शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024 | 09:12 IST
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महिलाओं को इलाज की सुविधा मुद्दा क्यों नहीं बन पाता ?


उत्तराखंड में नेताओं को लोकसभा पहुंचाने में हमेशा आगे रहने वाली महिला मतदाता स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में पीछे हैं। उत्तराखंड गठन के 23 साल बाद भी पिथौरागढ़ से लेकर अल्मोड़ा, बागेश्वर और चंपावत की महिलाओं की स्थिति में ज्यादा अधिक सुधार नहीं हुआ है।
हालात यह हैं कि स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में कई गांवों में आज भी महिलाएं बुजुर्ग महिलाओं से प्रसव कराने को मजबूर हैं। गर्भवतियों के अल्ट्रासाउंड के लिए स्वास्थ्य विभाग के पास एक रेडियोलॉजिस्ट, विशेषज्ञ चिकित्सक तक नहीं हैं। 
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ संसदीय सीट में आम चुनावों में पुरुषों से अधिक महिला मतदाता घर से निकलकर इस उम्मीद से मतदान करती है कि जीतने वाले जनप्रतनिधि उनकी समस्याओं को दूर करेंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं है। लोकसभा चुनाव 2024 में भी महिला मतदाताओं की भूमिका अहम साबित होने वाली है।
चार जनपदों की 14 विधानसभा में पंजीकृत कुल 13लाख 59हजार 815 मतदाताओं के सापेक्ष महिल वोटरों की संख्या करीब-करीब आधी है। यहां कुल 6लाख 50हजार 677 महिला मतदाता पंजीकृत हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे हैं।
अस्पताल सीमांत के सरकारी अस्पताल विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे हैं। जिला महिला अस्पताल को छोड़ दें तो अन्य सरकारी अस्पतालों में महिलाओं के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक तक नहीं है। मजबूरन महिलाएं एक से दूसरे अस्पतालों के ही चक्कर काटती रहती हैं।
प्रेमा तिवारी कहती हैं कि महिलाओं के लिए अल्ट्रासाउंड कराना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। डीडीहाट से अल्ट्रासाउंड कराने 60किमी दूर जिला मुख्यालय की दौड़ लगानी पड़ती है।
वोटर चमुली देवी ने बताया कि चुनाव के दौरान राजनैतिक दल व प्रत्याशी महिला स्वास्थ्य की बातें तो करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद महिलाओं की समस्याओं की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता।
महिला वोटर सुनीता पंत ने बताया कि पर्वतीय जनपदों में महिलाओं का स्वास्थ्य भगवान भरोसे हैं। यहां कई अस्पतालों में तो महिला विशेषज्ञ चिकित्सक ही तैनात नहीं हैं। स्टाफ नर्सो के भरासे महिलाएं अपना प्रसव कराती हैं।

 



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