सोमवार, 15 जुलाई 2024 | 04:22 IST
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योगी ने एक झटके में आतंकी फंडिंग की कमर तोड़ दी


नवीन पाण्डेय, संपादक  
योगी आदित्यनाथ ने जब से यूपी के सीएम की कुर्सी संभाली है, हर बार एक ही बात जोर देकर कही है कि यहां हिन्दू और मुसलिमों के लिए भेदभाव करने वाले नियम नहीं चलेंगे। पहले की सरकारों ने जो 
तुष्टीकरण की नीति अपना रखी थी, योगी ने खुलेआम उस पर चोट की। इस बार योगी ने जिस मुद्दे पर हमला किया है वो है हलाल सर्टिफेकिट जारी करने वालों पर। आप जानते ही होंगे कि मुसलिम धर्म में हलाल और हराम वाले उत्पादों की बात की जाती है।  हालांकि आम लोग हलाल मीट के बारे में ही ज़्यादा जानते हैं। हलाल मीट वो होता है, जब जानवर का गला रेतकर पूरा खून निकलने तक उसे धीरे धीरे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, जबकि हिन्दू, सिखों सहित कई दूसरे धर्मों में जो लोग मांसाहारी हैं, उनके बीच एक झटके में जानवर का गला काटकर मारने की मान्यता है, ताकि उसे दर्द हुए बिना उसकी जान चली जाए। अब इसको लेकर अलग अलग मान्यता और तर्क भले हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि मीट के अलावा दूसरे उत्पादों पर भी हलाल का सर्टिफिकेट जारी किया जाता है। हलाल उत्पादों के कारोबार में खाने की सारी चीजें, पेय पदार्थ यहां तक की दूध और दवाएं तक शामिल हैं। इतना ही नहीं 
कपड़े, लिपिस्टिक जैसे सामान भी, जिनमें मांस होने की तनिक भी गुंजाइश नहीं है, उनके लिए भी ये संस्थाएं हलाल सर्टिफिकेट जारी कर रही हैं। ऐसे में प्रोडक्ट बेचने वाली कंपनियों को लगता है कि हलाल की बढ़ती मांग को नजरअंदाज किया तो उसका बड़ा नुकसान होगा। इसी चक्कर में देश की 85 फीसदी आबादी भी हलाल प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने को मजबूर है। 
आपको जानकर हैरानी होगी कि चाय जैसे विशुद्ध शाकाहारी पेय पर भी हलाल सर्टिफिकेट जारी किया जाता है। इसको लेकर पिछले सावन के महीने में वन्दे भारत एक्सप्रेस ट्रेन में उस समय विवाद खड़ा हो गया, जब एक हिन्दू यात्री ने हलाल सर्टिफाइड चाय बांटने का विरोध किया। इसका वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था। इस वीडियो में दिखाई देता है कि प्रीमिक्स चाय के पैकेट को लेकर बहस हो रही है। यात्री कह रहा है कि सावन के महीने में आप हलाल चाय पिला रहे हैं, ये क्या लिखा हुआ है? हलाल सर्टिफाइड, क्या चीज है ये? स्टाफ ने दलील दी कि इस पर हलाल सर्टिफाइड लिखे होने का अर्थ है कि हिंदू के साथ-साथ मुस्लिम आबादी के लिए भी ये चाय इस्लामिक नियमों के अनुरूप है।
इसके बाद मीडिया में सवाल उठाए गए कि जिस तरह हर सामान 
के लिए कुछ मुसलिम संस्थाएं हलाल सर्टिफेकिट जारी कर रही हैं, उस तरह के सर्टिफेकिट कोई हिन्दू, सिख, बौद्ध या जैन संस्थान तो जारी नहीं करती। दूसरा जब हलाल सर्टिफिकेट को ही मानना है तो फिर सरकार जो ISI और FSSAI जैसी सरकारी संथाओं के जरिए 
सामानों को सर्टिफाइड करती है, उसका क्या कोई मतलब नहीं। 
संविधान से चलते वाले धर्मनिरपेक्ष देश में आखिर दो नियम कौन चला रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं हलाल की आड़ में अरबों का कारोबार खड़ा किया जा रहा है। इसके जरिए इकट्ठा होने वाला पैसा आखिर कहां खर्च किया जाता है ? 
वंदे भारत एक्सप्रेस के स्टाफ के जवाब पर सोशल मीडिया में बहस छिड़ गई। लोगों ने तर्क दिया कि क्या सिखों की सर्वोच्च संस्था 
अकाल तख्त उपभोक्ता वस्तुओं को अपनी मुहर और प्रमाणन देता है? क्या ईसाइयों के सर्वोच्च धर्मगुरु पोप वेटिकन सिटी से इस तरह का सर्टिफिकेट देते हैं? क्या तिब्बती बौद्धों द्वारा उपयोग किए जाने वाले उत्पादों पर दलाई लामा अपनी मुहर लगाते हैं? हिंदू आखिर किस शंकराचार्य के पास आवेदन करते हैं? ये भी सवाल उठे कि हलाल सर्टिफिकेट मानने का मतलब है कि आईएसआई और एफएसएसएआई जैसे उपभोक्ता उत्पादों पर मौजूदा सरकारी प्रमाणपत्र किसी काम के नहीं है। आपको जानकर हैरानी होगी कि देश में लगभग 400 एफएमसीजी कंपनियों ने 3200 तरह के सामान के लिए हलाल सर्टिफेकिट ले रखा है। यह सर्टिफिकेट लेने की कतार में यूपी सहित देशभर के फाइव स्टार होटलों से लेकर रेस्टोरेंट तक शामिल हैं। यहां तक की बाबा रामदेव जैसे हिन्दू योगी की कंपनी पतंजली को भी ये सर्टिफिकेट लेना पड़ता है, ताकि उनका सामान मुसलिम समाज और मुसलिम देशों में बिक सके। आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन के तहत आने वाले 57 देशों में अगर इन कंपनियों को अपना सामान बेचना है तो ये सर्टिफिकेट जरूरी है। 
एयरलाइंस कंपनियां, फूड डिलीवरी कंपनियां बिना हलाल सर्टिफाइड चीजें डिलीवर ही नहीं करती। अकेले यूपी में ही 30 हजार करोड़ का सामान ऐसा बिकता है, जिसमें हलाल सर्फिकिकेट जरूरी माना जाता है, इसमें 1400 होटल, रेस्टोरेन्ट भी हैं। अब आप समझ सकते हैं हलाल सर्टिफेकेट जारी करने वाली संस्थाओं का जलवा कितना है। हालांकि समाजवादी पार्टी ने इसको योगी सरकार का स्टंट बताया है। 
अब बात करते हैं हलाल सर्टिफिेकेट जारी करने के बिजनेस मॉडल का।  भारत में 1974 में पहली बार पशुओं के मांस के लिए हलाल सर्टिफिकेट देने की शुरुआत हुई थी । लेकिन धीरे धीरे इसका दायरा बढ़ता रहा और आज हालत ये हो गई है कि दूध, ब्रेड, गुड़, कपड़े, लिपस्टिक, क्रीम, दवाइयों के लिए सर्टिफिकेट जारी होने लगे हैं।  
हमारे देश में मुख्य तौर पर  हलाल इंडिया प्रा. लि., हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्रा. लि., जमीयत उलमा-ए-महाराष्ट्र और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ट्रस्ट हलाल सर्टिफेकिट जारी करते हैं, न कि कोई सरकारी संस्था। यहां ये भी सवाल उठता है कि अगर हलाल सर्टफिकेट देना ही है तो फिर सरकार जैसे आईएसआई जारी करती है वैसे ही हलाल सर्टिफिकेट भी जारी कर सकती है, लेकिन ये संस्थाएं मानती नहीं। कंपनियों की मजबूरी ये है कि अपने देश में मुसलिमों का एक वर्ग और इस्लामिक देशों में निर्यात के लिए उत्पाद का हलाल सर्टिफाइड होना जरूरी होता है। हलाल सर्टिफिकेट देने के लिए कंपनियों को बड़ी रकम का भुगतान करना पड़ता है। पहली बार की फीस 26 हजार से 60 हजार रुपये तक है। हर नए उत्पाद के लिए 1,500 रुपये तक अलग से देने पड़ते हैं। सालाना रिन्यूवल की 
फीस 40 हजार रुपये अलग से बताई जाती है। इसके अलावा कन्साइनमेंट सर्टिफिकेशन व ऑडिट फीस अलग से है। इसमें जीएसटी अलग से शामिल है। यानी एक कंपनी को एक बार में लगभग दो लाख रुपये तक देने पड़ सकते हैं। अब आप इस बिजनेस से होने वाली कमाई का अंदाजा लगा सकते हैं। 
एड्राइट रिसर्च और हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक हलाल उत्पादों की ग्लोबल स्तर पर हिस्सेदारी 19% की है। ये बाजार करीब सात खरब डॉलर यानी 7.5 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का है। भारतीय कंपनियों और होटलों की हिस्सेदारी करीब 80 हजार करोड़ रुपये है। कंपनियों से कमाए गए हजारों करोड़ के इस धन को कहां खर्च किया जाता है, इसको लेकर सही स्थिति का अंदाजा नहीं है। बताते हैं कि मुसलिम धर्म के प्रचार प्रसार के नाम पर बहुत सारा पैसा कई इंटरनेशनल ट्रस्ट को भी जाता है। आरोप है कि इसका एक बड़ा हिस्सा टेरर फंडिंग में खपाया जाता है। इसलिए इस पर बैन की मांग कई संस्थाओं द्वारा लंबे समय से की जा रही थी। 
अब बात करते हैं यूपी की योगी सरकार ने हलाल सर्टिफिकेट वाले उत्पादों पर बैन क्यों लगाया ?हुआ कुछ यूं कि लखनऊ के हजरतगंज थाने में भारतीय जनता युवा मोर्चा के एक पदाधिकारी शैलेंद्र कुमार शर्मा ने एफआईआर दर्ज कराई। इसमें कहा गया है कि कुछ कंपनियां एक खास समुदाय में अपने प्रोडक्स की बिक्री बढ़ाने के लिए हलाल सर्टिफिकेट का इस्तेमाल कर रही हैं, जिससे जनभावनाएं आहत हो रही हैं. 17 नवंबर को दर्ज इस एफआईआर के बाद 18 नवंबर को ही योगी सरकार ने इस तरह के सर्टिफिकेट वाले प्रोडक्ट्स को पूरे यूपी में बैन कर दिया है. हालांकि सरकार ने विदेशों में ऐसे सामानों को निर्यात करने पर रोक नहीं लगाई। 
पुलिस ने भी चेन्नई की हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली की जमीयत उलेमा हिंद हलाल ट्रस्ट और मुंबई के हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया और जमीयत उलेमा पर गैर कानूनी तरीके से हलाल सर्टिफिकेट जारी करने का केस दर्ज कर लिया है. साल 2020 में ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। उस समय हिन्दू पक्ष ने ये भी मांग की थी कि जिन उत्पादों या दवाइयों के इनग्रिडेन्ट में मांसाहार का इस्तेमाल होता है, उसको अलग से सर्टिफाइड किया जाए तब कोर्ट ने कहा कि देश का जो कानून है, उसी के तहत सर्टिफिकेशन होगा, न कि अलग अलग लोगों की मांग के हिसाब से। तब अगर इसी तर्क को देखें तो फिर मुसलिम धर्म के लिए हलाल सर्टिफिकेट गैर जरूरी हो जाता है। 
इस बारे में हलाल सर्टिफिकेट जारी करने वाली संस्थाओं का कहना है कि वे केवल उनको ही सर्टिफिकेट देते हैं, जो मांगने आते हैं। हम इसमें एक तरह से मुसलिमों के बीच उनके सामान बिकवाने में मदद करते हैं। वाह भाई, गजब तर्क है। मुसलिम जानकार बताते हैं कि जिस जानवर को हलाल किया जाता है, उसके लिए कुछ नियम है, जिनका पालन करना जरूरी है- जैसे जानवर का मुंह मक्का की तरह हो, उसको जिबह करने से पहले वजू करने के बाद कलमा पढ़ना भी जरूरी है। अब आप बताइये क्या सर्टिफिकेट देने वाली संस्थाएं क्या किसी हिन्दू या सिख कारोबारी से पूरी उम्मीद कर सकती हैं कि वो इन नियमों का पूरी तरह से पालन करवाता होगा। 
आप खुद बताइये अगर आप मुसलिम हैं, तो क्या दूसरे धर्म के लोगों पर सौ फीसदी यकीन कर सकते हैं कि वे इन नियमों का पालन करते ही होंगे- वो भी तब जब इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। 
यानी साफ है झूठ बोलकर और फीस भरकर सर्टिफिकेट ले लिया जाता है और फिर भोले भाले मुसलिम उसे हलाल मानकर इस्तेमाल कर लेते होंगे- तो ये भी एक तरह का धोखा ही है। आखिर उनकी भावनाओं ही तो हलाल सर्टिफिकेट से जुड़ी हुई हैं। 
तो  योगी सरकार के बैन के बाद अब हलाल सर्टिफिकेट वाला सामान यूपी में बेचा नहीं जा सकेगा यानी जो कंपनियां ऐसे सर्टिफिकेट लेती हैं, वो उस सामान को दूसरे राज्यों में बेच सकती और निर्यात तो कर सकती हैं, क्योंकि केन्द्र सरकार ने इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। लेकिन यूपी में वही सामान बेचने के लिए उस पर से हलाल वाला ठप्पा हटाना पड़ेगा। अब सवाल उठता है कि इससे होगा क्या ? सरकार का मानना है कि यूपी में हिन्दू, मुसलिम या दूसरे धर्मों के बीच भेदभाव करने की जरूरत नही है। यहां सबको बराबर अधिकार हासिल है। जाहिर है इस पर विवाद भी खड़ा हो गया है और सियासत भी जारी है और आगे भी चलती रहेगी। 
अब इसके सियासी फायदे नुकसान की बात कर लेते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि योगी सरकार तुष्टीकरण की नीति को बर्दाश्त न करने की बात कहकर अपने हिन्दू वोटरों को खुश करना चाहती है।  की जो हिन्दुत्व समर्थक छवि है, उसमें उनको कोई गुरेज भी नहीं है। 
तो देखते हैं इस पर आगे और क्या फैसले होते हैं। 
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