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दिल्ली छावला गैंगरेप केस- न्यायिक भरोसे पर चोट


विनोद बछेती

किसी भी लोकतांत्रिक देश की न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता व न्याय तक पहुँच प्रत्येक नागरिक का अधिकार है तथा इसे सुनिश्चित करना राज्य का उत्तरदायित्व होता है। भारत में न्यायिक व्यवस्था व न्यायिक प्रक्रिया दोनों जटिल हैं। न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता व न्याय तक पहुँच जनता के एक बड़े वर्ग के लिये अभी भी दुर्लभ है।

हाल ही दिल्ली छावला गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने फाँसी की सजा को बदलकर किरण नेगी के क़ातिलो को बाइज़्ज़त बरी कर दिया है। इस फैसले को लेकर देश भर में आक्रोश है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि मामले में पुलिस ने सही से जांच नहीं की, सबूत इकट्ठे नहीं किए गए और संभव है, सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सबूत खत्म भी कर दिए गए। इसके लिए अदालत ने पुलिस को लताड़ भी लगाई।

लेकिन यह फैसला इस देश की करोड़ों बालिकाओं, युवतियों और महिलाओं के मन में असुरक्षा का खौफ पैदा कर रहा है। न्याय ऐसा हो, जिससे लोगों में न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास मजबूत हो, लेकिन इस फैसले की देश में आलोचना हो रही है।

किरण नेगी का मामला 'रेयरेस्ट ऑफ रेयरेस्ट' मामला था। यह मामले की जांच कर रही पुलिस ने स्वीकार किया है। उसने अदालत को भी यह बात बताई थी।

उत्तराखंड की इस बेटी के साथ तीन युवकों ने जिस वीभत्सता के साथ अपहरण के बाद बलात्कार और फिर उसकी जिस जघन्य तरीके से हत्या की गई, वह हैवानियत की इंतहा थी।

सर्वोच्च न्यायालय पर किरण नेगी के मां-बाप को बड़ा भरोसा था कि जब निचली अदालतों ने तीनों अभियुक्तों की फांसी की सजा सुना दी है तो सुप्रीम कोर्ट भी उस सजा पर मुहर लगा देगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तो सारा फैसला ही उलट दिया। यह किसी को उम्मीद नहीं थी। किरण नेगी का परिवार इस फैसले से टूट गया। किरण की मां का रो-रो कर बुरा हाल है। इस परिवार के विश्वास को कितनी गहरी चोट लगी है। इसे नापने का क्या कोई पैमाना है।

यह एक मानवीय मामला है, इसका फ़ैसला किसी तकनीकी बिंदु के आधार पर नहीं किया जा सकता। जिस देश में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः', जैसे मूलमंत्र स्त्री के सम्मान, उसकी सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं, उस देश में एक निरीह युवती को बलात्कार के बाद अमानुष तरीके से मौत के घाट उतार दिया जाता है, और उसे इंसाफ नहीं मिलता, बल्कि न्याय दिलाने के जिम्मेदार लोग अपराधियों को बाइज्जत बरी कर बेखौफ खुला छोड़ने का आदेश पारित कर देते हैं। इससे बड़ी

फैसले ने देश का स्त्री समाज ही नहीं, इंसाफपसंद लोग बेहद आहत है। वह खून के आंसू रो रहे हैं। भारत की आत्मा रो रही है। ममता रो रही है। जिस बेटी को मां-बाप से लाड-प्यार, जिंदगी की आपाधापी और संघर्षों से पालपोस कर पढाया-लिखाया उसके साथ ये हादसा तो बेहद दुखदायी था ही, 12 साल के लंबी, जटिल न्याय की लड़ाई के बाद फैसला अत्यंत निराशा, हताशा भरा होगा, किसी ने भी नहीं सोचा होगा।

क्या जांच करने वाली पुलिस, फैसला देने वाली अदालत ने जरा भी मानवीयता के साथ सोचा होगा कि वो बेटी उस वक्त कितनी पीड़ा के दौर से गुजरी होगी, जब तीनों दरिंदे मिलकर उसकी अस्मत ही नहीं लूट रहे थे उसकी आत्मा को भी तार-तार कर रहे थे, और फिर उसके अंगों को तेजाब, शराब को बोतल से वहशीपन से क्षतविक्षत कर रहे थे।

स्पष्ट है कि फैसले में न्याय व्यवस्था का झुकाव मृतक पीड़िता के बजाय अपराधियों के प्रति सहानुभूति का ही नजर आ रहा है।

माननीय सर्वोच्च अदालत निचली अदालतों द्वारा दिए गए फांसी के फैसले को आजीवन कारावास में बदल सकती थीं। अदालत को जांच में कमी नजर आई तो फिर से जांच के आदेश दे सकती थी। पुलिस जांच पर भरोसा नहीं तो सीबीआई से जांच का आदेश दे सकती थी, लेकिन नहीं, सीधे-सीधे तीनों अपराधियों को बरी करने का फरमान सुना दिया जाता है।

सवाल यह है कि क्या ऐसे अपराधी समाज में खुले रहने लायक है? ऐसे अपराधियों के रहते कोई महिला समाज में सुरक्षित रह सकती है? निश्चित तौर पर यह फैसला अपराधियों का हौसला बुलंद करने वाला और केवल एक किरण नेगी के परिवार का ही नहीं, समूचे स्त्री समाज को भयभीत करने वाला और उनके प्रति असुरक्षा का माहौल पैदा करने वाला है।

यह निर्णय सर्वोच्च न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा करता है। यह फैसला कोई नजीर पेश नहीं करता, बल्कि न्यायिक इतिहास का बदतर फैसला है। इसने समाज के भरोसे को तोड़ा है। स्त्रियों में असुरक्षा के भाव को बढाया है। ऐसे में देश की जनता किस पर विश्वास करें। कहां जाएं। कोई बताएं बेटियां सुरक्षित कैसे रहें और न्याय के लिए किस दरवाजे पर जाएं, जहां उसे सचमुच न्याय मिले।



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