बृहस्पतिवार, 29 फ़रवरी 2024 | 04:54 IST
समर्थन और विरोध केवल विचारों का होना चाहिये किसी व्यक्ति का नहीं!!
होम | विचार | कांग्रेस ने प्रियंका गांधी से यूपी का प्रभार क्यों वापस लिया ?

कांग्रेस ने प्रियंका गांधी से यूपी का प्रभार क्यों वापस लिया ?


मोदी सरकार को हटाने के लिए आकाश-पाताल एक कर रही कांग्रेस को सबसे बड़ी चुनौती यूपी में मिलती आई है। यूपी कांग्रेस की प्रभारी बनाई गईं प्रियंका गांधी भी यूपी कांग्रेस की हालत सुधार नहीं पाई। अब प्रियंका गांधी से यूपी कांग्रेस का प्रभार वापस लेकर उनके खास अविनाश पाण्डे को सौंप दिया गया है। अविनाश पाण्डेय भी वही करेगे, जो प्रियंका करेंगी, लेकिन इतना जरूर है कि वे मेहनत करेंगी, न प्रियंका की तरह हॉली डे पॉलिटिक्स में आएंगे। 
सूत्रों की मानें तो गांधी परिवार अब प्रियंका को पूरी तरह बड़े नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहता है। अगर राहुल गांधी प्लान ए है तो प्रियंका गांधी वाड्रा प्लान बी हैं। ये भी खबर है कि प्रियंका गांधी भारत जोड़ो यात्रा में भी शिरकत कर सकती हैं। पिछली बार अमेठी से राहुल गाधी चुनाव हार गए थे, जिस तरह से स्मृति ईरानी और मोदी सरकार लगातार अमेठी में मेहनत कर रहे हैं, कांग्रेस के लिए अभी भी वहां जीत हासिल करना आसान नहीं है। इसलिए राहुल की जगह इस बार प्रियंका गांधी को अमेठी से मैदान में उतारने की तैयारी है। प्रियंका ने अगर स्मृति ईरानी को हरा दिया तो वे राष्ट्रीय स्तर की बड़ी नेता मान ली जाएंगी। पूरा प्लान क्या है आपको आगे बताते हैं। 
दरअसल प्रियंका गांधी कांग्रेस की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी की बेटी है। प्रियंका को कांग्रेस नेता हमेशा इस बात कहते रहते है कि उनमें पूर्व प्रधानमंत्री व दादी इंदिरा गांधी की छवि दिखती है। इसी के चलते साल 2019 में प्रियंका गांधी वाड्रा की आधिकारिक रूप से राजनीति में एंट्री हुई और उन्हें देश के सबसे बड़े सूबे यूपी का प्रभारी बनाया गया है। प्रियंका के प्रभारी बनते ही यूपी की सारी रणनीति प्रियंका के इर्द गिर्द घूमती रही। प्रियंका तक अपनी बात ना रख पाने के चलते कई पुराने कांग्रेसियों ने इस दौरान पार्टी भी छोड़ दी। वहीं प्रियंका को प्रभार मिलने के बाद भी कांग्रेस यूपी में कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई है। लोकसभा में एक और विधानसभा में दो सीट पर ही कब्जा है। विधान परिषद में कांग्रेस का कोई सदस्य नहीं है।
देखा जाए तो प्रियंका गांधी को लखनऊ सूट ही नहीं करता है। उनक हमेशा से दिल्ली पॉलिटिक्स कहें तो लुटियंस जोन्स के लोग 
ही समझ में आते हैं। छोटे शहरों में लोगों से कनेक्ट कर पाना इतना आसान नहीं होता।  प्रियंका को जब से यूपी प्रभारी बनाया गया था लेकिन पार्टी को कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा। उल्टे यूपी की हार के कारण उनके बड़े नेता होने की छवि पर धब्बा लग रहा था। इसीलिए 
एक रणनीति के तहत उनसे प्रभार वापस लेकर अविनाश पाण्डे को दिया गया। अविनाश भी प्रियंका के खास हैं, वहीं करेगे को प्रियका कहेंगी। 
ऐसे दौर में जब पीएम मोदी से लेकर उनके नेता, मंत्री सभी अपने संसदीय क्षेत्र में लगातार जाते हैं और रोजाना 24 घंटे राजनीति कर रहे है। ऐसे में अगर प्रियंका हॉलीडे पॉलिटिक्स करेंगी तो काम नहीं चल पाएगा। अगर 20 सालों के रिकॉर्ड देखे तो सोनिया, राहुल और प्रियंका अपने संसदीय क्षेत्र छोड़कर यूपी में कहीं नहीं गए हैं। इसलिए यूपी में कांग्रेस संगठन कमजोर होता गया। अब अविनाश पाण्डे की रणनीति के तहत अमेठी से राहुल की जगह प्रियंका को उतार जाएगा, जो स्मृति ईरानी को जवाब दे पाएंगी। वाराणसी से प्रियंका के लड़ने की हवा केवल उनकी छवि को बड़ा बनाने के लिए की जा रही है, क्योंकि मोदी के सामने कोई नहीं जीत सकता है और कांग्रेस किसी भी सूरत में प्रियंका की कुर्बानी नहीं देगी। 
स्मृति ईरानी ने पिछली बार राहुल गांधी को 55 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था. स्मृति ईरानी को 4 लाख 68 हजार से ज्यादा वोट मिले थे. जबकि राहुल गांधी के हिस्से में 4 लाख 13 हजार से ज्यादा वोट गए थे. स्मृति ईरानी को कुल वोट का 49.71 प्रतिशत और राहुल गांधी को 43.86 प्रतिशत वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर एक निर्दलीय प्रत्याशी रहे थे। इसी अंतर को प्रियंका को पाटना होगा। वो ऐसा कर सकती हैं क्योंकि अमेठी नेहरू-गांधी परिवार का गढ़ रहा है. संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी इस सीट से सांसद चुने गए थे. 2013 में अमेठी की जनसंख्या 15 लाख थी. जातिगत समीकरण के अनुसार यहां 66.5 प्रतिशत हिंदू हैं और मुस्लिम 33.04 प्रतिशत हैं.  प्रियका अगर मुसलिम वोट पूरे साध लेती हैं और आधे हिन्दू वोट भी ले गईं तो स्मृति को हरा सकती हैं। 
वैसे ऐसा नहीं है कि प्रियंका ने यूपी में कोई काम नहीं किया। पार्टी के लिए लड़की हूं लड़ सकती हूं नारे को लेकर उन्होने काफी प्रयास किया। लेकिन संगठन इतना कमजोर है कि उनके प्रयास नाकाफी साबित हुए । अविनाश पाण्डेय और अजय राय को पार्टी आलाकमान ने फीड बैक सिस्टम ओपन करने की नसीहत दी है। पुराने कांग्रेसी अपनी बात ऊपर तक पहुंचा नहीं पाते तो परेशान होकर घर बैठ जाते हैं या फिर समाजवादी पार्टी या बीएसपी में चले जाते हैं। 
अगर इंडिया गठबंधन की बात करें तो वैसे भी यूपी में इंडिया गठबंधन का चेहरा अखिलेश यादव होंगे,। ऐसे में अगर प्रियंका यूपी कांग्रेस की प्रभारी होतीं तो उनको एक तरह से अखिलेश के हिसाब से काम करना पड़ता., इससे इमेज छोटी लगने लगती। इसलिए उनसे प्रभार वापस लेकर अविनाश को दिया गया। कांग्रेस को सपा से गठबंधन का फायदा मिलता रहा है। 2022 में बिना गठबंधन कांग्रेस विधानसभा में दो सीटों पर और लोकसभा में केवल एक सीट पर पहुंच गई है। 2017 में जब गठबंधन था तब कांग्रेस को सात सीटों पर जीत मिली थी। इसलिए कांग्रेस हर हाल में अखिलेश से गठबंधन करेगी, लेकिन बीएसपी का नाम लेकर दबाव की रणनीति अपनाती रहेगी। लोकसभा चुनाव में अखिलेश को भी कांग्रेस को जरूरत है, ताकि मुसलिम वोट बंटने नहीं पाएं और बीएसपी की जगह इंडिया गठबंधन को अपना समझे। 
यूपी कांग्रेस के नए प्रभारी अविनाश पांडे 28 दिसंबर को नागपुर में होने वाली कांग्रेस की रैली के बाद पहली बार लखनऊ पहुंचेंगे। रैली के बाद ही उनके आने का कार्यक्रम तय किया जाएगा। पहली बार यूपी का प्रभार पाए अविनाश को उस मुश्किल वक्त में यह जिम्मेदारी दी गई है, जब कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर में है। बीते पांच साल में उसके कई नेता पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं। संगठन में भी अघोषित तौर पर दो फाड़ हो चुके हैं। एक हिस्सा वह है, जो मौजूदा टीम के साथ है और दूसरा वह, जिसे पार्टी के कामों की जिम्मेदारी देना तो दूर कार्यक्रमों में पूछा तक नहीं जाता है।
अगले साल प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के पहले मिली जिम्मेदारी को निभाने में अविनाश के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट करने की है। चूंकि अविनाश मूल रूप से पार्टी काडर के हैं, लिहाजा उनके सामने इन सभी लोगों को अडजस्ट करके चलने की मुश्किल होगी। 
एक ऐसे राज्य में जहां, जाति की राजनीति अहम है, वहां ब्राह्मण समुदाय के पांडे की नियु्क्ति को पार्टी की 'सोशल इंजीनियरिंग' की कोशिश के तौर पर देखी जा रही है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय पूर्वी यूपी से आते हैं और पार्टी का 'भूमिहार' चेहरा हैं.
पांडे को यूथ कांग्रेस के दिनों से ही उनके संगठनात्मक कौशल के लिए जाना जाता है और पार्टी के अंदरखाने के लोगों का कहना है कि शीर्ष नेतृत्व को ऐसा लगता है कि पांडे राज्य में फिर से संगठन खड़ा करने में मदद कर सकते हैं.
65 साल के पांडे ने अपना राजनीतिक करियर 1970 के दशक में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई से किया था. इसके बाद वह धीरे-धीरे पार्टी में बड़े पदों तक पहुंचते रहे.
सल 2008 में वह राहुल बजाज से महज़ एक वोट के अंतर से राज्यसभा चुनाव हार गए थे. लेकिन साल 2010 से 2016 तक वह महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद रहे. नागपुर से आने वाले पांडे राजस्थान प्रभारी सहित कांग्रेस संगठन में कई अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं.हालांकि अविनाश के  लिए यूपी में पार्टी को खड़ा कर  पाना इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके पहले जब अजय राय को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिली थी तब उन्होंने भी ऐसे ही दावे किए थे। हालांकि, प्रदेश कांग्रेस की कार्यसमिति की जारी सूची में किसी का भी एडजस्टमेंट नहीं हो पाया। अब विस्तारित कार्यसमिति के आने की बात कही जा रही है। अब देखना है अजय राय और अविनाश पाण्डे की जोड़ी यूपी कांग्रेस को कितना मजबूत कर पाती है। अगर प्रियंका अमेठी से चुनाव जीत गईं तो ये सबसे बड़ी उपलब्धी होगी। 

 



© 2016 All Rights Reserved.
Follow US On: