रविवार, 29 मार्च 2020 | 11:17 IST
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अपनी कहानियों में पहाड़ के दर्द को बयां करने वाले सशक्त हस्ताक्षर पानू खोलिया नहीं रहे


 चर्चित कहानीकार पानू खोलिया का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। बुधवार को रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर उनकी अंत्येष्टि की गई। बेटे गौरव खोलिया ने चिता को मुखाग्नि दी। मूल रूप से अल्मोड़ा के देवली गांव निवासी पानू खोलिया का जन्म 13 अक्टूबर 1939 को हुआ था। गांव में पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका चयन राजस्थान के डिग्री कॉलेज में ङ्क्षहदी प्रवक्ता के रूप हुआ था। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह हल्द्वानी के मल्लीबमौरी जगदंबा नगर में रहने लगे थे। पिछले कुछ दिनों से पानू खोलिया अस्वस्थ थे। बुधवार की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके परिवार में चार बेटियां और एक बेटा है।

 वर्ष 1967 से 1987 तक उनकी कहानियां धर्मयुग से लेकर तमाम प्रसिद्ध पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही। अन्ना, दंडनायक, एक किरती और जैसी रचनाओं से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली। वह संवेदनशील रचानाकार थे। उनकी मर्मस्पर्शी कहानियों में उपेक्षित, शोषित, पीडि़त और अमानवीय जीवन बिता रही नारी का चित्रण मिलता है। उनकी सबसे बड़ी खासियत यही रही कि वह मौन साधक के रूप में रचनाकर्म में डूबे रहे। चकाचौंध और साहित्यिक दलबंदी से दूर रहे। वाहन उनका जीवनीपरक उपन्यास है। सत्तर के पार शिखर, टूटे हुए सूर्यबिंब आदि उपन्यास भी चर्चित हैं।



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