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अमरनाथ यात्रा, कड़ी सुरक्षा के बीच शुरू, श्रद्धालुओं का पहला जत्था रवाना


 पवित्र अमरनाथ गुफा की दुर्गम यात्रा आज से शुरू हो गई है। हर-हर महादेव और बम भोले के जयकारे लगाते हुए भगवान शिव के भक्तों का पहला जत्था निकल पड़ा है। भगवान शिव के हिमलिंग के दर्शन करने के लिए। 46 दिनों तक चलने वाली अमरनाथ यात्रा को लेकर भक्तों में गज़ब का उत्साह है। वह भोले के रंग में रंगे दिखते हैं। अमरनाथ यात्रा को लेकर इस बार कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है। जगह-जगह पर जवानों की मुस्तैदी है। सीसीटीवी और ड्रोन के ज़रिए चप्पे चप्पे पर नजर रखी जा रही है।

यह यात्रा अनंतनाग जिले के 36 किलोमीटर लंबे पारंपरिक पहलगाम मार्ग और गांदेरबल जिले के 14 किलोमीटर लंबे बालटाल मार्ग से होती है। यहां से निकले श्रद्धालु शाम तक श्रीनगर पहुंचेंगे और सोमवार को बाबा बर्फानी के दर्शन कर पाएंगे। अमरनाथ श्रद्धालुओं का पहला जत्था यहां कड़ी सुरक्षा के बीच रविवार को रवाना हो गया और इस संबंध में आवश्यक प्रबंध कर लिए गए हैं। अधिकारियों ने बताया कि अब तक देश भर से करीब डेढ़ लाख श्रद्धालुओं ने 46 दिन चलने वाली इस यात्रा के लिए पंजीकरण कराया है। 

जम्मू बेस कैंप से राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सलाहकार के के शर्मा ने झंडा दिखाकर पहले जत्थे को रवाना किया। पूरे अमरनाथ यात्रा के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। यह यात्रा अनंतनाग जिले के 36 किलोमीटर लंबे पारंपरिक पहलगाम मार्ग और गांदेरबल जिले के 14 किलोमीटर लंबे बालटाल मार्ग से होती है। इस तीर्थयात्रा को लेकर साधुओं समेत सैकड़ों श्रद्धालु अत्यंत उत्साहित हैं। जम्मू के मंडल आयुक्त संजीव वर्मा ने बताया कि तीर्थयात्रियों की सुविधा और यात्रा के दौरान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा समेत सभी जरूरी प्रबंध कर लिए गए हैं। यात्रा 15 अगस्त को खत्म होगी। 

जम्मू के पुलिस महानिरीक्षक एम. के. सिन्हा ने कहा कि खतरे की आशंका के मद्देनजर यात्रा मार्ग पर लखनपुर (जम्मू-कश्मीर के लिए प्रवेश द्वार) से लेकर आधार शिविरों, आश्रय केंद्रों, ठहराव स्थानों और सामुदायिक किचन स्थानों पर पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं। उन्होंने कहा कि यात्रा को अवरोधित करने की आतंकवादियों की किसी योजना को लेकर खुफिया जानकारी नहीं है, लेकिन राज्य के वर्तमान सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए किसी भी आतंकी प्रयास को विफल करने के लिए सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। 

यात्रा का रजिस्ट्रेशन पंजाब नैशनल बैंक 440 ब्रांचेज , जम्मू-कश्मीर बैंक और यह बैंक में करवाया जा सकता है। रजिस्ट्रेशन करते समय तीर्थयात्रियों को एक स्वास्थ्य प्रमाणपत्र (सीएचसी) देना होगा, जो कि बेहद जरूरी है। 

अमरनाथ हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में 137 सहस्त्रमीटर दूर समुद्रतल से 13,600 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई भीतर की ओर गहराई 19 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। गुफा 11 मीटर ऊँची है। अमरनाथ गुफा भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्यों कि यहीं पर भगवान शिव ने माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था।

यहाँ की प्रमुख विशेषता पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिवलिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहते हैं। आषाढ़पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखों लोग यहां आते हैं।  गुफा की परिधि लगभग डेढ़ सौ फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूँदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूँदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। आश्चर्य की बात यही है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबकि गुफा में आमतौर पर कच्ची बर्फ ही होती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा जाए। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं।

 जनश्रुति प्रचलित है कि इसी गुफा में माता पार्वती को भगवान शिव ने अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुनकर सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गये थे। गुफा में आज भी श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई दे जाता है, जिन्हें श्रद्धालु अमर पक्षी बताते हैं। वे भी अमरकथा सुनकर अमर हुए हैं। ऐसी मान्यता भी है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों को जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव पार्वती अपने प्रत्यक्ष दर्शनों से निहाल करके उस प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान शिव ने अद्र्धागिनी पार्वती को इस गुफा में एक ऐसी कथा सुनाई थी, जिसमें अमरनाथ की यात्रा और उसके मार्ग में आने वाले अनेक स्थलों का वर्णन था। यह कथा कालांतर में अमरकथा नाम से विख्यात हुई।

कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान शंकर जब पार्वती को अमर कथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनबाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये तमाम स्थल अब भी अमरनाथ यात्रा में आते हैं। अमरनाथ गुफा का सबसे पहले पता सोलहवीं शताब्दी के पूर्वाध में एक मुसलमान गडरिए को चला था। आज भी चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है। आश्चर्य की बात यह है कि अमरनाथ गुफा एक नहीं है। अमरावती नदी के पथ पर आगे बढ़ते समय और भी कई छोटी-बड़ी गुफाएं दिखती हैं। वे सभी बर्फ से ढकी हैं।

अमर नाथ यात्रा पर जाने के भी दो रास्ते हैं। एक पहलगाम होकर और दूसरा सोनमर्ग बलटाल से। यानी कि पहलमान और बलटाल तक किसी भी सवारी से पहुँचें, यहाँ से आगे जाने के लिए अपने पैरों का ही इस्तेमाल करना होगा। अशक्त या वृद्धों के लिए सवारियों का प्रबंध किया जा सकता है। पहलगाम से जानेवाले रास्ते को सरल और सुविधाजनक समझा जाता है। बलटाल से अमरनाथ गुफा की दूरी केवल १४ किलोमीटर है और यह बहुत ही दुर्गम रास्ता है और सुरक्षा की दृष्टि से भी संदिग्ध है। इसीलिए सरकार इस मार्ग को सुरक्षित नहीं मानती और अधिकतर यात्रियों को पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन रोमांच और जोखिम लेने का शौक रखने वाले लोग इस मार्ग से यात्रा करना पसंद करते हैं। इस मार्ग से जाने वाले लोग अपने जोखिम पर यात्रा करते है। रास्ते में किसी अनहोनी के लिए भारत सरकार जिम्मेदारी नहीं लेती है।

पहलगाम से अमरनाथ

पहलगाम जम्मू से 317 किलोमीटर की दूरी पर है। यह विख्यात पर्यटन स्थल भी है और यहाँ का नैसर्गिक सौंदर्य देखते ही बनता है। पहलगाम तक जाने के लिए जम्मू-कश्मीर पर्यटन केंद्र से सरकारी बस उपलब्ध रहती है। पहलगाम में गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से लंगर की व्यवस्था की जाती है। तीर्थयात्रियों की पैदल यात्रा यहीं से आरंभ होती है।

पहलगाम के बाद पहला पड़ाव चंदनबाड़ी है, जो पहलगाम से आठ किलोमीटर की दूरी पर है। पहली रात तीर्थयात्री यहीं बिताते हैं। यहाँ रात्रि निवास के लिए कैंप लगाए जाते हैं। इसके ठीक दूसरे दिन पिस्सु घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। कहा जाता है कि पिस्सु घाटी पर देवताओं और राक्षसों के बीच घमासान लड़ाई हुई जिसमें राक्षसों की हार हुई। लिद्दर नदी के किनारे-किनारे पहले चरण की यह यात्रा ज्यादा कठिन नहीं है। चंदनबाड़ी से आगे इसी नदी पर बर्फ का यह पुल सलामत रहता है।

चंदनबाड़ी से 14 किलोमीटर दूर शेषनाग में अगला पड़ाव है। यह मार्ग खड़ी चढ़ाई वाला और खतरनाक है। यहीं पर पिस्सू घाटी के दर्शन होते हैं। अमरनाथ यात्रा में पिस्सू घाटी काफी जोखिम भरा स्थल है। पिस्सू घाटी समुद्रतल से 11,120 फुट की ऊँचाई पर है। यात्री शेषनाग पहुँच कर ताजादम होते हैं। यहाँ पर्वतमालाओं के बीच नीले पानी की खूबसूरत झील है। इस झील में झांककर यह भ्रम हो उठता है कि कहीं आसमान तो इस झील में नहीं उतर आया। यह झील करीब डेढ़ किलोमीटर लम्बाई में फैली है। किंवदंतियों के मुताबिक शेषनाग झील में शेषनाग का वास है और चौबीस घंटों के अंदर शेषनाग एक बार झील के बाहर दर्शन देते हैं, लेकिन यह दर्शन खुशनसीबों को ही नसीब होते हैं। तीर्थयात्री यहाँ रात्रि विश्राम करते हैं और यहीं से तीसरे दिन की यात्रा शुरू करते हैं।

शेषनाग से पंचतरणी आठ मील के फासले पर है। मार्ग में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे को पार करना पड़ता हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊँचाई क्रमश: 13,700 फुट व 14,700 फुट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी तक का सारा रास्ता उतराई का है। यहाँ पांच छोटी-छोटी सरिताएँ बहने के कारण ही इस स्थल का नाम पंचतरणी पड़ा है। यह स्थान चारों तरफ से पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियों से ढका है। ऊँचाई की वजह से ठंड भी ज्यादा होती है। ऑक्सीजन की कमी की वजह से तीर्थयात्रियों को यहाँ सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ते हैं।

अमरनाथ की गुफा यहाँ से केवल आठ किलोमीटर दूर रह जाती हैं और रास्ते में बर्फ ही बर्फ जमी रहती है। इसी दिन गुफा के नजदीक पहुँच कर पड़ाव डाल रात बिता सकते हैं और दूसरे दिन सुबह पूजा अर्चना कर पंचतरणी लौटा जा सकता है। कुछ यात्री शाम तक शेषनाग तक वापस पहुँच जाते हैं। यह रास्ता काफी कठिन है, लेकिन अमरनाथ की पवित्र गुफा में पहुँचते ही सफर की सारी थकान पल भर में छू-मंतर हो जाती है और अद्भुत आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

बलटाल से अमरनाथ

जम्मू से बलटाल की दूरी 400 किलोमीटर है। जम्मू से उधमपुर के रास्ते बलटाल के लिए जम्मू कश्मीर पर्यटक स्वागत केंद्र की बसें आसानी से मिल जाती हैं। बलटाल कैंप से तीर्थयात्री एक दिन में अमरनाथ गुफा की यात्रा कर वापस कैंप लौट सकते हैं।

 

अमरनाथ यात्रा के दौरान इन बातों का ध्यान रखें


- मौसम अचानक से बदल सकता है इसलिए विंडचीटर, रेनकोट, वाटरप्रूफ ट्रेकिंग कोट, टॉर्च, मंकी कैप, ग्लव्स, जैकेट, ऊनी जुराब, वाटरप्रूफ पायजामा वगैरह अपने साथ रखें। 

- अपने पास पर्याप्त कपड़े तो रखे ही साथ ही एक सिर पर इलास्टिक से फंसाने वाली छोटी छतरी भी रखें। 

- साड़ी में पैदल यात्रा करना मुश्किल होता है महिलाएं सलवार-सूट, ट्रैक सूट या कुछ कंफर्टेबल कपड़े पहनें। 

- रास्ते में खाने के लिए बिस्किट, नमकीन, चिप्स और कुछ स्नैक्स वगैरह जरूर रखें। पानी का इंतजाम भी रखें। 

- अमरनाथ श्राइन बोर्ड के द्वारा बताए गए सभी नियम कायदों का कड़ाई से पालन करें। 

- अपने साथ इमरजेंसी के लिए कुछ पेन किलर या बुखार की दवा भी रखें। 

कैसे पहुंचे पहलगाम 
सड़क मार्ग- अमरनाथ गुफा का पर्वतीय और दुर्गम स्थान पर है। यहां देश के दूसरे हिस्सों से सीधे सड़क की सुविधा नहीं है। सड़क के रास्ते अमरनाथ पहुंचने के लिए पहले जम्मू तक जाना होगा फिर जम्मू से श्रीनगर तक का सफर करना होगा। श्रीनगर से आप पहलगाम या बालटाल पहुंच सकते हैं। इन दो स्थानों से ही पवित्र यात्रा की शुरुआत होती है। श्रीनगर से पहलगाम करीब 92 किलोमीटर और बालटाल करीब 93 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा आप बस या टैक्सी सेवाओ के जरिए भी पहलगाम पहुंच सकते हैं। दिल्ली से नियमित तौर पर बस सेवा अमरनाथ तक उपलब्ध रहती है। इसके अलावा दिल्ली से अमरनाथ 631 किलोमीटर और बेंगलुरु से 2370 किलोमीटर दूर है। 

हवाई मार्ग- पहलगाम से अमरनाथ की पैदल चढ़ाई शुरु होती है और पहलगाम से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट श्रीनगर में है जो करीब 90 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा जम्मू एयरपोर्ट भी दूसरा विकल्प है जो करीब 263 किलोमीटर दूर है। श्रीनगर ओर जम्मू एयरपोर्ट देश के लगभग सभी बड़े शहरों से जुड़े हुए हैं। दिल्ली से श्रीनगर के बीच फ्लाइट करीब 1.35 मिनट का समय लेती है वहीं मुंबई से श्रीनगर फ्लाइट करीब 3 घंटे और बेंगलुरू से 4.40 घंटे लगते हैं। श्रीनगर से आप टैक्सी या बस के द्वारा पहलगाम जा सकते हैं। जम्मू से सड़क मार्ग से पहलगाम पहुंचने में करीब 12-15 घंटे लगते हैं। श्रीनगर से आप बस के द्वारा पहलगाम तक जा सकते हैं जिसमें करीब 2.40 घंटे लगते हैं। इसके अलावा आप टैक्सी से भी पहलगाम पहुंच सकते हैं इसमें करीब 2 घंटे लगते हैं। 

रेल मार्ग- पहलगाम से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन उधमपुर है जो करीब 217 किलोमीटर दूर है। लेकिन जम्मू रेलवे स्टेशन, उधमपुर की तुलना में ज्यादा अच्छी तरह से पूरे देश से जुड़ा है। जम्मू रेलवे स्टेशन का नाम जम्मू तवी है यहां से देश के करीब सभी बड़े शहरों के लिए ट्रेन चलती है। 



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