शुक्रवार, 17 जनवरी 2020 | 10:09 IST
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भ्रष्टाचार से मुक्ति का नया उपाय बेनामी संपत्ति पर प्रहार


प्रमोद भार्गव

            देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार का अगला कदम बेनामी संपत्ति पर करारी चोट के रूप में सामने आएगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ संकल्प को कड़ा करते हुए प्रधानमंत्री ने यह मंशा गोवा और फिर कर्नाटक में जताई है। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा है कि ‘काले-कारोबारियों को छोड़ने वाले नहीं हैं। बड़े नोटों की बंदी के बाद अब बेनामी संपत्ति की छानबीन की जाएगी। इस पर नियंत्रण के लिए हम कानून पहले ही बना चुके हैं, अब हमला बोलने वाले हैं।‘

            पूरा देश जानता है कि करोबारी, नौकरशाह और भ्रष्ट नेता गलत आचरण से अर्जित संपत्ति को हजार-पांच सौ के नोटों,  बेनामी जमीन-जायदाद और सोने-चांदी में खपाते हैं। इसीलिए भ्रष्टाचार से मुक्ति के उपायों का एक के बाद एक दायरा बढ़ाना जरूरी है। नोटबंदी के रूप में कालाधन पर चोट करने के बाद लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति के लिए तत्काल परेशानी जरूर उठानी पड़ रही है, बावजूद जन समर्थन सरकार के साथ है, क्योंकि कल इसका सबसे ज्यादा लाभ आम आदमी को ही मिलेगा। बेनामी संपत्ति की पड़ताल और फिर जब्ती होती है, तो यह एक सीमित तबके पर होगी। लिहाजा आम आदमी को इस उपाय से तत्काल कोई परेशानी होने वाली नहीं है। ज्यादातर ऐसी अचल संपत्ति भ्रष्ट नौकरशाहों और राजनेताओं के पास सबसे ज्यादा है। जितने भी सरकारी छोटे-बड़े अधिकारी कर्मचारियों के यहां छापे पड़े हैं, उनके पास से करोड़ों की नकदी के साथ सैकड़ों एकड़ भूमि और भवन के दस्तावेज भी बरामद हुए हैं। भूमण्डलीकरण और आर्थिक उदारवाद के बाद कृषि भूमि लघु और सीमांत किसानों से हस्तांतरित होकर चंद लोगों के पास लगातार केंद्रित होती जा रही है। यहां तक कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की आजीविका चलाने के लिए पट्टे पर मिलीं जो जमीनें विक्रय से प्रतिबंधित थीं, उन्हें भी नौकरशाहों और भूमफियाओं की मिली-भगत से हथिया लिया गया है। दरअसल जिला कलेक्टरों को इन प्रतिबंधित भूमियों को बेचने की अनुमति देने का अधिकार है। नतीजतन भ्रष्ट कलेक्टर के जिले में पदस्थ होने के साथ ही ऐसी भूमियों को हथियाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। ये भूमियां हरिजन- आदिवासियों के ही पास बनी रहें, इस मकसद से सरकार चाहे तो ऐसा कानून बना सकती है कि ये जमीनें केवल इन्हीं जातीय-समूहों के बीच बेची व खरीदी जा सकें।

            भ्रष्ट आचरण से कमाई दौलत ही वह वजह है, जिसके चलते आचार्य बिनोवा भावे द्वारा स्वतंत्रता के बाद चलाए गए सर्वोदय आंदोलन से प्रभावित होकर पूर्व जमींदारों व सामंतों ने जो हजारों एकड़ जीमन दान में दी थी, वह पूंजीपति लोगों के पास आ गईं। बिनोवा का पवित्र उद्देश्य इन जमीनों से उन लोगों को जोड़ना था, जो भूमिहीन थे और आजीविका चलाने के लिए केवल खेती-किसानी से जुड़ी मजदूरी पर निर्भर थे। बिनोवा का मानना था, ‘मनुश्य के लिए सबसे खतरनाक कोई चीज अगर है तो वह है, उसका जमीन से उखड़ना।  जैसे हर एक पेड़ का मूल जमीन से होता है, वैसे ही हर एक मनुष्य का संबंध जमीन के साथ होना चाहिए।‘ लेकिन आजादी के बाद से हमारी नीतियां और उन्हें अमल के उपाय कुछ ऐसे रहे हैं कि ग्रामीणों को शहर में मजदुरी कर गुजर-बसर के सब्जबाग दिखाए गए। कृषि का मशीनीकरण कर उसकी लागत बढ़ाई गई और फिर गांव-गांव शराब पहुंचाकर व्यक्ति की पसीने की जो कमाई थी, उसे हथियाने के उपाय कर दिए गए। लोगों को सुनियोजित ढंग से शराबी बनाए जाने के उपक्रमों के चलते परिवार घरेलू हिंसा की चपेट में आते चले गए। आज आलम यह है कि शराबजन्य उद्दण्डता के चलते ग्रामीणों पर सबसे ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन झगड़ों के चलते लघु और सीमांत किसानों की जमींने लगातार बिकती जा रही हैं। साफ है, ऐसे उपाय जमींनों को चंद लोगों के नामी-बेनामी रूपों में केंद्रीयकृत करने का सबब बन रहे हैं। इस लिहाज से बेनामी संपत्ति पर करारी चोट जरूरी है।

            नोटबंदी के चलते जिस तरह से पूंजी से जुड़ी बड़ी ताकतें संकट में आई हैं, उसी तर्ज पर बेनामी संपत्ति पर प्रहार होता है तो यह भी कालेधन को समाप्त करने का बड़ा उपाय साबित होगा। इस दृष्टि से उन लोक कल्याणकारी कथित ट्रस्टों पर भी चोट करनी होगी, जो हजारों एकड़ जमीन के मालिक हैं। देश के जितने भी पूर्व सामंत है, उनके ट्रस्टों के पास बीच शहरों में कई एकड़ भूमि खाली पड़ी हैं। इनकी वर्तमान कीमत अरबों रुपए है। इनमें से ज्यादातर अचल संपत्तियां ऐसी हैं, जो रियासतों के विलय के समय राज्य सरकारों की संपत्ति घोशित हो गई थीं। किंतु बाद में जब ये सामंत लोकतांत्रिक प्रक्रिया के चलते सांसद व विधायक बनकर सत्ता के अधिकारी हो गए तो इन्होंने दस्तावेजों में हेराफेरी कराकर इन जमींनों पर फिर से अपना मालिकाना हक हासिल कर लिया। चूंकि इनमें से ज्यदातर जमींने शहरी विस्तार के चलते बीच में आ गई हैं, इसलिए इनका मूल्य तो बढ़ा ही, ये आवासीय कॉलोनियों में भी तब्दील की जाने लगी हैं। बेनामी संपत्ति से जुड़े शायद ऐसे ही मामलों के परिप्रेक्ष्य में मोदी ने गोवा में कहा है कि गड़बड़ी करने वालों का कच्चा-चिट्ठा खंगाला जाएग। यह कच्चा-चिट्ठा खंगाला जाता है तो इसे खंगालने की शुरूआत रियासतों के विलय के वर्ष 1954 से 1956 तक से हो। क्योंकि विलय के पहले दस्तावेज इन्हीं वर्षों में तैयार हुए थे।

            हमें ज्ञात है कि गांधी की स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई सिर्फ सत्ता हस्तांतरण के लिए नहीं थी, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन ही उनका मुख्य लक्ष्य था। दरअसल अंग्रेजों ने जो प्रशासनिक व राजनैतिक व्यवस्था बनाई थी, वह भारतीयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाए रखकर उन पर राज करने की थी। इसी क्रम में अंग्रेजों ने 1935 में भारत शासन अधिनियम के तौर पर ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जो ‘बांटों और राज करो‘ के कुटिल सिद्धांत पर आधारित थी। इन व्यवस्थाओं का शासक व्यक्ति समानता व समरसता को तोड़ने की कमजोरियों के चलते बेहद शक्तिशाली और निरकुंश हो जाता है। यही वजह है कि प्रजातांत्रिक प्रक्रिया से गुजरने के बावजूद जो भी व्यक्ति सत्ता का हिस्सा बनता है, वह अंग्रेजी हुकूमत का व्यवहार अपनी ही प्रजा से करने लग जाता है। सबको बांटता है, लूटता है और केवल राजनीति करता है। नौकरशाह भी अंग्रेजों के लूट-प्रबंध को औजार बना लेते हैं। यही कारण है कि देश में आजादी के इन सत्तर सालों में हर क्षेत्र में असामानता की खाई निरंतर चौड़ी होती चली जा रही है। मोदी इस मिथक को नोटबंदी और आगे बेनामी संपत्ति पर शिकंजा कसने की बात कहकर तोड़ते दिख रहे हैं।

            ट्रांसपेरिसी इंटरनेशनल का मानना है कि भारत यदि भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाए तो देश से गरीबी का उन्मूलन आप से आप हो जाएगा। क्योंकि भ्रष्टाचार ही ऐसा कारक है जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायायपालिका के तंत्र को अपारदर्शी बनाए रखने का काम कर रहा है। इस दृष्टि से राजग सरकार ने भ्रष्टाचार के सह उत्पाद कालाधन और बेनामी संपत्ति पर हमला बोल दिया है, लेकिन इन तंत्रों में व्यापक सुधार की भी जरूरत है। इन सुधारों के होने पर ही आम आदमी को राहत मिलेगी।

            दरअसल लाइलाज हो चुके भ्रष्टाचार से छुटकारा मिल जाता है तो देश के सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वढ़ोतरी होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और बिजली-पानी जैसी सुवधाओं को धन की कमी नहीं रहेगी। बेनामी संपत्ति पर लगाम लगती है तो मोदी सभी गरीबों को अपने घर का जो सपना दिखा रहे हैं, उसके जल्दी साकार होने की उम्मीद बढ़ जाएगी। नोटबंदी का फैसला लागू होने से पहले, कालाधन पर शिकंजा कसने के जो उपाय किए थे, उनसे 1.25 लाख करोड़ कालाधन बाहर आ चुका है। इसके सार्थक नतीजों का पता इस तथ्य से भी चला है कि स्विटजरलैंड के बैंकों में 2015 के अंत तक जिन देशों के नागरिकों का कालाधन जमा था, भारत उनमें से तेजी से नीचे खिसक कर 75वें स्थान पर आ गया है। जबकि 2014 में यह स्थान 61वां था। यहां जमा भारतीयों का धन 33 फीसदी कम होकर 8,392 करोड़ रुपए रह गया है। भारतीयों का शेष धन स्विस बैंकों से निकलकर किसी ओर देश में जमा हुआ या फिर अघोषित रास्ते से निवेश के रूप में भारत आकर सफेद धन बना, इसकी पड़ताल भारत सरकार की वित्तीय एजेंसियों को करने की जरूरत है? बहरहाल केंद्र सरकार ने कालाधन और बेनामी संपत्ति पर लगाम लगाने का जो सिलसिला शुरू किया है, दरअसल यही वे उपाय हैं, जो संविधान में दर्ज समानता के अधिकार का पर्याय बनेंगे। मोदी का नारा ‘सबका साथ, सबका विकास‘ भी अंततः समानता की अवधारणा का ही पर्याय है।                                                            (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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