शनिवार, 24 अगस्त 2019 | 04:27 IST
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पीएम मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में लद्दाख के जिस पेड़‘सोलो’ का जिक्र किया था,आखिर वह है क्या?


 प्राचीन काल से ही हिमालय पर संजीवनी बूटी होने को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। संजीवनी बूटी की चर्चा रामचरित मानस में भी हुई है। रामायण में मेघनाद के बाण से मूर्छित लक्ष्मण की जान बचाने के लिए हिमालय की कंदराओं से हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आए थे। आखिरकार संजीवनी बूटी की मदद से लक्षमण को बचा लिया गया था। वैज्ञानिक, सोलो नाम के पौधे के गुणों से इस कदर उत्‍साहित हैं कि लगता है कि जैसे 'संजीवनी' की तलाश अब खत्म हो गई है। यह पौधा बढ़ती उम्र को रोकने में सहायक है। साथ ही ऑक्सीजन की कमी के दौरान न्यूरॉन्स की रक्षा भी करता है। वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी कहना है कि लद्दाख क्षेत्र में कई ऐसी जड़ी बूटियां हैं, जो चिकित्‍सा और रोजगार के क्षेत्र में बेहद मददगार साबित हो सकती हैं। 

अनुच्छेद-370 हटाने और जम्‍मू-कश्‍मीर के विभाजन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि लद्दाख और जम्‍मू-कश्‍मीर के लोगों के सामने सुनहरा भविष्य है। लगभग 40 मिनट के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों की हर चिंता को छूने की कोशिश की । प्रधानमंत्री मोदी ने लद्दाख और जम्‍मू-कश्‍मीर के क्षेत्रों में पैदा होने वाले कई उत्पादों का जिक्र किया जिनकी पूरी दुनिया में भारी मांग है। उन्‍होंने कहा कि ये बेशकीमती उत्पाद क्षेत्र के लोगों की आमदनी का जरिया बन सकते हैं। प्रधानमंत्री ने खास तौर पर 'सोलो' नाम के पौधे का जिक्र किया, जिसका बड़े पैमाने पर औषधीय इस्‍तेमाल किया जाता है।

'सोलो' नाम का यह पौधा मूल रूप से लद्दाख के ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। काफी समय तक स्थानीय लोग इसके व्‍यापक औषधीय गुणों से अज्ञात थे। यह पौधा अत्‍यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में सांस लेने में परेशानी होने की समस्‍या से उबरने में बेहद कारगर होता है। आयुर्वेद के जानकारों का दावा है कि इस पौधे की मदद से शरीर को पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालने में भी मदद मिलती है। कम ऑक्‍सीजन के ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात भारतीय सेना के जवान भी इसका इस्तेमाल अपनी शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए करते हैं।

'सोलो' का वैज्ञानिक नाम रहोडियोला (Rhodiola) है। हालांकि, लद्दाख के लोग इसे 'सोलो' के नाम से ही जानते हैं। हिमालय की ऊंची चोटियों पर जिंदगी किसी चुनौती से कम नहीं है। स्‍थानीय लोगों को इन इलाकों में जीवन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। स्थानीय लोग इस पौधे के पत्तेदार हिस्सों का इस्तेमाल सब्जी के रूप में करते आए हैं। अब लेह स्थित डिफेंस इंस्‍टीट्यूट ऑफ हाई एल्‍टीट्यड रिसर्च (Defence Institute of High Altitude Research, DIHAR) इस पौधे के औषधीय गुणों का विस्‍तार से अध्ययन कर रहा है।

लेह स्थित डिफेंस इंस्‍टीट्यूट ऑफ हाई एल्‍टीट्यड रिसर्च (Defence Institute of High Altitude Research, DIHAR) के वैज्ञानिकों का दावा है कि यह औषधि सियाचिन जैसी प्रतिकूल जगहों पर रह रहे भारतीय सेना के जवानों के लिए चमत्‍कारिक साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पौधा कम ऑक्‍सीजन वाले, ऊंचे इलाकों में रोगप्रतिरोधक प्रणाली को बेहतर रखने और रेडियोएक्टिव प्रभाव से बचाने में कारगर है। यही नहीं यह औषधि अवसाद को कम करने और भूख बढ़ाने में भी लाभकारी है। सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में जवानों में डिप्रेशन और भूख कम लगने की समस्‍या के इलाज में यह फायदेमंद है। 

 

 



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