राजनीति नहीं करने का दावा करती है, तो ऐसे में किसी समुदाय को आरक्षण तो देने से रही, इसी का फायदा उठाकर मायावती पसमांदा मुसलिमों की रहनुमा बनने की कोशिश में आगे बढ़ गईं। मायावती के इन दो ट्वीट ने बीजेपी के पसमांदा प्रेम पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया। मायावती ने लिखा- 
पहले ट्वीट में मायावती ने लिखा है कि पीएम नरेंद्र मदी ने भोपाल में बीजेपी के कार्यक्रम में सार्वजनिक तौर पर कहा है कि भारत में रहने वाले 80 फीसदी मुसलमान पसमांदा, पिछड़े, शोषित हैं। उन्होंने लिखा है कि यह उस कड़वी जमीनी हकीकत को स्वीकार करने जैसा है जिससे उन मुस्लिमों के जीवन में सुधार के लिए आरक्षण की जरूरत को समर्थन मिलता है।
पसमांदा मुसलमानों पर बीजेपी का समर्थन करने के बाद मायावती ने अगले ही ट्वीट में एक ऐसा सियासी दांव चल दिया है, जो न केवल दहला जैसा है बल्कि बीजेपी और अखिलेश दोनों के लिए नई मुसीबत खड़ी कर सकती है। दरअसल, माया ने अगले ट्वीट में लिखा कि अब ऐसे हालात में बीजेपी को पिछड़े मुस्लिमों को आरक्षण मिलने का विरोध बंद करके अपनी सभी राज्य सरकारों को अपने यहां आरक्षण को ईमानदारी से लागू करना चाहिए। साथ ही बैकलॉग भर्ती को पूरी करके यह साबित करना चाहिए कि वो इस मामले में अन्य पार्टियों से अलग हैं।
दरअसल, मायावती के इस दांव से बीजेपी ही नहीं अखिलेश भी बुरी तरह घिर गए हैं। समाजवादी पार्टी खुद को मुसलिमों का रहनुमा घोषित करती रही है, लेकिन मोदी के बयान पर कोई लाइन नहीं ले पाई। मायावती ने साफ साफ पसमांदा मुसलिमों के लिए आरक्षण मांगकर बढ़त बना ली। वैसे पीएम के पसमांदा दांव से यूपी में मुस्लिमों के साथ लेकर सियासत करने वाली खासकर सपा और रालोद में पहले से बेचैनी हैं। अब मायावती ने उनकी चुनौती और बढ़ा दी है। एक से तीन जुलाई के बीच हैदराबाद में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पसमांदा मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने की जरूरत बताई थी. उसके बाद बीजेपी ने इसकी कोशिशें तेज कीं. मीडिया में भी इस पर खूब चर्चा हो रही है. हाल ही में लखनऊ में बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चा की तरफ से पसमांदा मुसलमानों का एक बड़ा सम्मेलन किया गया.
मुसलमान और ईसाई दलितों के को अनुसूचित जाति में लाने के दायरे में लाने का मामला पिछले तीन दशकों से केंद्र सरकार के पास लटका पड़ा है. पिछले 18 साल से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में झूल रहा है. केंद्र में लगातार दो बार बनी कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने इस मामले पर सप्रीम कोर्ट में अपनी तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की. उसने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि सुप्रीम कोर्ट अगर आदेश देता है तो वो उस पर अमल करेगी. अब मोदी सरकार ने इस मामले को हल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई है. ये कमेटी सरकार को राय देगी कि कालांतर में इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति के दायरे में लाकर आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं. बौद्ध और सिख धर्म अपनाने वाले दलितों को आरक्षण मिलता है.
ये मामला पिछले तीन दशकों से विवाद का विषय बना हुआ है. इसे सुलझाने के लिए कमेटी गठित करके मोदी सरकार ने पसमांदा मुसलमानों के दिल में हमदर्दी पैदा करने की कोशिश की है. जिस मुद्दे पर पिछली सरकारें फैसला करने से बचती रही वहीं मोदी सरकार ने कम से कम की दिशा में सोचने के लिए एक कदम आगे तो बढ़ाया है.
26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ था तो इसके अनुच्छेद 3431 के तहत अनुसूचित जातियों को सरकारी नौकरी से लेकर विधानसभा और लोकसभा में उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी. उस समय इसमें धार्मिक आधार पर कोई पाबंदी नहीं लगाई थी. लेकिन 10 अगस्त 1950 को राष्ट्रपति ने एक आदेश जारी करके अनुसूचित जाति का आरक्षण सिर्फ हिंदू समाज के लिए सीमित कर दिया था. इस आदेश में साफ कहा गया है कि केवल हिंदू धर्म के मानने वाले ही अनुसूचित जाति में शामिल किए जाएंगे.
इस फैसले से कालांतर में सिख, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलित आरक्षण की सुविधा से वंचित हो गए थे. लेकिन 1956 में तात्कालीन नेहरू सरकार ने सिख धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देकर उन्हें आरक्षण के दायरे में शामिल कर लिया था. 1990 में वीपी सिंह सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद नवबौद्धों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा देकर आरक्षण के दायरे में शामिल कर लिया गया. सिर्फ मुसलमान और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित ही अनुसूचित जाति के आरक्षण के दायरे से बाहर हैं.
पसमांदा मुसलमानों का एक बड़ा तबका मंडल आयोग की सिफारिशों के तहत पिछड़े वर्गों को मिलने वाले 27% आरक्षण के दायरे में आता है. ये वो मुसलमान है जो सालों पहले हिंदू समाज की पिछड़ी जातियों से धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बने थे. इन पिछड़े वर्गों की केंद्रीय सूची में 40 से 50 मुस्लिम बिरादरियां शामिल हैं. इन सभी को 27% आरक्षण में हिस्सा मिलता है. आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में पिछड़े वर्गों के आरक्षण की उपश्रेणियों में कुछ हिस्सा पिछड़े वर्गों में आने वाले मुस्लिम बिरादरियों के लिए भी तय किया गया है. क्योंकि हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति के दायरे में आरक्षण नहीं मिलता, लिहाजा उन्हें भी अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के दायरे में ही आरक्षण मिलता हैं. तीन दशकों से इन्हें अन्य पिछड़ा वर्गों की सूची से निकालकर अनुसूचित जाति के दायरे में आरक्षण देने की मांग चल रही है. अब जब मायावती ने बीजेपी पर दबाव बना दिया है तो जाहिर है उनके प्रति भी सहानुभूति उमड़ेगी। लेकिन समाजवादी पार्टी ने इस बारे में अपने पत्ते नहीं खोले हैं, हालांकि अखिलेश यादव बार बार पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के समर्थन का नारा खूब लगा रहे हैं, लेकिन उनके विकास के लिए कोई प्लान पेश नहीं किया। हालांकि जानकार मानते हैं कि मोदी के लिए भी पसमांदा मुसलमानों को दलित आरक्षण के दायरे में लाने का दांव खतरे से खाली नहीं है। इससे उनके दूसरे वोट बैंक के खिसकने का डर भी है। तो लोकसभा चुनाव से पहले पसमांदा मुसलमानों को अपने पाले में लाने की लड़ाई आगे कहां जाकर थमती है, देखने वाली बात होगी। 

 



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