बुधवार, 20 नवंबर 2019 | 06:57 IST
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उत्तराखंड का एक ऐसा गांव जहां होती है ‘कर्ण’ की पूजा


देवभूमि उत्तराखंड दुनिया भर में देव स्थलों के लिए जानी जाती है। यह देवों की भूमि हैं। यह शिव निवास करते हैं,तो कृष्ण की बांसूरी आज भी सुनाई देती है। रामयण-महाभारत के पात्रों को भी यहां देव रूप में पूजा जाता है। इन्हीं पात्रों से एक पात्र है,महाभारत के वीर यौद्धा कर्ण,

पाडवों का संबंध उत्तराखंड से काफी गहरा रहा है। महाभारत काल की कई यादें आज भी उत्तराखंड से जुड़ी हुई हैं। महाभारत के युद्ध के बाद पांडव यहीं आए थे,और यहां के लोगों का जुड़ाव उनके साथ आज भी माना जाता है। यही वजह है कि यहां की सभ्यता संस्कृति में आज भी उन लोगों को याद किया जाता है।

उत्तराखंड की भूमि का संबंध सिर्फ पांडव से ही नहीं कौरवों से भी यहां का संबंध रहा है। आज भी उत्तराखंड में कई जगह ऐसी भी है जहां के लोगों की आस्थ आज भी रामायण एवं महाराभारत के पात्रों में है। इन्हीं एक पात्र है,कर्ण,जिनकी पूजा सीमांत जनपद मोरी में स्थिति कर्ण के भव्य मंदिर में होती है,और यहां हर साल एक भव्य मेला भी आयोजित किया जाता है।

 कर्ण देवता मंदिर उत्तरकाशी जिले के नेतवार गाँव से लगभग डेढ़ मील दूर सारनौल गांव में स्थित एक प्राचीन एवं लोकप्रिय मंदिर है| यह मंदिर महाभारत के समय से सम्बंधित है| यह मंदिर कर्ण को समर्पित है। जिसे पांडवों में सबसे बड़ा भाई माना जाता है एवं कर्ण देवता मंदिर को शक्ति और शांति का प्रतीक माना जाता है|

कर्ण देवता मंदिर के निकट तमस या टोंस नदी नामक नदी स्थित है। इस नदी के बारे में  मान्यता है कि भुब्रूवाहन के आंसुओं के कारण ही यह नदी बनी थी| उत्तराखंड के सीमांत जनपद मोरी ब्लॉक के 24 गांव ऐसे हैं,जहां लोग दानवीर कर्ण की पूजा करते हैं| इस क्षेत्र के लोग कर्ण देवता को अपना “कुल देवता” और “ईष्ट देवता” मानते है| कर्ण देवता महाभारत के महत्वपूर्ण पात्र है| लोग इस मंदिर में भगवान कर्ण और अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि कई सालों पहले से इस मंदिर को पवित्र एवं धार्मिक रूप में माना जाता था| हिन्दू परम्परा के अनुसार इस मंदिर की कल्पना की गयी थी,और चींटियों द्वारा मंदिर बनाने की योजना बनाई गई थी| यह मंदिर इस क्षेत्र के लोगों की कर्ण के प्रति इतनी आस्था है कि गाँव में अधिकतर मंदिर कर्ण और कर्ण के साथी द्वारपालों व कर्ण की गुरुमाता के हैं एवं अपने दान के कारण प्रसिद्ध कर्ण देवता मंदिर में भी लोग श्रद्धापूर्वक दानकर्म करते है| मंदिर परिसर में लोग धार्मिक कार्यो, अनुष्ठान और पुण्य दान करने आते है एवं कर्ण देवता की अच्छी आदतों को सम्मान देने के लिए इस क्षेत्र के गाँव में दहेज़ प्रथा को भी बंद कर दिया है| मंदिर परिसर में किसी भी धार्मिक कार्य या पूजा विधि में किसी भी जानवर की बलि भी नहीं दी जाती है| इस मंदिर को बनाने के पीछे एक कथा है। सारनौल कर्ण देवता मंदिर और सौर दुर्योधन मंदिर नाम के दो गांव की भूमि महाभारत काल के महान योद्धा भुब्रूवाहन की धरती मानी जाती है। ऐसी मान्‍यता है कि राजा भुब्रूवाहन कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत युद्ध में कौरव सेना का हिस्सा बनना चाहते थे। किंतु उसकी शक्‍ति से भली भांति परिचित भगवान कृष्ण ने बड़ी ही चालाकी से भुब्रूवाहन का सिर उसके धड़ से अलग करके उन्‍हें युद्ध से दूर कर दिया। जब उसने श्री कृष्‍ण से युद्ध देखने की इच्छा जाहिर की तो उसकी योग्‍यता के चलते यह अधिकार देते हुए कृष्‍ण जी ने उसके सिर को एक पेड़ पर टांग दिया और उसने वहीं से महाभारत का पूरा युद्ध देखा। कहते हैं कि वो कौरवों की हार देखकर बहुत रोता था और दोनों गांवों के समीप जो नदी है वो भुब्रूवाहन के आंसुओं के कारण ही बनी थी। इसे तमस या टोंस नदी के नाम से जाना जाता है। इसी धारणा के चलते इस नदी का पानी पीने योग्‍य नहीं माना जाता है। उत्तरकाशी के लोकगीतों में भब्रूवाहन के साथ दुर्योधन और कर्ण की प्रशंसा की जाती है और उन्हें देवताओं के समान पूजा जाता है। इसी कारण इस क्षेत्र में मंदिर का निर्माण किया गया|



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