बृहस्पतिवार, 17 अक्टूबर 2019 | 06:12 IST
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हरिद्वार में रही मुल्तान जोत महोत्सव की धूम,मुल्तान समाज के लोगों पहुंचे हर की पैड़ी


हरिद्वार में हर क़ी पैड़ी सतरंगी हो गयी,यहां गंगा के साथ होली खेली गयी। देश भर से मुल्तान समाज के लोग यहां पहुंचे और हर क़ी पौड़ी को मुल्तानी रंग में रंग दिया। उन्होंने यहां ब्रह्मकुंड में गंगा के साथ दूध क़ी होली खेली। करीब 107 साल पहले सन 1911 में मुल्तान के व्यापारी लाला रूपचंद ने पैदल आकर हरिद्वार में माँ गंगा में जोत प्रवाहित क़ी थी। तब से यह समाज के लोग जोत उत्सव मनाते आ रहे हैं। इस साल ये 106 वां जोत उत्सव था। समाज के लोग नाचते-गाते घाट तक पहुंचे। पहले नदी का अभिषेक किया और फिर होली खेली गई।

हरिद्वार हर क़ी पैड़ी पर सतरंगा माहौल दिखाई दिया इस सतरंगे माहौल मे देश के अलग-अलग स्थानों से आकर मुल्तान समाज के लोगो ने हर क़ी पैड़ी के धार्मिक माहौल को रंगीन कर दिया साथ ही माँ गंगा के साथ जमकर दूध क़ी होली खेली और माँ गंगा की आराधना की मुल्तान समाज द्वारा दूध की होली के कार्यक्रम में इस बार देश भक्ति का रंग भी लोगों के सर चढ़कर बोला और तिरंगे झंडे के साथ मां गंगा के जयकारों के साथ हरिद्वार की सड़के गुंजायमान हुई।

 

कहा जाता हैं कि आज से करीब 109 साल पहले सन 1911 में पकिस्तान में रहने वाले व्यापारी लाला रूपचंद ने पैदल आकर हरिद्वार में माँ गंगा में जोत प्रवाहित क़ी थी। दरअसल में लाला रूपचंद की दस औलाद थी लेकिन उनकी कोई भी औलाद बच नहीं पाई एक दिन जब उनकी लड़की को गंभीर चोट लगी तो फिर उन्हें लगा की उनकी यह औलाद भी बच नहीं पायेगी फिर उन्हें किसी ने कहा की अगर वह हरिद्वार पैदल गंगा माँ में जाकर जोत जलाएंगे तो गंगा मैया के आशीर्वाद से उनके दुःख दूर होंगे इस पर लाला जी मुल्तान से जोत लेकर हरिद्वार आये थे। और उनकी कामना पूरी हुई थी लाला रूपचंद के द्वारा शुरू क़ी गई यह यात्रा आज परम्परा का रूप ले चुकी है मुल्तान जोत महोत्व के रूप में मुल्तान समाज के लोग माँ गंगा से दूध की होली खेलकर देश और समाज की खुशहाली और गंगा माँ की रक्षा और गंगा को पवित्र रखने की कमाना कर रहे है  

पाकिस्तान से शुरू हुई यह यात्रा में आज भले ही देश के अलग-अलग जगहों से आकर लोग हरिद्वार में इकठा होते हो लेकिन पहले कि तरह ही आज भी लोग लाला रूप चंद को याद करते हुए जोत महोत्सव को बड़ी धूम-धाम से मनाते है लाला रूप चंद की उस पहल को आज परम्परा का रूप देने के लिए यंहा पहुँचते है और लाला रूप चंद ने भाईचारे और आपसी सोहार्द की जो मिशल कायम की थी उसे आज भी बरक़रार रखने का प्रयास किया जाता है।



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