रविवार, 23 फ़रवरी 2020 | 02:07 IST
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उत्तराखंड का लोक पर्व घुघुतिया


मकर संक्रान्ति का त्यौहार वैसे तो पूरे भारत वर्ष में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है और यही त्यौहार हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नाम और तरीके से मनाया जाता है।  इस त्यौहार को हमारे उत्तराखण्ड में “उत्तरायणी” के नाम से मनाया जाता है। कुमाऊं में यह त्यौहार घुघुतिया के नाम से भी मनाया जाता है तथा गढ़वाल में इसे खिचड़ी संक्रान्ति के नाम से मनाया जाता है। यह पर्व हमारा सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है ।  इस पर्व पर पिथौरागढ़ और बागेश्वर को छोड़कर कुमाऊं के अन्य क्षेत्रों में मकर संक्रान्ति को आटे के घुघुत बनाये जाते हैं और अगली सुबह को कौवे को दिये जाते हैं (यह पितरों को अर्पण माना जाता है) बच्चे घुघुत की माला पहन कर कौवे को आवाज लगाते हैं;   काले कौवा का-का, ये घुघुती खा जा  ।  वहीं पिथौरागढ़ और बागेश्वर अंचल में मकर संक्रान्ति की पूर्व संध्या (मशान्ति) को ही घुघुत बनाये जाते हैं और मकर संक्रान्ति के दिन उन्हें कौवे को खिलाया जाता है। बच्चे कौवे को बुलाते हैं काले कौव्वा का-का, पूस की रोटी माघे खा ।  लोक अंचलों में घुघुतिया त्यार से सम्बधित एक कथा प्रचलित है….कहा जाता है कि एक राजा का घुघुतिया नाम का मंत्री राजा को मारकर ख़ुद राजा बनने का षड्यन्त्र बना रहा था… एक कौव्वे ने आकर राजा को इस बारे में सूचित कर दिया…. मंत्री घुघुतिया को मृत्युदंड मिला और राजा ने राज्य भर में घोषणा करवा दी कि मकर संक्रान्ति के दिन राज्यवासी कौव्वो को पकवान बना कर खिलाएंगे……तभी से इस अनोखे त्यौहार को मनाने की प्रथा शुरू हुई|  दूसरी कथा इस प्रकार है  पुरातन काल में यहां कोई राजा था, उसे ज्योतिषियों ने बताया कि उस पर मारक ग्रह दशा है। यदि वह ‘मकर संक्रान्ति’ के दिन बच्चों के हाथ से कव्वों को घुघुतों फाख्ता पक्षी का भोजन कराये तो उसके इस ग्रहयोग के प्रभाव का निराकरण हो जायेगा, लेकिन राजा अहिंसावादी था। उसने आटे के प्रतीात्मक घुघुते तलवाकर बच्चों द्वारा कव्वों को खिलाया। तब से यह परंपरा चल पड़ी। इस तरह की और कहानियां भी हैं। इसी प्रकार एक तीसरी किवदंती है कि कुमाऊं के एक राजा के पुत्र को घुघते (जंगली कबूतर) से बेहद प्रेम था। राजकुमार का घुघते के लिए प्रेम देख एक कौवा चिढ़ता था। उधर, राजा का सेनापति राजकुमार की हत्या कर राजा की पूरी संपत्ति हड़पना चाहता था। इस मकसद से सेनापति ने एक दिन राजकुमार की हत्या की योजना बनाई। वह राजकुमार को एक जंगल में ले गया और पेड़ से बांध दिया। ये सब उस कौवे ने देख लिया और उसे राजकुमार पर दया आ गई। इसके बाद कौवा तुरंत उस स्थान पर पहुंचा जहां रानी नहा रही थी। उसने रानी का हार उठाया और उस स्थान पर फेंक दिया जहां राजकुमार को बांधा गया था। रानी का हार खोजते-खोजते सेना वहां पहुंची जहां राजकुमार को बांधा था। राजकुमार की जान बच गई तो उसने अपने पिता से कौवे को सम्मानित करने की इच्छा जताई। कौवे से पूछा गया कि वह सम्मान में क्या चाहता है तो कौवे ने घुघते का मांस मांगा। इस पर राजकुमार ने कौवे से कहा कि तुम मेरे प्राण बचाकर किसी और अन्य प्राणि की हत्या करना चाहते हो यह गलत है। राजकुमार ने कहा कि हम तुम्हें प्रतीक के रूप में मकर संक्रांति को अनाज से बने घुघते खिलाएंगे। कौवा राजकुमार की बात मान गया। इसके बाद राजा ने पूरे कुमाऊं में कौवों को दावत के लिए आमंत्रित किया। राज का फरमान कुमाऊं में पहुंचने में दो दिन लग गए। इसलिए यहां दो दिन घुघत्या का पर्व मनाया जाता है।

घुघुत बनाने के लिये गुड़ और आटे के मिश्रण से आकृतियां बनाई जाती हैं, जिन्हें सुबह नहा-धोकर कौव्वों को अर्पित करने के बाद इनकी माला बनाकर बच्चों के गले में डाली जाती है, बच्चे हर्षोल्लास से अपनी-अपनी मालाओं को प्रदर्शित करते हुये खाते हैं। बच्चों को यह गीत गुनगुनाते हुए भी सुना जा सकता है।  काले कव्वा काले, घुघुती माला खाले। ले कव्वा बड़, मैंके दिजा सुनौंक घ्वड़। ले कव्वा ढाल, मैंके दिजा सुनक थाल। ले कोव्वा पुरी, मैंके दिजा सुनाकि छुर। ले कौव्वा तलवार, मैंके दे ठुलो घरबार। इसके अतिरिक्त इस पर्व पर बागेश्वर में बहुत विशाल मेला लगता है, जिसका सामाजिक, आर्थिक, व्यापारिक और राजनीतिक महत्व भी है। पुराने जमाने में यह मेला भोट और शेष कुमाऊं के वस्तु विनिमय के लिये जाना जाता था, आज भी भोट के व्यापारियों द्वारा यहां शिरकत की जाती है और सांस्कृतिक जुलूस निकाला जाता है। उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध लोक प्रेम गाथा राजुला मालूशाही में भी उनके माता-पिता द्वारा भगवान बागनाथ के समक्ष अपने बच्चों के विवाह का संकल्प लिया था। उत्तरायणी का सांस्कृतिक पक्ष भारतीय परंपरा में ‘मकर संक्रान्ति’ को सूर्य के उत्तर दिशा में प्रवेश के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड में इसे ‘उत्तरायणी’ कहा जाता है। पहाड़ में इसे घुगुतिया, पुस्योडि़या, मकरैण, मकरैणी, उतरैणी, उतरैण, घोल्डा, घ्वौला, चुन्या त्यार, खिचड़ी संगंराद आदि नामों से जाना जाता है। इस दिन सूर्य धनुर्राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इसे ‘मकर संक्रान्ति’ या ‘मकरैण’ कहा जाता है। सौर चक्र में सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर चलता है, इसलिये इसे ‘उत्तरैण’ या ‘उत्तरायणी’ कहा जाता है। ‘उत्तरायणी’ जहां हमारे लिये लोक का त्योहार है वहीं यह नदियों के संरक्षण की चेतना का उत्सव भी है। ‘उत्तरायणी’ पर्व पर उत्तराखंड की हर नदी में स्नान करने की मान्यता है। उत्तरकाशी में इस दिन से शुरू होने वाले माघ मेले से लेकर सभी प्रयागों बिष्णुप्रयाग, नन्दप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग, सरयू-गोमती के संगम बागेश्वर के अलावा अन्य नदियों में लोग पहली रात जागरण कर सुबह स्नान करते हैं। असल में उत्तराखंड में हर नदी को मां और गंगा का स्थान प्राप्त है। कुमाऊं मंडल में ‘उत्तरायणी’ को घुघुतिया त्योहार के रूप में जाना जाता है। उत्तरायणी की पहली रात को लोग जागरण करते हैं। पहले इस जागरण में आंड-कांथ ;पहेलियां-लोकोक्तियांद्ध, फसक-फराव अपने आप कुछ समासामयिक प्रसंगों पर भी बात होती थी। सल्ट की तरफ रात को ‘तत्वाणी’ गरम पानी से नहान होती है। सुबह ठंडे पानी से नदी या नौलों में नहाने की परंपरा शिवाणी रही है।

 

स्वाधीनता आन्दोलन में भी इस पर्व का स्थान रहा, कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में 14 जनवरी, 1921 को बागेश्वर के ‘उत्तरायणी’ मेले में हजारों लोग इकट्ठा हुये। सबने सरयू-गोमती नदी के संगम का जल उठाकर संकल्प लिया कि ‘हम कुली बेगार नहीं देंगे।’ कमिश्नर डायबिल बड़ी फौज के साथ वहां पहुंचा था। वह आंदोलनकारियों पर गोली चलाना चाहता था, लेकिन जब उसे अंदाजा हुआ कि अधिकतर थोकदार और मालगुजार आंदोलनकारियों के प्रभाव में हैं तो वह चेतावनी तक नहीं दे पाया। इस प्रकार एक बड़ा आंदोलन अंग्रेजों के खिलापफ खड़ा हो गया। हजारों लोगों ने ‘कुली रजिस्टर’ सरयू में डाल दिये। इस आंदोलन के सूत्राधारों में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविन्द पंत, मोहन मेहता, चिरंजीलाल, विक्टर मोहन जोशी आदि महत्वपूर्ण थे। बागेश्वर से कुली बेगार के खिलाफ आंदोलन पूरे पहाड़ में फैला। 30 जनवरी 1921 को चमेठाखाल गढ़वाल में वैरिस्टर मुकन्दीलाल के नेतृत्व में यह आदोलन बढ़ा। खल्द्वारी के ईश्वरीदत्त ध्यानी और बंदखणी के मंगतराम खंतवाल ने मालगुजारी से त्यागपत्र दिया। गढ़वाल में दशजूला पट्टी के ककोड़ाखाल ;गोचर से पोखरी पैदल मार्ग नामक स्थान पर गढ़केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में आंदोलन हुआ और अधिकारियों को कुली नहीं मिले। बाद में इलाहाबाद में अध्ययनरत गढ़वाल के छात्रों ने अपने गांव लौटकर आंदोलन को आगे बढ़ाया। इनमें भैरवदत्त धूलिया, भोलादत्त चंदोला, जीवानन्द बडोला, आदि प्रमुख थे। उत्तरायणी का ही संकप था कि पहली बार यहां की महिलाओं ने अपनी देहरी लांघकर आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी करना शुरू किया। कुन्तीदेवी, बिसनी साह जैसी महिलायें ओदालनों का नेतृत्व करने लगी। आज भी बागेश्वर के मेले में कभी राजनीतिक दलों के पंडाल लगते हैं और वह अपने-अपने विचारों को वहां पर व्यक्त करते हैं।



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