बृहस्पतिवार, 6 अक्टूबर 2022 | 07:43 IST
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सियासत की शतरंज में नीतीश ने वही चाल क्यों चली जो मोदी चाहते थे ?


नवीन पाण्डेय 
लगता है बिहार के सीएम नीतीश कुमार दिल्ली पहुंचने की बहुत जल्दी में हैं। 2024 में विपक्ष की ओर से पीएम पद का चेहरा बनने की रेस में उन्होंने पहला बड़ा दांव चल दिया। क्या नीतीश को ये लगने लगा है कि अगर इस रेस में वे पहले दौड़ लगा देंगे तो बाकी के साथी संकोच में आकर उनसे मुकाबला करने का दुस्साहस नहीं करेंगे या कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा के नतीजे आने से पहले ही वे राहुल गांधी से रेस में आगे निकल जाएंगे। इन सभी मुद्दों पर चर्चा करेंगे, लेकिन सबसे पहले आपका स्वागत करना जरूरी है।
नमस्कार, मैं हूं नवीन पाण्डेय और खबरों के विश्लेषण के शो नवीन निष्कर्ष में आपका बहुत बहुत स्वागत है। 
बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने पहली बार एक एजेंडा पेश किया- अपनी बिहार सरकार का नहीं, बल्कि केन्द्र सरकार का। उन्होंने कहा कि अगर गैर बीजेपी सरकार बनती है तो सभी पिछड़े राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाएगा।   सुनिए क्या कहा ? 
 अब हो सकता है आप कहें कि इसमें नया क्या है, बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्जा तो नीतीश कई साल से मांग करते ही आ रहे हैं, जब बीजेपी के साथ थे, तब भी। बिल्कुल सही, लेकिन तब केवल मांग करते थे, अब वादा कर रहे हैं और वादा कौन करता है, जो सत्ता संभालने का दावा पेश करता है। यानी नीतीश कुमार ने बेहद सधे हुए अंदाज में कवर ड्राइव खेल दिया है। 
आठवीं बार बिहार के सीएम बने नीतीश कुमार देश के बेहद कद्दावर नेता हैं और वे पीएम पद के लिए नाकाबिल भी नहीं है। सबसे खास बात ये है कि लालू यादव पूरी तरह उनको पटना से निकलकर दिल्ली की ओर प्रस्थान करते हुए देखना चाहते हैं, ताकि उनके बेटे तेजस्वी का रास्ता साफ हो सके। नीतीश भी अब कितनी बार सीएम बने रहेंगे, वो भी तब जब उनकी पार्टी जेडीयू की सीटों लगातार घटती ही जा रही है। तो सारी स्क्र्पिट् तैयार हो चुकी है, हमने अपने पहले के शो में इन सब बातों का खुलासा् कर दिया था। 
नीतीश कुमार पहले से लिखी स्क्र्पिट के हिसाब से ही चल रहे हैं। 
कुछ दिन पहले उनकी दिल्ली यात्रा में विपक्षी नेताओं से मुलाकात में साफ देखा गया कि वे मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करना चाहते हैं। इसके लिए उनके पास एक ब्लूप्रिन्ट भी तैयार है। इसके तहत जो पार्टी जिस राज्य में मजबूत है, वो वहां बीजेपी को टक्कर दे और बाकी दल उसको हरसंभव सहयोग दें। उनका लॉजिक है कि मोदी सरकार एक तिहाई वोटों के सहारे ही चल रही है, जबकि 70 फीसदी वोट उनके खिलाफ गया है, तो अगर ये 70फीसदी वोट को बंटने से रोक लिया जाए तो बीजेपी को हराना मुश्किल नहीं है। 
सीटों में समझें तो एनडीए के पास 300 के आसपास सीटें हैं, अगर ऐसे हालात बना दिए जाएं कि एनडीए 200 सीटों से ऊपर न पहुंच पाए तो विपक्ष का पीएम बन सकता है। नीतीश ने यही गुणाभाग सोनिया से लेकर के. चंद्रशेखर राव, केजरीवाल और शरद पवार को समझाया। 
कागज पर तो नीतीश कुमार की ये दलील शानदार लगती हैं, लेकिन सियासत दरअसल व्यावहारिकता पर ज़्यादा चलती है। 
सियासत में नंबर्स का सबसे ज़्यादा महत्व होता है, लेकिन फिर भी गणित नहीं हैं, जहां टू प्लस टू इक्वल टू 4 ही होते हों। अगर ऐसा होता तो चंद्रशेखर, एच डी देवगौड़ा, इंदर कुमार गुजरात सरीखे नेता कभी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ ही नहीं पाते और खुद नीतीश कुमार भी गठबंधन में कम सीटों के बावजूद सीएम बने नहीं रहते। 
लेकिन हां इतना जरूर है कि नीतीश को अच्छे से पता है कि राजनीति कहीं न कहीं किस्मत का खेल भी हैं। अ्गर आप सही समय पर सही जगह पर टिके रहने का हुनर हासिल कर लें तो लॉटरी लगने के चांस भी कुछ न कुछ न होते हैं। तो नीतीश कुमार एक चांस के सहारे अपनी गोटियां फिट कर रहे हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। नीतीश जितनी मजबूती से पीएम पद की ओर बढ़ते दिखेंगे, विपक्षी क्षत्रप उनको कंट्रोल करने की कोशिश उतनी ही तेजी से  करेंगे। केजरीवाल और चंद्रशेखर राव ने तो कभी नहीं माना कि वे नीतीश को विपक्षी एकता का सूत्रधार भी मानते हैं। इसी तरह भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी भी अपना कद बढ़ा कर चुके होंगे, जिसके संकेत मिलने लगे हैं, तो ऐसे में कांग्रेस  भी नीतीश को कटटू साइज करने में लग जाएगी- और बीजेपी यही चाहती है। बीजेपी को लगता है कि जितनी जल्दी नीतीश खुलकर सामने आएंगे, पीएम चेहरा का मुद्दा बन जाएगा और विपक्ष में फूट पड़ेगी। 
यानी नीतीश भले संभल कर चल रहे हों, लेकिन गलती वही करने लगे हैं जो मोदी चाहते हैं। ऐसा करना उनकी मजबूरी भी है, क्योंकि गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनावों में अगर केजरीवाल को  आधी कामयाबी भी मिल गई तो वे सीधे मोदी के टक्कर में आ जाएंगे और फिर तुलना शुरू हो जाएगी। इसी तुलना से बचने के लिए नीतीश शुरू में ही बढ़त बनाकर चलना चाहते हैं। सियासी जानकार कहते हैं कि नीतीश के पास खोने के लिए अब ज़्यादा कुछ बचा नहीं है, अगर विपक्ष को कामयाबी मिल गई और पीएम नहीं भी बन पाए तो राष्ट्रपति जैसे पद पर दावा तो ठोक ही सकते हैं। तो कुल मिलाकर ये सब भविष्य की सियासी चालें हैं, जो अभी से फिट की जा रही हैं। 
अब सवाल उठता है कि क्या नीतीश जो सोच रहे हैं, जमीन पर हकीकत वैसी ही है। कुछ आंकड़ों पर भी गौर करना चाहिए। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से लोकसभा की 80 सीटें आती हैं और जिस तरह से अखिलेश यादव को विधानसभा चुनाव में करारी हार मिली है, उससे लगता नहीं है कि वे बीजेपी की सीटें आधी भी कर पाएंगे. हालांकि अभी डेढ़ साल वक्त है और वो कैसा गठबंधन तैयार करते हैं, काफी कुछ उस पर भी निर्भर करेगा। 
दूसरे नंबर के राज्य महाराष्ट्र में 48 सीटें हैं, जहां हाल ही में बीजेपी ने एक नाथ शिंदे को उद्धव ठाकरे से छीनकर किला फतह किया है और ऐसे में उद्धव और शरद पवार की जोड़ी कैसे बीजेपी के सामने खड़ी रह पाएगी। 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अभी तक हावी रही हैं, लेकिन मुख्य विपक्ष बनने के बाद बीजेपी की स्थिति वहां सुधरी नहीं तो कम से कम मौजूदा सीटें बरकरार तो रह ही सकती हैं। वैसे भी ममता किसी और को पीएम बनाने के लिए शायद ही समर्थन करें, अगर उनके पास ठीक ठीक सीटें रहेंगी तो। 
39 सीटों  वाले तमिलनाडु में एक तरफा मुकाबला होता है और वहां डीएमके बाजी मारती है तो स्टालिन खुलेआम राहुल गांधी को पीएम बनाने का ऐलान कर चुके हैं, ऐसे में नीतीश कुमार कैसे उनको मना पाएंगे। 
तो ऐसे में भारत जोड़ो यात्रा के जरिए लगातार अपनी छवि में सुधार कर रहे राहुल गांधी क्या इतनी आसानी से नीतीश कुमार को अगुवा बनने देंगे। अभी तो कांग्रेस को मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी एकजुटता दिखानी है, इसलिए नीतीश कुमार अच्छे लग रहे हैं, लेकिन सोनिया गांधी ये किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकतीहैं कि उनके बेटे राहुल के अलावा किसी और को पीएम चेहरा घोषित करने दें। ये एक ही सूरत में हो सकता है, जब नीतीश बिहार की तरह लोकसभा चुनाव में भी किंगमेकर की पोजिशन में आ जाएं, यानी एनडीए की कुछ सीटें घट रही हों और नीतीश के पास बिहार की 40 सीटों में करीब 20 सीटें सीटें आ जाएं और वे बार्गेनिंग की पोजिशन में आ जाएं। लेकिन ये होना असंभव जैसी बात है, क्योंकि कुल 40 सीटों में महागठबंधन के कई दावेदार हैं। बड़ी पार्टी होने के नाते आरजेडी भी आधी सीटों से कम पर मानेगी नहीं और ऐसे में नीतीश को लड़ने के लिए ही 20 से कम सीटें मिलेंगी तो बहुत शानदार प्रदर्शन के बावजूद भी सौ फीसदी नतीजे तो नहीं ला सकते। तो अभी ये दूर के ढोल सुहावने वाली बात है। उधर कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है और क्षेत्रीय दल के मुखिया नीतीश कुमार को आगे क्यों रखने को अभी से क्यों तैयार हो जाएगी। 
तब फिर नीतीश कुमार खाली-पीली जोश में दिखाई दे रहे हैं तो इसका जवाब है लालू यादव के भरोसे पर नीतीश कुमार खुलकर कूद गए हैं। उनका लगता है कि जब तक बाकी दावेदार संभलें, उनका इतना नाम चल जाए कि वे एक मजबूत उम्मीदवार दिखाईं दें। 
अब बात करते हैं जिस मुद्दे पर नीतीश ने दांव खेला है यानी पिछड़े राज्यों का दर्जा देने का। करीब12 साल पहले 2010 में भी नीतीश ने बिहार को पिछड़े राज्य का दर्जा देने की जोरदार मुहिम चलाई थी, तब पीएम मनमोहन सिंह थे। नीतीश सरकार ने उस समय बिहार में सवा करोड़ लोगों के हस्ताक्षर चलाकर यूपीए सरकार को भेजा, लेकिन तबके संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल पटना दौरे पर आए और मुंह पर ही साफ मना करके चले गए । फिर नीतीश ने 19 सितंबर से जन अधिकार यात्रा निकाली और 4 नवंबर 2010 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जन अधिकार रैली करके मांग को जोरदार ढंग से उठाया। तब भी नीतीश ने सब पिछड़े राज्यों के सीएम को एक साथ आने का आह्वाम किया तो लालू यादव ने इसे नीतीश की नौटंकी करार दिया था। 
तो अब क्या वही लोग नीतीश कुमार की  मांग मान लेगें। जाहिर है विशेष राज्य का दर्जा नीतीश का एक सोचा समझा दांव है, जिससे राज्य के लोगों की भावनाओं को भुनाना आसान हो जाता है। 
मौजूदा वक्त में देश के अंदर 11 राज्य ऐसे हैं, जिनको विशेष दर्जा मिला हुआ है. इसमें अरुणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड शामिल है.
किसी राज्य की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक और संसाधन के लिहाज से उसकी क्या स्थिति है, इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष राज्य का दर्जा दिया जाता है. विशेष राज्य का दर्जा कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है. केंद्र सरकार अपने विवेक से उपरोक्त परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष राज्य का दर्जा देती है.
1969 में पांचवें वित्त आयोग के कहने पर केंद्र सरकार ने पहली बार 
तीन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया था. नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल ने पहाड़, दुर्गम क्षेत्र, कम जनसंख्या, आदिवासी इलाका, अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर, प्रति व्यक्ति आय और कम राजस्व के आधार पर इन राज्यों की पहचान की थी. 1969 में असम, नगालैंड और जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्ज दिया गया था. बाद में अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा, हिमाचल और उत्तराखंड को विशेष राज्य का दर्जा मिला. हर बार बिहार को इस कैटिगैरी से बाहर कर दिया जाता है, लेकिन नीतीश जब भी कुछ बड़ा करना चाहते हैं इस मुद्दे को भुना लेते हैं। 
विशेष राज्य का दर्जा मिलने के फायदे?
विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त राज्यों को केंद्र सरकार से 90 फीसदी अनुदान मिलता है. इसका मतलब केंद्र सरकार से जो फंडिंग की जाती है उसमें 90 फीसदी अनुदान के तौर पर मिलती है और बाकी 10 फीसदी रकम बिना किसी ब्याज के मिलती है. जिन राज्यों को विशेष दर्जा प्राप्त नहीं है उन्हें केवल 30 फीसदी राशि अनुदान के रूप में मिलती है. 70 फीसदी रकम उनपर केंद्र का कर्ज होता है.
तमाम टैक्स में रियायत
इसके अलावा विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को एक्साइज, कस्टम, कॉर्पोरेट, इनकम टैक्स में भी रियायत मिलती है. केंद्र सरकार हर साल प्लान्ड बजट बनाती है. प्लान्ड बजट में से 30 फीसदी रकम विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों को मिलता है. अगर विशेष राज्य जारी बजट को खर्च नहीं कर पाती है तो पैसा अगले वित्त वर्ष के लिए जारी हो जाता है.
आंध्र प्रदेश और बिहार लंबे समय से विशेष दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं. लेकिन, 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद मोदी सरकार ने साफ कर दिया था अब यह दर्जा नॉर्थ ईस्ट और पहाड़ी राज्यों के अलावा किसी और राज्य को नहीं मिल सकता है। तो ऐसे में नीतीश कुमार का ये शिगूफा बिहार में उनको लोकप्रिय बना सकता है, जिसकी उनको सख्त जरूरत है। जिस तरह लगातार नई सरकार बनने के बाद अपराधियों के हौसले बढ़े है, लोग सवाल उठाने लगे हैं। हो सकता है राजकाज के सवाल टालने के लिेए नीतीश ने बड़ा मुद्दा उछाला हो। आखिर ऐसे ही वे 22 साल से सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठे हैं। तो सब अपने अपने दांव चल रहे हैं।

 



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