सोमवार, 23 सितंबर 2019 | 09:18 IST
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उत्तराखंड में स्थिति है एक ऐसा मंदिर जहां नागराज मणि के साथ निवास करते हैं


देश के कई ऐसे मंदिर हैं, जहां महिलाओं को अंदर जाने की इजाजत नहीं है। यह कई बार बहस का विषय भी रहा है कि स्त्री-पुरुष के बीच मंदिर में भेदभाव क्यों किया जाता है, लेकिन उत्तराखंड में ऐसा भी एक मंदिर हैं, जहां महिला हो या पुरुष, किसी भी श्रद्धालु को अंदर जाने की इजाजत नहीं है।

यह मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में वांण नामक गांव में है। राज्य में यह देवस्थल लाटू मंदिर नाम से विख्यात है। यहां लाटू देवता की पूजा होती है। खास बात यह है कि इस मंदिर में किसी वीआईपी की भी नहीं चलती है। वह भी अंदर नहीं जा सकता। यहां तक कि मंदिर के पुजारी को भी आंख, नाक और मुंह पर पट्टी बांधकर देवता की पूजा करनी पड़ती है। मान्यता है कि इस मंदिर के अंदर साक्षात रूप में नागराज अपने अद्भुत मणि के साथ वास करते हैं। जिसे देखना आम लोगों के वश की बात नहीं है। पुजारी भी साक्षात विकराल नागराज को देखकर न डर जाएं, इसलिए वे अपने आंख पर पट्टी बांधते हैं। श्रद्धालु इस मंदिर परिसर से काफी दूर रहकर पूजा कर मन्नतें मांगते हैं।

लाटू देवता मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में देवाल नामक ब्लॉक में “वांण” नामक स्थान पर स्थित है। यह मंदिर समुन्द्र सतह से 8500 फीट की ऊँचाई पर स्थित विशाल देवदार वृक्ष के निचे एक छोटा मंदिर है। लाटू देवता को उत्तराखंड की आराध्या देवी नंदा देवी का धर्म भाई माना जाता है। प्रत्येक 12 सालों में उत्तराखंड की सबसे लंबी श्री नंदा देवी की राज जात यात्रा  का बारहवां पड़ाव वांण गांव है। लाटू देवता वांण गांव से हेमकुंड तक नंदा देवी का अभिनंदन करते हैं। लाटू देवता मंदिर के बारे में यह माना जाता है कि इस मंदिर के अंदर साक्षात रूप में नागराज मणि के साथ निवास करते हैं। श्रद्धालु साक्षात नाग को देखकर डरे न इस लिए मुंह और आंख पर पट्टी बांधी जाती है। यह भी कहा जाता है कि पुजारी के मुंह की गंध देवता तक न पहुंचे इसलिए पुजारी के मुंह पर पूजा अर्चना के दौरान भी पट्टी बंधी रहती है। लाटू देवता मंदिर में मूर्ति के दर्शन नहीं किए जाते हैं। सिर्फ पुजारी ही मंदिर के भीतर पूजा व अर्चना के लिए जाते है।

लाटू देवता मंदिर में प्रवेश करते समय पुजारी की आंख पर पट्टी बांधी जाती है। ग्रामीणों के अनुसार मंदिर में नाग मणि विराजमान है। मणि के दर्शन करने पर आंखों की रोशनी जा सकती है। इसलिए पुजारी आंख पर पट्टी बांधकर ही मंदिर में प्रवेश करते हैं। मंदिर से 75 फीट की दूरी पर श्रद्धालु पूजा अर्चना करते है। जिस दिन लाटू देवता मंदिर के कपाट खुलते हैं। उस दिन यहां पर विष्णु सहस्रनाम व भगवती चंडिका का पाठ भी आयोजित किया जाता है। लाटू देवता को स्थानीय लोग आराध्य देवता मानते है। वाण में स्थित लाटू देवता के मंदिर का कपाट सालभर में एक ही बार खुलता हैं। इस दिन यहां विशाल मेला आयोजित होता है। वांण क्षेत्र में लाटू देवता के प्रति लोगों में बड़ी श्रद्धा है। लोग अपनी मनोकामना लेकर लाटू देवता के मंदिर में आते हैं। कहते हैं यहां से मांगी मनोकामना जरुर पूरी होती है।

लाटू देवता के विषय में पौराणिक कथा है कि जब देवी पार्वती के साथ भगवान शिव का विवाह हुआ तो पार्वती जिसे नंदा देवी नाम से भी जाना जाता है। इन्हें विदा करने के लिए सभी भाई कैलाश की ओर चल पड़े। इसमें चचेरे भाई लाटू भी शामिल थे। मार्ग में लाटू को इतनी प्यास लगी कि पानी के लिए इधर-उधर भटकने लगे। इस बीच लाटू देवता को एक घर दिखा और पानी की तलाश में घर के अंदर पहुंच गए। घर का मालिक बुजुर्ग था। बुजुर्ग ने लाटू देवता से कहा कि कोने में मटका है पानी पी लो। घर के अंदर कांच के घड़े में जान (स्थानीय स्तर पर बनने वाली कच्ची शराब) और मिट्टी के दूसरे घड़े में पानी था, लेकिन जान इतना स्वच्छ रहता है कि लाटू उसे साफ पानी समझकर पी लेता है। जब लाटू को पता चलता है कि उसने पानी की जगह शराब पी ली है| तो कुछ ही देर में मदिरा अपना असर दिखाना शुरु कर देती है और लाटू देवता नशे में उत्पात मचाने लगते है। इसे देखकर देवी पार्वती क्रोधित हो जाती है और लाटू को कैद में डाल देती है। देवी पार्वती के आदेशानुसार लाटू देवता को हमेशा कैद में ही रख दिया जाता है।

माना जाता है कि कैद खाने में लाटू देवता एक विशाल सांप के रुप में विराजमान रहते हैं। इन्हें देखकर पुजारी डर न जाएं इसलिए यह आंखों पर पट्टी बांधकर मंदिर का द्वार खोलते हैं।



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