बृहस्पतिवार, 17 अक्टूबर 2019 | 06:20 IST
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पांच सौ साल बाद बदलेगा देवलगढ़ स्थिति गौरा देवी मंदिर का कलश


उत्तराखंड देवों की भूमि,यहां कण-कण में देवता बसते है। यहां के मंदिर यहां के देवी-देवता यहां की लोक संस्कृति से जुड़े है। पग-पग बना मंदिरों को समूह यहां के जीवन को देवमय बना देता है। उत्तराखंड में देवों का वास है। इसलिए कहा जाता हैं कि देवभूमि उत्तराखंड में तैतीस कोटि देवताओं का आवास है,उनके मंदिर है।

उत्तराखंड में कई मंदिर तो सदियों पुराने है। जिनको यहां के लोगों ने सदियों से जीवंत बनाकर रखा है। ऐसा ही एक मंदिर है पौड़ी गढ़वाल के देवलगढ़ स्थिति गौरा मंदिर। देवलगढ़ स्थित राजराजेश्वरी मंदिर के पहले स्थित पौराणिक गौरा देवी मंदिर में पांच सौ साल बाद कलश बदला जायेगा। जो नवरात्र के मौके पर गौरा देवी मंदिर पर लगाया जायेगा। इससे पूर्व गौरा देवी की डोली की यात्रा विभिन्न स्थानों पर कराई जायेगी और देवप्रयाग में डोली स्नान के बाद मंदिर में कलश की स्थापना की जायेगी।

इस शुभ कार्य को समाजसेवी मोहन काला के सौजन्य से किया जाएगा। समाजसेवी मोहन काला मुंबई में रहकर निरंतर उत्तराखंड के विकास के लिए कई योजनाओं पर निरंतर कार्य कर रहे है। उत्तराखंड की श्रीनगर विधान सभा क्षेत्र की बात करें तो,इस क्षेत्र में मोहन काला गरीब एवं जरूरतमंद लोगों के लिए पिछले कई वर्षों से निरंतर कार्य कर रहे है। महिला उत्थान,गरीब छात्रा-छात्राओं की शिक्षा और ग्रामिण रोजगार की दिशा में मोहन काला लगातार कार्य कर रहे है। इसी दिशा में उनके गांव सुमाड़ी में प्रस्तावित एनआईटी के लिए उनके संघर्षों के बदौलत ही,अब केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री डॉक्टर रमेश पोखरिया निशंक ने जल्द से जल्द सुमाड़ी में प्रस्तावित एनआईटी के निर्माण की घोषणा की है।

अब मोहन काला से के सौजन्य से खिर्सू ब्लॉक के देवलगढ़ में स्थित प्रसिद्ध गौरा देवी मंदिर का पांच सौ साल पुराना कलश बदला जा रहा है। आपको बता दें कि देवलगढ़ स्थित गौरा देवी मंदिर अपने आप में एक पौराणिक एवं अद्भुत मंदिर है। मंदिर के ठीक ऊपर पांच से छह किलों का पीतल का कलश था, जिसे अब बदला जा रहा है, जिसकी जगह 20-25 किलो का भव्य कलश बनाया गया है। जो नवरात्र के मौके पर स्थापित किया जायेगा। समाजसेवी मोहन काला ने बताया कि गौरा देवी मंदिर में विगत पांच सौ साल पुराना कलश था। जो अब बदला जायेगा। जिसकी जगह अब नया कलश बनाया गया है। टम्टा मोहल्ला के गोपाल कारीगर द्वारा कलश को तैयार किया गया है। काला ने बताया कि नवरात्र के मौके पर भव्य देव आयोजन कर कलश की स्थापना की जायेगी। जबकि गौरा देवी की डोली का विभिन्न स्थानों पर भ्रमण भी कराया जायेगा और देवप्रयाग संगम पर डोली का स्नान भी कराया जायेगा।

देवलगढ़ में मां राजराजेश्वरी का पवित्र धाम भी है

गढ़ नरेशों की राजधानी देवलगढ़ में मां राजराजेश्वरी का पवित्र धाम स्थित है। मां राजराजेश्वरी का धाम भक्तों व श्रद्धालुओं के लिए वर्षभर खुला रहता है। यहां चैत्र व शारदीय नवरात्रों के अवसर पर विशेष पूजा अर्चना विधि विधान से की जाती है। वहीं 14 अप्रैल को हर वर्ष (बैसाखी) विखोत मेले का आयोजन विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। दस महाविद्याओं में तृतीय महाविद्या षोढषी को मां राजराजेश्वरी कहा जाता है। मां राजराजेश्वरी को महात्रिपुरा सुंदरी, कामेशी, ललिता, त्रिपुर भैरवी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। मां को वेदों और तंत्र शास्त्रों में योग, ऐश्वर्य व मोक्ष की देवी माना जाता है। 

मां राजराजेश्वरी मंदिर देवलगढ़ भक्तों, श्रद्धालुओं के लिए बारामास खुला रहता है। मां के मंदिर के कपाट देवी स्नान, आरती-पूजा अर्चना के साथ ब्रह्ममुहूर्त में ही श्रृद्धालुओं के लिए खुल जाते हैं। शाम साढ़े सात बजे विधि विधान से पूजा के साथ कपाट बंद कर दिए जाने हैं, लेकिन नवरात्रों में मंदिर में विशेष हवन किया जाता है।
14 वीं शताब्दी में देवलगढ़ के सिद्धपीठ मां राजराजेश्वरी की स्थापना 1512 में गढ़वाल नरेश राजा अजयपाल ने की थी। उन्होंने मां के मंदिर में उन्नत श्रीयंत्र स्थापित किया था। मां राजराजेश्वरी के तीन मंजिला मंदिर में राजा ने सबसे ऊपरी कक्ष में श्रीयंत्र, महिष मर्दिनी यंत्र, कामेश्वरी यंत्र, मूर्तियां व बरामदे में बटुक भैरव की स्थापना की है। साथ ही मंदिर में भगवान बदरीनाथ की डोली, केदारनाथ की डोली, दक्षिण काली की डोली, शिवलिंग भी स्थापित है। 



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