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विदेश से महंगा ब्लैक वाटर मंगाकर क्यों पीते हैं कोहली ?


भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान  विराट कोहली का पीने का पानी 
फ्रांस से आता है, आपने ये बात ज़रूर सुनी होगी।  उनके पूरे एक साल के पानी का खर्च पांच लाख रुपये के आसपास आता है। यही पानी एक्ट्रेस मलैयका अरोड़ा, प्रोड्यूसर करण जौहर सहित बॉलीवुड के कई स्टार पीते हैं। इसी तरह बताते हैं कि अंबानी परिवार की मुखिया नीता अंबानी जो पानी पीती हैं, उसकी एक बोतल 60 हज़ार डॉलर यानी करीब 50 लाख रुपये की आती है। महंगा पानी के कई ब्रैम्ड हैं, जिनका पानी खूब  बिकता है। जापान की कंपनी फिलिको ज्वैलरी वाटर एक लाख दस हजार रुपये लीटर, जर्मनी की नेवास का 94 हजार लीटर, अमेरिका की ब्लिक एच2ओ
साढ़े सत्रह हजार, नॉर्वे की कंपनी स्वालबार्डी 15 हजार रुपये लीटर, ब्राजील की अमेजन की नौ हजार रुपये लीटर पानी बिकता है। 
जो पानी पूरी दुनिया में बिखरा पड़ा है, उसकी कीमत इतनी ज़्यादा क्यों है और इसमें क्या खास बात होती है, कोहली को इससे क्या फायदा होता है, आइये आपको सब समझाते हैं। 
हम और आप तो आरओ से पानी साफ करके या सीधे कुदरतों से हासिल पानी आसानी से पी लेते हैं। हमें इससे कोई ज़्यादा दिक्कत भी नहीं होती। लेकिन आप जानते ही होंगे कि पानी का शरीर पर बहुत असर पड़ता है। अगर पानी में कोई जहरीले तत्व हों तो कई बीमारियां फैला सकते हैं। लेकिन विराट कोहली और नीता अंबानी की देखा देखी, अब कई भारतीय क्रिकेटर स्पेशल पानी पीने लगे हैं। ये स्पेशल पानी हैं ब्लैक वाटर यानी काला पानी। 
भारतीय खिलाड़ियों में हार्दिक पंड्या, सूर्य कुमार यादव, धूली चंद जैसे बड़े खिलाड़ी यही ब्लैक वाटर पी रहे  हैं। बस अंतर इतना है कि जो बहुत धनी हैं तो उनका पानी विदेशी ब्रैण्ड का ब्लैक वाटर आता है, जबकि कम खर्च करने वाले भारत में ही बनने वाला 'इवोकस' ब्रैण्ड का पानी पीते हैं। इवोकस का ब्लैक वाटर ज़्यादा महंगा नहीं है और मिडिल क्लास के लोग भी अफोर्ड कर सकते हैं। 
इवोकस की 6 हाफ लीटर वाली बोतल 600 रुपये में मिलती हैं. इसका मतलब 3 लीटर की कीमत 600 रुपये हुई। इस हिसाब से 200 रुपये प्रति लीटर ब्लैक वॉटर की कीमत है। 
अब आप जानना चाहेंगे कि इस ब्लैक वाटर में ऐसी क्या खास बात है जो ये पैसे वाले लोग इसे ही पीते हैं। तो आइये आपको पूरा बताते हैं। डॉक्टर्स के मुताबिक इसमें ऩार्मल पानी के मुकाबले खनिजों की मात्रा अधिक होती है। जिसमें मैग्नीशियम, सोडियम, कैल्शियम और पोटैशियम जैसे लगभग 70 खनिज शामिल हैं।
इसमें खनिज, 8 या उच्चतर पीएच, अल्ट्रा-हाइड्रेटिंग, डिटॉक्सीफाइंग और एंटी-एजिंग गुण शामिल हैं।ब्लैक वॉटर की एक बोतल में 32 मिलिग्राम (mg) कैल्सियम, 21 मिलिग्राम (mg) मैग्नीशियम और 8 मिलिग्राम (mg) सोडियम होता है। इसे ही अपने शरीर में लेने के लिए ये स्टार्स ब्लैक वाटर पीते हैं। आइये अब जानते हैं कि खनिजों से फायदे क्या होते हैं। 
स्प्रिंग या ग्लेशियर वॉटर एक ऐसे प्रकार का पानी होता है जो बोतल बंद होता है और बताता है कि ये ग्लेशियर वॉटर है. 
माना जाता है कि ये सेहत के लिए सबसे साफ पानी होता है. इसमें किसी भी प्रकार के विषैले पदार्थ नहीं पाए जाते हैं। प्राकृतिक ब्लैक वाटर तब बनता है जब पानी चट्टानों से होकर झरने की तरह बहता है. यह पानी खनिजों को अपने साथ शामिल कर लेता है, जिससे इसका pH लेवल बढ़ जाता है. कृत्रिम – ज्यादातर ब्लैक वाटर जिसे लोग पीते हैं, वह artificial होता है. इसे एक केमिकल प्रोसेस से तैयार किया जाता है, जिसे electrolysis कहा जाता है.
ब्लैक वाटर मानव शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की सप्लाई को बढ़ा देता है। इसके नियमित सेवन से शरीर में रक्त का संचार बहुत ही प्रभावी ढंग से होता है। ह गैस और अपच जैसी पाचन समस्याओं को भी दूर करता है। ह मधुमेह (diabetes) के मरीजों को भी लाभ पहुंचाता है। यह त्वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है, खासतौर पर उनके लिए जिन्हें मुहांसों की समस्या रहती है।
ये रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।वजन घटाने में मदद करता है।इसमें एंटी-एजिंग गुण है, जिनसे त्वचा का ग्लो बना रहता है।
ये कैंसर से बचाता है।ये शरीर का पी.एच. लेवल मेन्टेन करके एसिडिटी को कम करता है।
साधारण पानी के मुकाबले शरीर को ज्यादा हाइड्रेटेड रखता है।
यह हड्डियों को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है।
शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर करता है।
उच्च रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है।
तो इतने फायदों के कारण ही दुनिया में इसकी इतना ज़्यादा कीमत है। इसीलिए क्रिकेटर, एथलीट और अमीर लोग इसको पीकर हेल्थी बने रहते हैं। लेकिन दोस्तो कुदरत कभी नाइंसाफी नहीं करती। अगर आप ब्लैक वाटर पर इतना पैसा खर्च करना नहीं चाहते हैं तो कुदरती श्रोतों से निकलने वाले साफ पानी को इस्तेमाल करें। उसमें भी कई खनिज लवण होते हैं। इसीलिए गांव के लोगों की सेहत अच्छी रहती है। लेकिन आर ओर से निकले पानी के सारे खनिज ख़त्म हो जाते हैं, इसलिए शहरों के लोग ज़्यादा बीमार पड़ते हैं। 

 

 



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