सोमवार, 30 मार्च 2020 | 12:00 IST
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चित्रकार, साहित्यकार एवं कार्टूनिस्ट: बी. मोहन नेगी


देश व विदेश में साहित्यकारों, कवियों, लेखकों एवं फिल्मकारों के साथ-साथ उत्तराखण्ड की संस्कृति और साहित्य की भी चर्चाएं पूरे विश्व में मान्य है। भारत के सुप्रसिद्ध साहित्यकार रविन्द्रनाथ टैगोर, सुमित्रानन्दन पंत, महादेवी वर्मा जैसे सैकड़ों साहित्यकारों ने देवभूमि में शान्त एवं प्राकृतिक सौन्दर्यता का कहानियों में बखान किया वह अद्विताय, बेजोड एवं बेमिसाल है। 

उत्तराखंड के प्रख्यात रंगकर्मी, चित्रकार, साहित्यकार एवं कार्टूनिस्ट बी.मोहन नेगी, जो कि अपनी लघु कविताएं से लोगों के भावों को मनमोहित करते, वही दूसरी ओर चित्र, रेखाचित्र, कविता पोस्टर व कार्टून बनाकर तत्कालीन व मौजूदा हालात की तस्वीर समाज के सामने रखते।

उत्तराखंड के बी.मोहन नैगी का एक परिचय, प्रतिभा के धनी इस साहित्यकार का जन्म 26 अगस्त, 1952 में देहरादून में हुआ। इनके माता-पिता जमुना देवी और भवानी सिंह नेगी ने इनका नाम बिरेन्द्र मोहन रखा। जोकि आज बी. मोहन नेगी के नाम से जाना जाता है। परिवार में दो भाई और एक बहन के साथ रहते ये साहित्यकार सिर्फ 12 वीं तक पढ़ाई कर पाये। जिन्दगी के सिमटते पलों में पिता का ध्यांत हो जाने के बाद। वे परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। फिर उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस में काम करना शुरू कर दिया। बचपन की खुबीयाँ और प्रतिभाएँ तगातार जोर देती रही। अपने मन को झनझोर कर रख दिया। पेंटिंग, स्केच, कविताओं के साथ-साथ साहित्य के भी शौकिन हो गये। धीरे-धीरे समय बदलने लगा। बाद में 1971 में भारतीय डाक विभाग में नौकरी लग गई। डाक घर में चिट्टी, पत्री का काम करते-करते। उनका विश्वास बढ़ता गया और कविताओं की पंक्तियों के पोस्टर बनाते गये।   

उत्तराखंड की संस्कृति से जुड़े होने के नाते वे रामलीला जैसे रंगमंच में भी अपनी कलाकृति को सजाते रहे। कभी समाज में तो, कभी देश में अपनी खुबियों से लुभाया रहे। 

उत्तराखंड के पौड़ी जिले में उनके आवासिए स्थान पर उनके द्वारा बनाए गये चित्र, कविताओं के पोस्टर और कार्टून नेगी की जीवन शैली को आज भी बयां कर रहे हैं। डुबी संस्कृति और आपदाओं से विलुप्त हुए पलों को पोस्टरों के जरीये कला-संस्कृति एवं लोक साहित्य से जोड़ा है।

बी.मोहन नेगी जी ने अपने जीवन में गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, रंवाल्टी, नेपाली, पंजाबी, हिंदी व अंग्रेजी भाषा के लगभग 700 कविता पोस्टर बनाए। उनके चित्र शैली में नेगी ने पर्वतीय जीवन की संजीदगी से भरे हुए दिखाया हैं।

बी. मोहन नेगी जी का वाक्य “कोई भी चीज़ कबाड़ नहीं होती, कबाड़ में जुगाड़ छिपा होता है।”



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