बुधवार, 20 नवंबर 2019 | 11:50 IST
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इस बार कुछ खास है कृष्ण जन्माष्टमी,14 वर्षों के बाद बना है ऐसा महासंयोग


 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तिथि को लेकर इस बार मतभेद हैं। शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्म के समय (मध्यरात्रि) अष्टमी होगी लेकिन जिस रोहिणी नक्षत्र में जन्म हुआ था, वह शनिवार को रहेगा। कुछ ज्योतिषाचार्यों की राय में कृष्ण प्रगटोत्सव अष्टमी व्यापिनी तिथि 23 अगस्त को मनाना श्रेष्ठ है, वहीं कुछ की राय में जन्माष्टमी उदयातिथि अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र होने से 24 अगस्त को है। 

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अष्टमी तिथि 23 अगस्त को प्रात: 8:09 से 24 अगस्त को प्रात: 8:32 तक है। रोहिणी नक्षत्र 24 अगस्त को प्रात: 3:48 से 25 अगस्त को प्रात: 4:17 बजे तक रहेगा। श्रीकृष्ण का जन्म रात्रि बारह बजे माना गया है। कृष्ण का जन्म भाद्रपक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस बार अष्टमी व रोहिणी नक्षत्र का योग अलग-अलग तिथि में है। 
जनमाष्टमी व्रत और पूजन

जन्मोत्सव पर भगवान (ठाकुरजी या लड्डू गोपाल) का पंचामृत से स्नान कराएं। उनको नवीन वस्त्र पहनाएं, शृंगार करें। शंख से स्नान कराना अधिक श्रेष्ठ है।

यह सबसे लंबी अवधि का व्रत माना गया है। प्रारम्भ अष्टमी के प्रारम्भ काल से हो जाता है ( सूर्योदय) और पारणा भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की पूजा के बाद मध्यरात्रि में।

23 अगस्त को जन्माष्टमी व्रत है तो 24 अगस्त को कृष्णाष्टमी का व्रत है। ईस्कॉन समेत कई मंदिर कमेटी और संस्थाएं जन्माष्टमी को यादगार बनाने की तैयारी की हैं। जन्माष्टमी पर ग्रह गोचरों का महासंयोग वरदान होगा। इस तिथि पर छत्र योग, सौभाग्य सुंदरी योग और श्रीवत्स योग बन रहा है। पूजन और व्रतियों के लिए फलदायी सिद्ध होगा। 14 वर्षों के बाद तीन संयोग एक साथ बना है। जन्माष्टमी के समय सूर्य देव अपनी सिंह राशि में रहेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण की प्राण प्रतिष्ठा रात्रि 12.10 बजे के बाद ही सर्वश्रेष्ठ है। अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र दोनों का अपूर्व संयोग से मध्य रात्रि में जन्मोत्सव मनेगा।

अभिषेक के समय इस मंत्र का जाप करते रहें
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:
ॐ कृं कृष्णाय नम:

 

 

 



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