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घोसी उपचुनाव में अखिलेश यादव की 'दमदार जीत' के 5 बड़े कारण


नवीन पाण्डेय,  संपादक  

यूपी के घोसी उपचुनाव में समाजवादी प्रत्याशी सुधाकर सिंह ने बीजेपी प्रत्याशी दारा सिंह चौहान को क्या हराया, पूर्वांचल की राजनीति ही बदल गई। एनडीए में शामिल होकर बड़े बड़े दावे कर रहे ओपी राजभर की न केवल बोलती बन्द हो गई, बल्कि 2024 में जीत के लिए अखिलेश को फॉर्मूला मिल गया। ज़ाहिर है इससे मोदी कैंप में टेंशन जरूर होगी, अलबत्ता सियासी जानकार 
इस हार में को भी कहीं न कही सीएम योगी की जीत के तौर पर ही देख रहे हैं। पिछड़ों के बड़े नेता बताए जा रहे दारा सिंह की हार के कारणों की पड़ताल करते हैं, जिसमें आगे बढ़ते हुए आप न केवल बीएसपी की रणनीति को जिम्मेदार ठहराने को मजबूर हो जाएंगे, वहीं ये भी मानने को मजबूर हो जाएंगे कि पहली बार अखिलेश यादव ने भरपूर मेहनत की, जिसका नतीजा उनको मिला और पहली बार ही बार ये भी मानेंगे कि सीएम योगी देर से चुनाव प्रचार में क्यों उतरे। तो आइये करते हैं यूपी की बदलती सियासत की पड़ताल की। 
घोसी उपचुनाव का घमासान जैसे जैसे आगे बढ़ने लगा वैसे ही बीजेपी को अहसास होने लगा था कि अखिलेश ने सवर्ण प्रत्याशी सुधाकर सिहं को  उतारकर कहीं न कहीं बढ़त ले ली है। बीजेपी ने बहुत कोशिश की कि बीएसपी किसी मुसलिम उम्मीदवार को उतार दें, लेकिन मायावती ने अपने वोटरों के सामने बीजेपी पर हमला कर दिया। यहीं से पहले उलझन में चल रहे बीएसपी समर्थकों को संदेश चला गया कि उनको क्या करना है। सवर्ण ने भी इस बार तय कर लिया था दलबदलू कहे जाने वाले दारा सिंह को सबक  सिखाना है। अब यहां से सारा दारोमदार दिल्ली के इशारे पर यूपी की राजनीति को अपने हिसाब से चलाने वाले बीजेपी नेताओं पर आ गई। योगी के लिए यही मौका था, एक बार फिर साबित करने का। बड़े बड़े दावे कर रहे ओपी राजभर के कंधे पर अपने साथी दारा सिंह को जिताने की पूरी जिम्मेदारी डाल दी गई। मऊ के रहने वाले और दिल्ली के इशारे पर यूपी की राजनीति में बड़ा पद पाने वाले अरविंद शर्मा की भी असली परीक्षा की घड़ी थी- चुनाव जैसे जैसे अंतिम दौर में पहुंचा- सबकी सांसें फूलने लगीं। फिर उतरे सीएम योगी आदित्यनाथ। लेकिन तब तक अखिलेश और शिवपाल इतनी मेहनत कर चुके थे कि बीजेपी उनको पकड़ नहीं पाई। योगी मन ही मन मुस्कुरा रहे होंगे राजभर और दारा सिंह की फजीहत पर- लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या अखिलेश यादव को 2024 के लिए जीत का फॉर्मूला मिल गया है क्या? जा़हिर है इंडिया गठबंधन में उनका कद तो ज़रूर बढ़ेगा ही। 

पिछड़ों के बड़े नेता माने जाने वाले दारा सिंह चुनाव की हार से यूपी बीजेपी कार्यकर्ता हैरान हैं। दारा सिंह पहले योगी सरकार में मंत्री थे, लेकिन 2022 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में चले गए। तब बीजेपी को काफी उल्टा सीधा कहा। बाद में ओपी राजभर जब एनडीए में आए तो पीछे पीछे घोसी की तत्कालीन विधायक दारा सिंह भी इस्तीफा देकर आ गए। ये सब बहुत जल्दी हुआ। दारा सिंह के समर्थकों को अपने वोटरों को ये समझा पाने का समय ही नहीं मिला कि क्यों वे पहले बीजेपी छोड़कर एसपी में आए और फिर अचानक जीती सीट से इस्तीफा देकर समाजवादी पार्टी छोड़ दी। दारा सिंह कहीं न कही ओपी राजभर के दावे के चलते भी कन्फ्यूज रहे। उधर अखिलेश यादव ने दारा सिंह के सामने सवर्ण प्रत्याशी उतार दिया। आमतौर पर माना जाता है कि सवर्ण और खासकर ठाकुर वोटर योगी की वजह से बीजेपी को ही वोट देगा, लेकिन सवर्ण सुधाकर सिंह के मैदान में होने से मामला उलट गया। दारा सिंह की दलबदलू छवि के आगे सवर्णों ने सुधाकर पर ही भरोसा कर लिया। ये बीजेपी के लिए भी बड़ा संदेश है कि सवर्ण वोटर को बंधुआ मानने की गलती न करे। वैसे भी सुधाकर घोसी के लोकल प्रत्याशी है, जबकि दारा सिंह पड़ोस की मधुबन विधानसभा के निवासी। इसी कारण स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा भी बन गया। इतना ही नहीं गोरखपुर से जुड़े सवर्ण नेताओं को अंदाजा था कि योगी जी, दारा सिंह चौहान और ओपी राजभर दोनों को पसंद नहीं करते। इन दोनों की बीजेपी में एंट्री दिल्ली कैंप के जरिए हुई है। इसका संदेश तब और चला गया जब योगी जी बहुत देर बाद चुनाव प्रचार में उतरे। करारी हार के बाद सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के सुर बदले नजर आए। हार की मायूसी चेहरे पर साफ दिखी। 
दारा सिंह की हार में सबसे बड़ा फैक्टर बीएसपी का कहा। 
2009 में दारा सिंह बीएसपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीते थे, जबकि 2014 में हार गए थे । उसके बाद उन्होंने बीएसपी छोड़ दी। इस बार बीजेपी ने बहुत कोशिश की कि बीएसपी किसी मुसलिम उम्मीदवार को उतार दे, लेकिन मायावती नहीं मानीं, उल्टा मायावती ने वोटिंग से पहले बीजेपी पर ही हमला कर दिया। इससे बीएसपी के कट्टर समर्थकों को संदेश चला गया कि जो नोटा नहीं दबाना चाहते हैं वो भी बीजेपी को कतई वोट न दें। इसका सीधा फायदा एसपी प्रत्याशी सुधाकर सिंह को मिला। 
2017 के विधानसभा चुनावों में बीएसपी ने अपना कैंडिडेट एक मुस्लिम प्रत्याशी अब्बास अंसारी को खड़ा किया .था. जिन्हें करीब 81 हजार वोट मिले थे.इस बार उपचुनाव में मुस्लिम वोट बंटने के चांस ही नहीं थे.क्योंकि किसी भी दल ने मुस्लिम कैंडिडेट नहीं उतारा....समझा जाता है 
इसीलिए मुस्लिम वोट एकमुश्त समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी सुधाकर सिंह मिले हैं. इसके अलावा बताते हैं कि यूपी के नगर विकास और बिजली जैसे महकमे संभाल रहे अरविंद शर्मा भी मऊ के मूल निवासी हैं और भूमिहार बिरादरी से आते हैं। गुजरात में आईएएस की तैनाती के दौरान पीएम मोदी के साथ रहे अरविंद शर्मा को बाद में यूपी भेज दिया गया। मऊ में नगर पालिका में करप्शन इतना बढ़ गया है कि कई बार अरविंद शर्मा को जानकारी दी गई, लेकिन उनका महकमा कुछ नहीं कर पाया। 
तो ऐसे कई छोटे बड़े कारण थे, जिनके कारण मऊ में बीजेपी को झटका लगा है। लेकिन इस जीत ने समाजवादी पार्टी और इंडिया गठबंधन में जोश भर दिया है। अखिलेश अभी से लगातार चुनौती देने लगे हैं। 
जिला पंचायत के उपचुनाव में भी समाजवादी पार्टी की साइकिल रफ्तार से दौड़ती दिखाई दी है। लखनऊ, मिर्जापुर, जालौन और बरेली में बड़ी जीत दर्ज की है। मिर्जापुर में राजगढ़ जिला पंचायत सदस्य सीट पर सपा की जीत हुई है। बरेली में जिला पंचायत सदस्य के उपचुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लगा है। बहेड़ी के वार्ड-16 जिला पंचायत सदस्य के उपचुनाव में सपा समर्थित प्रत्याशी जसविंदर कौर ने जीत दर्ज की है। उन्होंने भाजपा समर्थित शिल्पी चौधरी को 1258 वोटों से हराया।

 



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