बृहस्पतिवार, 6 अक्टूबर 2022 | 08:28 IST
समर्थन और विरोध केवल विचारों का होना चाहिये किसी व्यक्ति का नहीं!!
होम | लाइफस्टाइल | उत्तराखण्ड का भोटिया समाज- परंपराओं को सहेजते हुए तरक्की की राह पर

उत्तराखण्ड का भोटिया समाज- परंपराओं को सहेजते हुए तरक्की की राह पर


बदलते उत्तराखण्ड के दौर में जिस एक समाज ने अच्छी तरक्की की है, वो है भोटिया समाज. लंबे समय तक खानाबदोश रहे भोटिया समाज के लोग अब आमतौर पर उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ के सीमांत गांवों में रहने लगे हैं। उनके कारण देश की सुरक्षा करने में आईटीबीपी को काफी मदद मिलती है। चीन से आने वाले खतरे के प्रति आईटीबीपी को आगाह करके भोटिया समाज देश की बहुत मदद भी करता आ रहा है। 
इस जनजाति के लोगों को अपनी परंपराओं से बेहद लगाव है। इसी कारण ये जनजाति अलग से पहचानी जाती है। लंबे समय तक खानाबदोश जीवन जीने रहे इस जनजाति के लोग अब काफी संपन्न हैं और शानदार घर बनाकर रहते हैं। पहले तिब्बत से व्यापार, फिर ऊनी कपड़ों की बिक्री और पहाड़ी जड़ी बूटियों की अच्छी समझ के कारण इनकी आर्थिक स्थित ठीक होती चली गई। 
बाकी जनजातियों के मुकाबले भोटिया समाज की हालत काफी बेहतर है। पहले तिब्बत के साथ व्यापार से हुई आमदनी से ये जीवनयापन करते थे । भोटिया जनजाति के लोग यहां से ऊनी कपड़े और नमक आदि ले जाकर तिब्बत में बेचते थे। वहां से जड़ी बूटियां और दूसरे सामान लाकर पहाड़ी गांवों में बेचते थे। 
ये समुदाय घुमन्तु और व्यापारिक समूह रहा है। भारत और तिब्बत के बीच व्यापार करते हुए उन्होंने एक विलक्षण सांकेतिक भाषा का भी विकास किया। जिसे केवल दोनों क्षेत्रों के व्यापारी ही समझते थे, इनके बीच व्यापार संकेतों और इशारों से भी होता था। 
भोटिया समुदाय भारत की जनजातियों में सर्वाधिक विकसित है, इनकी भाषा से तिब्बतियों के अधिक करीब है और शारीरिक गठन के लिहाज से यह मँगोलियन लगते हैं। भोटिया स्वयं को हिन्दू राजपूत मानते हैं, हिन्दू तीर्थ बद्रीनाथ के कपाट जब शीतकाल के लिए बंद होते हैं तब भगवान विष्णु की पद्मासन वाली पाषाण प्रतिमा को छह माह के लिए माणा गाँव की कुंवारी मारछा कन्याओं द्वारा बुनी गई कम्बल में लपेट कर गर्भगृह में रखा जाता है।
इनकी सबसे खूबसूरत बात है है कि ये अपनी परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं । खास मौकों पर ये अपनी पारंपरिक वेशभूषा में नज़र आते हैं । घर में धार्मिक अनुष्ठान या शादी ब्याह जैसे खुशी के मौकों पर गांव के सभी लोग मिलकर पौना नृत्य करते हैं । गांव के ही कुछ कलाकार मिलकर मूशक बाजा ढोल और दमाउ बजाते हैं और इनकी धुन पर सभी एक साथ थिरकते हैं । पारंपरिक वेशभूषा की वजह से इनकी खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है ।
इस परंपरागत नृत्य में सभी उम्र के लोग पूरी तरह से पारंपरिक परिधानों में होते हैं खासकर महिलाएं काले और सफेद रंग के परिधान खास तरह के गहने पहनती हैं। सुहागिन महिलाएं नाक में बड़ी सी नथ पहनती हैं जिसे बुलाक कहते हैं। इसके अलावा मुरकी, हांसुली, धाकुली, चंद्राहार, जंजीर, चिमटा, सुंवर दांत, कनकौरी और चाकू गहना जैसे तमाम गहने पहनकर महिलाएं खास मौकों के लिए तैयार होती हैं । दरअसल यही मौके होते हैं जब आधुनिक जीवन शैली की दौड़ में खुद को बनाए रखने की कोशिश में लगे ये लोग अपनी परंपरा और संस्कृति को जीते हैं ।

 



© 2016 All Rights Reserved.
Follow US On: