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महाभारत के कर्ण के नाम पर बसा कर्ण-प्रयाग, बेहद खूबसूरत जगह


उत्तराखंड के पांच प्रयागों में से एक अलकनंदा और पिंडर नदी के संगम पर कर्णप्रयाग नगर बसा है।  आसपास के तमाम ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने का यह एक कस्बा है, जहां दूरदराज के गांवों से जुड़े लोग तमाम छोटी बड़ी जरूरत के सामान को लेने पहुंचते हैं। माना जाता है कि महाभारत के पात्र दानवीर कर्ण के नाम पर ही इस नगर का नाम कर्णप्रयाग पड़ा है।
उत्तराखंड के चमोली जिले में कर्णप्रयाग शहर अलकनंदा और पिंडर नदी के संगम पर बसा है, जो धार्मिक, पर्यटन, राजनैतिक ऐतिहासिक दृष्टि से अपना बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कर्णप्रयाग अपर गढ़वाल का केंद्र रहा है और यह गढ़वाल और कुमाऊं मंडल को जोड़ने का केंद्र बिंदु भी है।
पंडित सुरेश नौटियाल बताते हैं कि यहां उमा देवी ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उमा प्रयाग से कर्णप्रयाग नाम दिया था. तब गढ़वाल राज्य की राजधानी (करीब 15 किलोमीटर दूर) से संपूर्ण गढ़वाल का प्रशासन संचालित होता था. यहां 1960 में तहसील मुख्यालय बना और आज इसी कर्णप्रयाग तहसील की उपतहसील भी बन गई है. इससे इसका भोगौलिक क्षेत्र भी कम हो गया है. जबकि पैरुल देवता यहां के मुख्य स्थानीय देवता हैं.
कर्णप्रयाग से 25 किलोमीटर की दूरी पर नौटी गांव स्थित है, जहां से हिमालय का सचल महाकुंभ नंदा देवी राजजात का शुभारंभ प्रत्येक बारह साल बाद होता है. इसका पहला पड़ाव भी कर्णप्रयाग के ईड़ाबधाणी गांव से शुरू होता है.
कर्णप्रयाग से 6 किलोमीटर की दूरी पर चंडिका देवी मंदिर स्थित है. दूसरी ओर कालेश्वर में भैरवनाथ मंदिर स्थित है. कर्णप्रयाग में रेलवे कार्य भी लगातार प्रगति पर है और 2024-25 तक इसका काम पूरा होने की संभावना है. भुवन नौटियाल बताते हैं कि पहला अपर गढ़वाल का पहला अंग्रेजी माध्यम का स्कूल कर्णप्रयाग में खुला था. प्रथम विश्व युद्ध के सैनिक विक्टोरिया क्रॉस दरबान सिंह नेगी ने लार्ड पंचम से इसे मांगा था.
नौटियाल जी बताते हैं कि आजादी से पहले भी कर्णप्रयाग में कई सम्मेलन हुए थे. यहीं से राम प्रसाद बहुगुणा जैसे क्रांतिकारियों को 1937 में विद्यालय से निकाल दिया गया था. उन्होंने 14-15 साल की उम्र में आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था.
कर्णप्रयाग में दानवीर कर्ण का एक मंदिर भी है. माना जाता है कि आज जहां पर कर्ण का मंदिर है, वह स्थान कभी जल के अंदर था और वहां पर कर्ण शिला नामक एक पत्थर का कोना ही जल के बाहर उभरा हुआ दिखता था. वहीं, एक दूसरी कहावत के अनुसार, कर्ण ने इसी स्थान पर अपने पिता सूर्यदेव की आराधना की थी. तब भगवान सूर्य कर्ण की तपस्या से प्रसन्न हुए थे और उन्हें अभेद्य कवच-कुंडल और अक्षय धनुष प्रदान किए थे. साथ ही कहा जाता है कि कर्णप्रयाग ही वह स्थान है, जहां भगवान कृष्ण ने कर्ण को उनकी मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार किया था। 

 



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