सोमवार, 23 सितंबर 2019 | 11:01 IST
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भैरवगढ़ी ,गढ़वाल मंडल के रक्षक


यूं तो भगवान शिव को कई नामों से पुकारा जाता है। लेकिन उनके 15 अवतारों में एक नाम भैरवगढ़ी का आता है। ये मंदिर देवभूमि उत्तराखंड में स्थित है। भैरवगढ़ी लैंसडाउन से लगभग 17 किमी की दूरी पर कीर्तिखाल की पहाड़ी पर मौजूद है। यहां कालनाथ भैरव की पूजा नियमित रूप से की जाती है। कीर्तिखाल पहाड़ी पर स्थित कालनाथ भैरव को सभी चीजें काली पंसद होती है और उन्हीं की पंसद पर कालनाथ भैरव के लिए मंडवे के आटे का प्रसाद बनाया जाता है। मंडवे के आटे से बने इस प्रसाद को रोट कहते हैं। भैरवगढ़ी को गढ़वाल मंडल का रक्षक माना जाता है। भैरव के साधक और पुजारी आज भी भैरवगढ़ी चोटी पर जाकर सिद्धि प्राप्त करते हैं। कहा जाता है कि यहां आकर हर किसी की मुराद पूरी होती है। अगर मुराद पूरी हो जाए, तो यहां श्रद्धालु चांदी का छत्र चढ़ाते हैं।

भैरव महिमा से प्रभावित होकर गोरखों ने चढ़ाया ताम्रपत्र गढ़ों की मान्यता को अगर देखा जाए तो गढ़वाल में एक गढ़ भैरवगढ़ भी है. जिसका वास्तविक नाम लंगूरगढ़ है। लांगूल पर्वत पर मौजूद होने के कारण इसका नाम लंगूरगढ़ पड़ा. सन् 1791 तक लंगूरगढ़ को बहुत शक्तिशाली माना जाता था। इस जगह को जीतने के लिए दो वर्षों तक घेराबंदी भी हुई लेकिन 28 दिनों के संघर्ष के बाद गोरखा पराजित हुए और लंगूरगढ़ से वापस चले गए। इन गोरखों में से एक थापा नाम के गोरखा ने भैरव की शक्ति से प्रभावित होकर वहां ताम्रपत्र चढ़ाया था। इसका वजन 40 किलो बताया जाता है। भैरवगढ़ी में स्थित ये मंदिर भैरव की गुमटी पर बना है, जिसके बाहर बायें हिस्से में शक्तिकुंड है। इस मंदिर में नवविवाहित जोड़े भी मनौतियां मांगने पहुंचते हैं। इस धाम का प्राकृतिक सौंदर्य भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। चोटी पर होने के कारण बर्फ से लदी पहाड़ियां और हरियाली पर्यटकों को शांति का भी अनुभव कराती है।

अधो गढ़वाल अधो असवाल कहावत को चरित्रार्थ करने वाली यह गढ़ी 52 गढ़ियों के इतिहास में मात्र एक ऐसी गढ़ी के रूप में प्रसिद्ध रही है। जिस पर गोरखा सैनिक कभी भी विजय हासिल नहीं कर पाए। सन 1797 में जब गोरखा सैनिक सेनापति अमर सिंह थापा के नेतृत्व में गढ़वाल आक्रमण करते स्याल बूंगा किला (नजीबाबाद) को विजित करते हुए आगे बढे तब उन्हें भंधो असवाल जोकि तत्कालीन समय में महाबगढ़ का गढ़पति था और मानदयो असवाल (भैरों गढ़ी) के गढ़पति से करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. गोरखा सेना ने तीन माह तक लंगूर गढ (भैरों गढ़ी) की घेरा बंदी सवा लाख सैनिकों के साथ करके रखी लेकिन गढ़ी पर विजय करना तो दूर वे इस से आगे नहीं बढ़ पाए. राशन ख़त्म होने के कारण गोरखा सैनिकों को वापस लौटना पड़ा. 84 गॉवों के जागीरदार अस्वालों की विजय का डंका पूरे बावन गढ़ियों में गूंजने लगा. आखिर घर का भेदी लंका ढावे वाली कहावत चरित्रार्थ हुई और सन 1802 में आये बिनाश्कारी भूकंप की जद में आये सम्पूर्ण गढ़वाल का दो तिहाही क्षेत्र जलमग्न हो गया जिसने 52 गढ़ियों का सारा अधिपत्य ही समाप्त कर दिया. इस भूकंप ने इस अजर अमर गढ को भी मिटा दिया जिसका दुष्परिणाम यह निकला कि हस्ती दल चौरसिया और सेनापति अमर सिंह थापा ने गढ़वाल पर सहारनपुर के रास्ते देहरादून और नजीबाबाद के रास्ते श्रीनगर पर दो तरफ़ा आक्रमण कर दिया. बुरी तरह तबाह हुए उत्तराखंड पर आखिर गोरखा अधिपत्य हुआ और 52 गढ़ियों का इतिहास समाप्त हुआ.
गढ़वाल के रक्षक के रूप में अर्थात द्वारपाल के रूप में भैरव (भैरों) का बहुत बड़ा महत्व माना गया है। भैरव के अनुयायी पुजारी और साधक भैरवगढ़ी की चोटी पर जाकर साधना कर आज भी सिद्धि प्राप्त करते हैं ।
 

 



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