रविवार, 21 जुलाई 2019 | 09:13 IST
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कैलाश मानसरोवर यात्रा


 

इस साल 8 जून से 8 सितंबर तक पवित्र कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू हो रही है। इस साल 2019 की कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुके हैं। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा हैं कि इस साल यह यात्रा नाथूला दर्रा और लिपुलेख दर्रे से 8 जून से 8 सितंबर के बीच आयोजित की जाएगी। इस यात्रा में 18 से 70 वर्ष के बीच के जो लोग शामिल हो सकते है। इसके लिए यात्रि 9 मई तक आवेदन कर सकते हैं। 

 मंत्रालय से जारी बयान में कहा गया कि यह यात्रा 8 जून से 8 सितंबर तक दो मार्गों से आयोजित होगी। इसमें कहा गया कि उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से हो कर जाने वाले मार्ग से प्रति व्यक्ति यात्रा का खर्च 1.8 लाख रुपए आएगा। इसके लिये 60-60 श्रद्धालुओं के कुल 18 जत्थे बनाए जाएंगे। प्रत्येक जत्थे के लिए यात्रा अवधि 24 दिन है जिसमें यात्रा संबंधी तैयारियों के लिए दिल्ली में तीन दिन तक रुकना शामिल है। मंत्रालय ने कहा, 'यात्री चियालेख घाटी अथवा ‘ओम पर्वत’ की प्राकृतिक सुंदरता भी देख सकते हैं, इस पर्वत पर प्राकृतिक रूप से बर्फ से ओम की आकृति बनी होती है।' 
मंत्रालय ने कहा कि नाथूला दर्रे से जाने वाला मार्ग मोटर वाहन और ट्रेकिंग न कर सकने वाले सीनियर सिटीजंस के लिए ठीक है। गंगटोक से गुजरने वाले इस मार्ग में हांगू लेक और तिब्बत पड़ता है। इस रास्ते से प्रति व्यक्ति खर्च 2.5 लाख रुपए आएगा और यात्रा अवधि 21 दिन की होगी। इसमें तीन दिन तक दिल्ली में रुकना शामिल है। मंत्रालय ने कहा कि इस वर्ष इस मार्ग से 50 श्रद्धालुओं के 10 जत्थे निर्धारित किए गए हैं। 
पहला रूट
लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) के रास्ते प्रति व्यक्ति लगभग 1.8 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है, जिसमें कुछ दुर्गम पद यात्रा शामिल हैं। इस मार्ग पर प्रमुख स्थलों जैसे नारायण आश्रम व पाताल भुवनेश्वर से होते हुए तीर्थयात्री चियालेख घाटी या ओम पर्वत की प्राकृतिक सुंदरता को देख सकते हैं जहां प्राकृतिक रूप से ‘ओम’ आकार में बर्फ दिखती है.

दूसरा रूट
नाथू ला दर्रे (सिक्किम) से होकर जाने वाला मार्ग वाहन से जाए जाने योग्य है और बुजुर्गो के लिए ठीक है, जो कठिन ट्रैकिंग नहीं कर सकते. इसमें प्रति व्यक्ति खर्च ढाई लाख रुपये का आएगा.यात्री या तो दोनों मार्ग चुन सकते हैं जिसमें वे प्राथमिकता बता सकते हैं या फिर केवल एक ही मार्ग चुन सकते हैं। कम्प्यूटर से ड्रॉ के जरिए उन्हें मार्ग और जत्था आवंटित किया जाएगा। 

 

कैलाश मानसरोवर यात्रा

कैलाश पर्वत तिब्बत में स्थित एक पर्वत श्रेणी है। इसके पश्चिम तथा दक्षिण में मानसरोवर तथा राक्षसताल झील हैं। यहां से कई महत्वपूर्ण नदियां निकलतीं हैं । जिनमें  ब्रह्मपुत्रसिन्धुसतलुज इत्यादि। हिन्दू सनातन धर्म में इसे पवित्र माना गया है।

इस तीर्थ को अस्टापद, गणपर्वत और रजतगिरि भी कहते हैं। कैलाश के बर्फ से आच्छादित 6,638 मीटर (21,778 फुट) ऊँचे शिखर और उससे लगे  मानसरोवर का यह तीर्थ है। इसे मानसखंड भी कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया। श्री भरतेश्वर स्वामी मंगलेश्वर श्री ऋषभदेव भगवान के पुत्र भरत ने दिग्विजय के समय इस पर विजय प्राप्त की। पांडवों के दिग्विजय प्रयास के समय अर्जुन  ने इस प्रदेश पर विजय प्राप्त की थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में इस प्रदेश के राजा ने उत्तम घोड़े, सोना, रत्न और याक के पूँछ के बने काले और सफेद चामर भेंट किए थे। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक ऋषि मुनियों के यहाँ निवास करने का उल्लेख प्राप्त होता है। जैन धर्म में इस स्थान का बहुत महत्व है। इसी पर्वत पर श्री भरत स्वामी ने रत्नों के 72 जिनालय बनवाये थे।

कैलाश पर्वतमाला  कश्मीर से लेकर भूटान तक फैली हुई है और ल्हा चू और झोंग चू के बीच कैलाश पर्वत है। जिसके उत्तरी शिखर का नाम कैलाश है। इस शिखर की आकृति विराट् शिवलिंग की तरह है। पर्वतों से बने षोडशदल कमल के मध्य यह स्थित है। यह सदैव बर्फ से आच्छादित रहता है। इसकी परिक्रमा का महत्व कहा गया है। तिब्बती (लामा) लोग कैलाश मानसरोवर की तीन अथवा तेरह परिक्रमा का महत्व मानते हैं और अनेक यात्री दंड प्रणिपात करने से एक जन्म का, दस परिक्रमा करने से एक कल्प का पाप नष्ट हो जाता है। जो 108 परिक्रमा पूरी करते हैं उन्हें जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है।  कैलाश पर स्थित बुद्ध भगवान के अलौकिक रूप ‘डेमचौक’ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पूजनीय है। वह बुद्ध के इस रूप को ‘धर्मपाल’ की संज्ञा भी देते हैं। बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इस स्थान पर आकर उन्हें निर्वाण की प्राप्ति होती है।
कैलाश-मानसरोवर जाने के अनेक मार्ग हैं किंतु उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के अस्कोट, धारचूला, खेत, गर्ब्यांग,कालापानी, लिपूलेख, खिंड, तकलाकोट होकर जानेवाला मार्ग अपेक्षाकृत सुगम है। यह भाग 544 किमी (338 मील) लंबा है और इसमें अनेक चढ़ाव उतार है। जाते समय सरलकोट तक 70 किमी (44 मील) की चढ़ाई है, उसके आगे 74 किमी (46 मील) उतराई है। मार्ग में अनेक धर्मशाला और आश्रम है जहाँ यात्रियों को ठहरने की सुविधा प्राप्त है। गर्विअंग में आगे की यात्रा के निमित्त याक, खच्चर, कुली आदि मिलते हैं। तकलाकोट तिब्बत स्थित पहला ग्राम है जहाँ प्रति वर्ष ज्येष्ठ से कार्तिक तक बड़ा बाजार लगता है। तकलाकोट से तारचेन जाने के मार्ग में मानसरोवर पड़ता है।

यात्रा में सामान्यत दो मास लगते हैं और बरसात आरंभ होने से पूर्व ज्येष्ठ मास के अंत तक यात्री अल्मोड़ा लौट आते हैं। इस प्रदेश में एक सुवासित वनस्पति होती है जिसे कैलास धूप कहते हैं। लोग उसे प्रसाद स्वरूप लाते हैं।

कैलाश मानसरोवर में दार्शनिक स्थल

गौरी कुंड- इस कुंड की चर्चा शिव पुराण में की गई है, तथा इस कुंड से भगवान् गणेश की कहानी भी संलग्न है. ऐसा माना जाता है कि माता पार्वती ने इसी जगह पर भगवान गणेश की मूर्ति में प्राण फूँका था. इन पौराणिक कहानियों से संलग्न होने की वजह से इस स्थान का अध्यात्मिक दृष्टिकोण से बहुत ही गहरा महत्व है. यहाँ पर जाने वाले लोगों को इस कुंड के जल की सतह पर छोटा कैलाश के शिखर का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है. ये दृश्य अत्यंत मनोरम होता

मानसरोवर झील- ये झील कई तरह के पौराणिक कथाओं में वर्णित है. प्रतिवर्ष कई श्रद्धालू केवल इसमें स्नान करने के लिए आते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार इस झील में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं के सारे पाप कट जाते हैं और मरणोपरांत उनकी आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है. ऐसा माना जाता है कि कई सनातन देवी देवता इस झील में स्नान करने आया करते थे. अतः ये झील सदैव दैवी शक्तियों और पवित्रताओं का केंद्र रहा है

कैलाश परिक्रमा - यहाँ पर हिन्दू, जैन और बौद्ध तीनो धर्म के अनुयायी तीर्थ यात्रा के लिए आते हैं. हिन्दुओं में ये मान्यता हैं कि ये स्थल भगवान् शिव से सम्बंधित है वहीँ बौद्ध धर्मनुययियो के अनुसार ये जगह शक्ति का केंद्र है. जैनियों की मान्यता ये है कि कैलाश पर उनके धर्म के संस्थापक रहा करते थे. ये बड़ी दिलचस्प बात है कि धर्म कोई भी हो किन्तु तीनों के अनुयायी इस जगह की परिक्रमा लगाते

राक्षस तल - राक्षस तल 4115 मीटर ऊपर स्थित है. इस स्थान का सम्बन्ध लंकापति रावण से माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी जगह पर तप कर के लंकापति रावण ने भगवान् शिव को प्रसन्न किया था और शिव प्रकट हुए थे. इसके उपरान्त रावण ने भगवान् शिव को कैलाश छोड़ कर लंका चलने का आग्रह किया था. भगवन शिव इस शर्त पर रावण के लंका जाने के लिए राजी हुए थे कि रावण बीच में पड़े मार्ग में कहीं भी उसे धरती पर नहीं रखेंगे

कैसे पहुंचे

सड़क मार्ग- भारत से सड़क मार्ग। भारत सरकार सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर यात्रा प्रबंधित करती है। यहां तक पहुंचने में करीब 28 से 30 दिनों तक का समय लगता है। यहां के लिए सीट की बुकिंग एडवांस भी हो सकती है और निर्धारित लोगों को ही ले जाया जाता है, जिसका चयन विदेश मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

 * वायु मार्ग- काठमांडू से लहासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेवा उपलब्ध है, जहां से तिब्बत के विभिन्न कस्बों - शिंगाटे, ग्यांतसे, लहात्से, प्रयाग पहुंचकर मानसरोवर जा सकते हैं।

 वायु मार्ग द्वारा काठमांडू तक पहुंच कर वहां से सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर झील तक जाया जा सकता है।

 * कैलाश तक जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा भी ली जा सकती है। काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट तक पहुंचकर, वहां से हिलसा तक हेलिकॉप्टर द्वारा पहुंचा जा सकता है। मानसरोवर तक पहुंचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं।

 

 

कैसे कराएं पंजीकरण

कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ी अधिक जानकारी व पंजीकरण के लिए इस वेबसाइट जाकर आप पूरी जानकारी ले सकते है।

https://kmy.gov.in/kmy/

  



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