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राहुल गांधी को 'डील' करने में बड़ी 'ग़लती' कर गए मोदी ?


नवीन पाण्डेय 
मोदी सरनेम केस में सुप्रीम कोर्ट से राहुल गांधी की सजा पर रोक क्या लगी, कांग्रेस में जैसे नई जान आ गई। पूरे देश के कांग्रेसी ऐसे जश्न में डूब गए, जैसे कांग्रेस ने दिल्ली की गद्दी मोदी से छीन ली हो। हालांकि जिस तरह से हालात थे, राहुल गांधी को राहत मिलनी ही थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी करके कहीं न कहीं अहसास करा दिया कि राहुल गांधी के साथ ज़्यादती की गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जिस तरह से ये कहा कि क्या दो साल से एक महीने की ही सजा भी हाईकोर्ट घटा देता तो क्या दिक्कत थी,. इसके बाद साफ है कि उनकी सजा पर नए सिरे से बहस होगी। खैर इस फैसले के बाद विपक्षी गठबंधन इंडिया में भी नया जोश आ गया और अब बिलाशक राहुल गांधी विपक्ष के बड़े नेता के तौर पर सामने आएंगे। संसद से लेकर सड़क तक वे मोदी सरकार को घेरेंगे और उसी अंदाज में प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाएंगे, जैसे मोदी उनके बारे में किया करते थे।
अब सवाल उठता है कि जिस तरह से राहुल गांधी को छोटे छोटे मामलों में कभी ईडी के सामने, कभी सीबीआई के सामने, कभी सोशल मीडिया पर पप्पू साबित करने की कोशिश की गई तो कभी उनका घर खाली करवा लिया गया, जबकि कई दूसरे मामलों में छूट दी गई। तो क्या देश की जनता ये सब नहीं देख रही है। कुछ सियासी जानकारों का मानना है कि ये सब बीजेपी जानबूझकर कर रही है, ताकि राहुल सियासी मैदान में मोदी से लड़ने को मजबूर हो जाएं। बीजेपी हर हाल में 2024 की लड़ाई मोदी बनाम राहुल गांधी करना चाहती है। बीजेपी को अच्छी तरह अहसास है कि जब जनता के सामने प्रधानमंत्री के दो चेहरे होंगे तो किसको चुना जाएगा। उधर कांग्रेस की रणनीति है कि मिलकर चुनाव लड़ा जाए और फिर सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बैकडोर से राहुल को पीएम बना दिया जाए। मोदी इसीलिए राहुल गांधी को टारगेट करके बड़ा नेता बना रहे हैं, ताकि जनता की नजरों में राहुल गांधी पीएम पद के दावेदार दिखाई दें। फिर मुकाबला आर-पार का होगा। अब सवाल उठता है कि जिस तरह से भारत जोड़ो यात्रा और फिर कर्नाटक में कांग्रेस को जीत मिली, क्या मोदी की रणनीति  ठीक जा रही है। 
सबसे बड़ी चुनौती अब संसद में राहुल से बीजेपी को मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राहुल गांधी की संसद सदस्यता बहाल होने और 2024 में उनके चुनाव लड़ने का रास्ता साफ होने से कांग्रेस का जोश हाई हो गया है। संसद में अब राहुल गांधी की पहले से भी कड़े तेवरों के साथ वापसी होने जा रही है। मौजूदा दौर में राहुल गांधी बिना शक विपक्ष के सबसे असरदार नेता और नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार के खिलाफ सबसे मुखर आवाज हैं। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक वह मोदी सरकार को घेरते आए हैं। 'भारत जोड़ो यात्रा' के बाद उनकी एक परिपक्व और जुझारू नेता की छवि उभरी है। इससे कहा जा सकता है कि बीजेपी की चुनौती बढ़ेगी। 
सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐसे वक्त आया है जब अगले लोकसभा चुनाव में बमुश्किल 8-9 महीने बचे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट से राहुल गांधी को मिली ये बड़ी राहत कांग्रेस का हौसला बढ़ाने वाली है। 'मोदी सरनेम' पर टिप्पणी से जुड़े मानहानि केस में सूरत कोर्ट से राहुल गांधी को सजा सुनाए जाने और उसके बाद उनकी संसद सदस्यता रद्द होने के बाद कांग्रेस की हालत एक ऐसी सेना की हो गई थी जिसका सेनापति ही चाहते हुए भी युद्ध में हिस्सा नहीं ले पा रहा। सेनापति की वापसी से सेना का जोश हाई होना लाजिमी है। राहुल गांधी ने पिछले 2-3 सालों में कड़ी मेहनत से 'अनिच्छुक राजनीतिज्ञ' और 'अपरिपक्व' राजनेता की उस छवि को ध्वस्त करने में बहुत हद तक कामयाबी हासिल की है जिसे उनके विरोधियों ने गढ़ी है। 'भारत जोड़ो यात्रा' उसका सबसे बड़ा प्रमाण है। राहुल सीधे आम जनता से मुखातिब हो रहे हैं। ट्रक ड्राइवर हो या सब्जी वाला, बाइक मैकैनिक हो या रेहड़ी वाला...वह सीधे आम जनता से कनेक्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी मोहब्बत की दुकान वाला स्लोगन भी बीजेपी पर भारी पड़ रहा है। 
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस जोश में है। जश्न मना रही है। उनका सेनापति जो चुनावी समर से ठीक पहले लौट आया है।
सुप्रीम कोर्ट से राहुल गांधी को मिली राहत के बाद विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के कुछ सहयोगी दलों की चुनौती भी बढ़ने वाली है। राहुल गांधी के चुनावी परिदृश्य से बाहर देखकर विपक्षी गठबंधन के कई सहयोगी दलों की प्रधानमंत्री पद की हसरत परवान चढ़ रही थी। वह कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश में जुटी थीं कि अगर राहुल गांधी चुनाव नहीं लड़ पाते हैं तो किसी अन्य दल के नेता को पीएम फेस के तौर पर उतारा जाए। टीएमसी, आम आदमी पार्टी, जेडीयू जैसे I.N.D.I.A. के कई सहयोगी दलों को विपक्ष की तरफ से 'प्रधानमंत्री पद के चेहरे' में अपने-अपने नेताओं की छवि दिखाई दे रही थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद परिस्थितियां बदल गई हैं। अब इन नेताओं की हसरत 'मुंगेरी लाल के हसीन सपने' में तब्दील हो सकती है। I.N.D.I.A. की सबसे बड़ी घटक कांग्रेस गठबंधन की कवायद शुरू होने के बाद से अबतक प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर बहुत संभलकर बोल रही थी, लेकिन अब वह इस पर अपनी दावेदारी को स्वाभाविक बताते हुए आक्रामक हो सकती है। इससे I.N.D.I.A. के भीतर ही रार की स्थिति पैदा हो सकती है।
पीएम पद को लेकर टीएमसी की मुखिया और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। राहुल गांधी के सीन से गायब होने को टीएमसी अपने लिए मौके के रूप में देख रही थी। तभी तो बेंगलुरु में पिछले महीने 18 जुलाई को I.N.D.I.A. की बैठक के बाद जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि कांग्रेस को सत्ता या प्रधानमंत्री पद में कोई रुचि नहीं है तो टीएमसी ने ममता बनर्जी की दावेदारी पेश करने में तनिक भी देर नहीं लगाई। टीएमसी सांसद शताब्दी राय से जब खरगे के बयान को लेकर पूछा गया तो उन्होंने तपाक से कहा कि तब तो हम चाहेंगे कि विपक्ष की तरफ से ममता बनर्जी प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनें। राय ने कहा कि अगर कांग्रेस पीएम पद की रेस में नहीं है तो वह चाहेंगी कि उनकी नेता राज्य की सीएम से पीएम पद तक पहुंचे। ममता बनर्जी सार्वजनिक तौर पर राहुल गांधी का उपहास उड़ा चुकी हैं। वह बार-बार संकेत दे चुकी हैं कि उन्हें राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार नहीं है। I.N.D.I.A. गठबंधन बनने से पहले तक वह नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुद को विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट करती आई हैं। अब राहुल गांधी की वापसी से उनकी चुनौती जरूर बढ़ गई है। यही हाल बिहार के सीएम नीतीश कुमार का भी है।
राहुल गांधी की संसद सदस्यता छिनने के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस के भीतर केंद्रीय भूमिका की मांग जोर पकड़ रही थी। राहुल चुनाव नहीं लड़ सकते थे लिहाजा प्रियंका गांधी वाड्रा के लोकसभा चुनाव लड़ने की अटकलें तेज हो गई थीं। कांग्रेस के भीतर ये मांग भी होने लगी थी कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रियंका को चेहरा बनाया जाए। हालांकि, कांग्रेस अगर ऐसा चाहती तब भी गठबंधन की मजबूरियों की वजह से उसके हाथ बंधे थे। लेकिन सियासी पंडित ये मानकर चल रहे थे कि अगर 2024 में I.N.D.I.A. गठबंधन के सत्ता में आने के समीकरण उभरती तो राहुल गांधी की नामौजूदगी में कांग्रेस प्रधानमंत्री पद के लिए प्रियंका गांधी वाड्रा को आगे करती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस को अब किसी 'प्लान बी' की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
अब आते हैं बीजेपी के मोदी बनाम राहुल वाले प्लान पर। भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी उतने भी कमजोर नेता नहीं रह गए हैं। इंडिया गठबंधन अगर सीटों के तालमेल में कामयाब हो गया तो फिर बीजेपी की चुनौती तगड़ी हो जाएगी। रही मोदी बनाम राहुल की तो, कांग्रेस को इस रणनीति का अहसास है, इसलिए वो इससे बचने का रास्ता खोज ही लेगी। कांग्रेस को इतना ही कहना है कि राहुल गांधी पीएम पद के राजनीति में नहीं हैं। चुनाव बाद सब मिलकर नेता का नाम तय कर लेंगे। ऐसे में बीजेपी का दांव एकतरफा हो  जाएगा। तो कह सकते हैं कि राहुल गांधी को डील करने में बीजेपी से गलतियां हुई हैं। अगर बीजेपी, राजस्थान का चुनाव नहीं जीत पाई तो फिर ये गलती बेहद घातक साबित हो जाएगी, क्योंकि फिर मोदी सरकार के खिलाफ उल्टी हवा दिख जाएगी। तो बीजेपी को अब राहुल के खिलाफ बेहद संभलकर 2024 की रणनीति बनानी होगी। 

 



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