रविवार, 29 मार्च 2020 | 11:32 IST
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जानिए उत्तराखंड के कण-कण में क्यों बसते हैं देव...


कहते है कि अगर आस्था हो तो पत्थर भी भगवान बन जाते है। और अगर बात देवभूमि उत्तराखंड की हो तो उत्तराखंड में कंकर-कंकर भी शकंर के रूप पूजा जाता है। गौ, गंगा और गायंत्री की पावन त्रिवेणी यहीं बसती है। उत्तराखंड के गांव गांव में न जाने कितने ऐसे मंदिर है जो अपनी विश्वसनीयता के कारण दूर-दूर तक जाने पहचाने जाते है। 
अनुसूया देवी
अनुसूया माता का मन्दिर  उत्तराखण्ड  के चमोली ज़िले  में क़रीब छ: किलोमीटर की ऊँचाई पर बीच घने पहाड़ों में स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर में जप और यज्ञ करने वालों को संतान की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि  इसी स्थान पर माता अनसूया ने अपने तप के बल पर 'त्रिदेव' ब्रह्मा विष्णु और शंकर को शिशु रूप में परिवर्तित कर पालने में खेलने पर मजबूर कर दिया था। सत्रहवीं सदी में कत्यूरी राजाओं ने इस स्थान पर अनुसूया देवी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। अठारहवीं सदी में आए विनाशकारी भूकंप से यह मंदिर ध्वस्त हो गया। इसके बाद संत गिरी जी महाराज ने ग्रामीणों की मदद से इस मंदिर का पुन: निर्माण करवाया।
भारत माता मंदिर
भारत माता मन्दिर हरिद्वार में स्थित है, जिसे 'मदर इण्डिया'  के नाम प्रसिद्धी हासिल है। भारत माता मंदिर में आठ मंजिल इमारत है और यह 180 फुट की उंचाई पर स्थित है। आठवीं मंजिल प्रकृति प्रेमी और आध्यात्मिक व्यक्ति दोनों के लिए एक उपहार के सामान है, क्योंकि यहाँ भगवान शिव का मंदिर भी विराजमान है। इसका निर्माण प्रसिद्ध धार्मिक गुरु स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी द्वारा करवाया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने वर्ष 1983 में इस मंदिर का उद्घाटन किया
चंडी देवी
चंडी देवी मंदिर उत्तराखण्ड की पवित्र धार्मिक नगरी हरिद्वार में नील पर्वत के शिखर पर स्थित है। यह गंगा नदी के दूसरी ओर अवस्थित है। यह देश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। चंडी देवी मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण कश्मीर के राजा सुचेत सिंह द्वारा 1929 ई. किया गया । कहा जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में चंडी देवी की मूल प्रतिमा यहाँ स्थापित करवाई थी।
देवी धूरा मंदिर 
श्रावण मास की पूर्णिमा को हज़ारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाला पौराणिक धार्मिक ओर ऐतिहासिक स्थल देवीधुरा अपने अनूठे पाषाण युद्ध के लिये पूरे भारत में प्रसिद्ध है। इस मंदिर को देवीधुरा के साथ माँ वाराही के नाम से जाना जाता है। टनकपुर के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है शक्तिपीठ माँ देवीधुरा का यह मंदिर । श्रावण मास में पूरे पखवाड़े तक यहाँ मेला लगता है। जहाँ सबके लिये यह दिन रक्षाबंधन का दिन होता है वहीं देवीधुरा के लिये यह दिन पत्थर-युद्ध अर्थात 'बग्वाल का दिवस' होता है।
धारी देवी मंदिर 
बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर श्रीनगर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर कलियासौड़ में अलकनन्दा नदी के किनारे सिद्धपीठ माँ धारी देवी का मंदिर स्थित है । माँ धारी देवी प्राचीन काल से उत्तराखण्ड की रक्षा करती है, सभी तीर्थ स्थानों की रक्षा करती है । माँ धारी देवी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है । वर्ष 1807 से इसके यहां होने का साक्ष्य मौजूद है पुजारियों और स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर इससे भी पुराना है । 1807 से पहले के साक्ष्य गंगा में आई बाढ़ में नष्ट हो गए हैं । 1803 से 1814 तक गोरखा सेनापतियों द्वारा मंदिर को किए गए दान अभी भी मौजूद है । बताया जाता है कि ज्योतिलिंग की स्थापना  के लिए जोशीमठ जाते समय आदि शंकराचार्य ने श्रीनगर में रात्रि विश्राम किया था । इस दौरान अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्होंने धारी माँ की आराधना की थी, जिससे वे ठीक हो गए थे । तभी उन्होंने धारी माँ की स्तुति की थी ।

कुंजापुरी माता मंदिर 
यह मंदिर उत्तराखंड में अवस्थित 51 सिद्ध पीठों में से एक है। कुंजापुरी मंदिर अपने आप में ही श्वेतमय है। हालांकि, इसके कुछ हिस्से चमकीले रंगों में रंगे गए हैं मन्दिर तक पहुंचने के लिये तीर्थनगरी ऋषिकेश से टिहरी राजमार्ग पर पहले लगभग २३ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हिन्डोलाखाल नामक एक छोटे से पहाड़ी बाजार तक का सफर तय करना पड़ता है, जहां से लगभग ४ किलोमीटर की दूरी पर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है माता कुन्जापुरी मन्दिर। हिन्डोलाखाल से मन्दिर तक पहुंचने के लिये सड़क तथा पैदलमार्ग दोनों हैं।
 सुरकंडा माता मंदिर 
मन्दिर तक पहुंचने के लिये तीर्थनगरी ऋषिकेश से टिहरी राजमार्ग पर पहले लगभग २३ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हिन्डोलाखाल नामक एक छोटे से पहाड़ी बाजार तक का सफर तय करना पड़ता है, जहां से लगभग ४ किलोमीटर की दूरी पर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है माता कुन्जापुरी मन्दिर। हिन्डोलाखाल से मन्दिर तक पहुंचने के लिये सड़क तथा पैदलमार्ग दोनों हैं। मन्दिर तक पहुंचने के लिये तीर्थनगरी ऋषिकेश से टिहरी राजमार्ग पर पहले लगभग २३ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हिन्डोलाखाल नामक एक छोटे से पहाड़ी बाजार तक का सफर तय करना पड़ता है, जहां से लगभग ४ किलोमीटर की दूरी पर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है माता कुन्जापुरी मन्दिर। हिन्डोलाखाल से मन्दिर तक पहुंचने के लिये सड़क तथा पैदलमार्ग दोनों हैं।

कासर देवी (अल्मोड़ा)
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित कसारदेवी मंदिर की अपार शक्ति से बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी हैरान हैं। दुनिया में केवल तीन ही पर्यटन स्थल ऐसे हैं जहां कुदरत की खूबसूरती के दर्शनों के साथ ही मानसिक शांति भी महसूस होती है। ये अद्वितीय और चुंबकीय शक्ति के केंद्र भी हैं। 
नैना देवी
नैना देवी मंदिर अथवा नयना देवी मंदिर नैनीताल में नैनी झील के उत्त्तरी किनारे पर स्थित है। 1880 में भूस्खलन से यह मंदिर नष्‍ट हो गया था। बाद में इसे दुबारा बनाया गया। यहां सती के शक्ति रूप की पूजा की जाती है। यह मंदिर हिंदू देवी, ‘नैना देवी’ को समर्पित है। नैना देवी की प्रतिमा के साथ भगवान श्री गणेश और काली माता की मूर्तियाँ भी इस मंदिर में प्रतिष्ठापित हैं। पीपल का एक विशाल वृक्ष मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित है। मंदिर में दो नेत्र हैं जो नैना देवी को दर्शाते हैं। नैनी झील के बारे में माना जाता है कि जब शिव सती की मृत देह को लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तब जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थाकपना हुई। कहा जाता है कि नैनी झील के स्थाीन पर देवी सती के नेत्र (नयन) गिरे थे। इसी से प्रेरित होकर इस मंदिर का नाम नयना देवी (नैना देवी) पड़ा।
नंदा देवी
नंदा देवी समूचे गढ़वाल मंडल और कुमाऊं मंडल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं। नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं। रुप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है। भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है। नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है। भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हर सिद्धी हैं। शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है। शक्ति के रुप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं।

लेख- श्रवण सेमवाल



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