शुक्रवार, 15 दिसम्बर 2017 | 08:03 IST
दूसरों की बुराई देखना और सुनना ही बुरा बनने की शुरुआत है।
दूसरे चरण में करीब 68-70 प्रतिशत मतदान रहा।           दूसरे चरण में 93 सीटों के चुनावों के लिए वोट डाले गये।          गुजरात के दूसरे चरण के चुनावों का इंतजार खत्म हुआ।          मुंबई महानगरपालिका के वार्ड नंबर 21 में उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की।          गुजरात विधानसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी ने गांधीनगर में वोट डाला।          पीएम मोदी ने देश को किया समर्पित: पनडुब्बी आईएनएस कलवरी           स्कॉर्पियन सीरीज की पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवरी आज भारतीय नौसेना में शामिल।          गुजरात के साबरमती में वोटिंग के लिए पहुंचे पीएम मोदी।          18 दिसंबर को होगा फैसला: भाजपा या कांग्रेस          विराट कोहली और अनुष्का का दिल्ली में 21 दिसंबर और मुंबई में 26 दिसंबर को इंतजार।          अध्यक्ष पद के लिए राहुल गांधी निर्विरोध चुने गए।          कांग्रेस अध्यक्ष पद के दिए 16 दिसंबर का इंतजार ।         
होम | साहित्य | बुद्ध की वापसी: मैनपाट

बुद्ध की वापसी: मैनपाट


 

डॉ. हरिसुमन बिष्ट (वरिष्ठ कथाकार)

मैनपाट की यात्रा सिर्फ आंख और मन की भूख, तृष्णा मिटाने भर की नहीं है, यहां प्रकृति से संगीत फूटता है, जिसके स्वर सघन वन में गुंजते हैं। यह प्रकृति के उस रहस्यात्मक एवं अद्भुत व्यक्त वैभव को अनुभव करने की यात्रा है। 
पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व में आने के साथ ही यात्रा आरम्भ हुई, जो कि आज तक निर्वाध गति से चल रही है। हर जीव अपने स्तर पर अपनी तरह की यात्रा करता है। यात्रा का उद्देश्य सिर्फ स्थान परिवर्तन करना भर नहीं रहा। प्रयोजन से की गयी यात्रा की भांति निष्प्रयोजन की गयी यात्रा भी जीवन के विकास एवं विस्तार से जुड़ती चली आयी है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ और ‘अहं राष्ट्री सड.गमनी वसूनाम्‘ जैसे सूत्र वाक्य इसी यात्रा के प्रतिफल हैं। जब भी ऐसे वाक्य पढ़ने और सुनने को मिलते हैं, मन में यात्रा को लेकर भाव संचरण की गति तेज हो जाती है और निष्प्रयोजन यात्रा के लिए उत्सुकता बढ़ जाती है। 
मैनपाट की यात्रा निष्प्रयोजन नहीं है। यह नाम मेरे लिए अस्तित्व में नहीं था, ऐसा कहना उचित नहीं। यात्रा के दौरान मैंने यह स्थान ढूंढ निकाला हो‘ ऐसा भी नहीं है। कोलम्बस की नई दुनिया की खोज और वास्को डी गामा के भारत के सुमुद्री मार्ग की खोज की भंाति जैसी यात्रा हो‘ ऐसा भी नहीं है। आज दुनिया का कोई भी कोना अछूता नहीं, जहां इन्सान ने अपने पांव नहीं जमाएं हों। जल-थल और नभ को जानने-समझने के लिए कल्पना की उड़ान ने दुनिया की रोमांचकारी एवं रहस्यपूर्ण यात्रा के दरवाजे खोेल दिये हैं। सोसल मीडिया ने तो हर तरह की यात्रा को बहुत सुगम बना दिया है।
मैन पाट की यात्रा आरम्भ करने से पूर्व मैंने सर्च इंजन खोले और फेसबुक, गूगल अर्थ जैसे माध्यमों से जानकारी प्राप्त की। दिल्ली से रायपुर पहुंचने तक मैनपाट के विषय में उत्सुकता बढ़ती रही। आसमान पर उड़ते हवाई जहाज से आंखें जमीन को देखती रहीं। यह देखना सामान्य नहीं, अपनी ही तरह की शैली से निर्मित कलाकृति को देखने जैसा था। जिसे प्रकृति ने विभिन्न रंगों, बिम्बों से सजाया है। विभिन्न प्रकार की ध्वनियां और उनकी प्रतिध्वनियां जहां एक कोने से दूसरे कोने तक गूंजती हैं। प्रकृति की अद्भुत छटा के दर्शन होते रहे। किन्तु, मैनपाट को चिन्हित करना संभव नहीं था। निर्धारित समय पर हवाई यात्रा संपन्न हुई। 
मैं रायपुर पहुंच गया। आगे की दूरी के लिए अब रेल यात्रा रायपुर से अम्बिकापुर तक करनी होगी- यह सुनिश्चित था। 
अम्बिका पुर पौराणिक कथाओं में गूंजता एक सुपरिचित नाम। प्राकृतिक छटा लिए एक अद्वितीय शहर। प्रकृति के अधिक करीब लाती भारतीय रेल की यात्रा ने मनमुग्ध कर दिया। चारों तरफ दूर-दूर तक सघन हरियाली। तीन सौ किलोमीटर तक फैले शाल-सागवान वन क्षेत्र की यात्रा कब समाप्त हो गयी, पता ही नहीं चला।
अम्बिका पुर से मैनपाट सड़क मार्ग द्वारा, दरिमा होते हुए, 65 कि0 मी0 की दूरी पर है। अम्बिका पुर छतीसगढ़ राज्य का ठीक वैसा ही शहर है, जैसा देश के पर्वतीय अंचलों की यात्राओं का पहला पड़ाव, जो पर्वत और मैदान, जिसे तराई क्षेत्र भी कहते हैं, दोनों क्षेत्रों को जोड़ता है। उसी तरह की रूक-रूक कर बहती उमस भरी हवा-जो पहाड़ी क्षेत्रों की दुर्गम 
यात्रा के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है। वहां यात्री अधिक समय व्यतीत नहीं करते। वे जल्दी से जल्दी अपने गन्तव्य तक पहुँचना चाहते हैं। उन यात्रियों जैसा एक मैं भी हूं।
मैनपाट 226 वर्ग कि0 मी0 वन क्षेत्र में फैला है। जिसमें 15 पंचायत एंव 24 ग्राम समाहित हैं, जिसकी आबादी लगभग 25000 है। मांझी, मंझवार, पहाडं़ी कोरवा, उरॉव एवं कंवर जनजातियां इस पहाड़ी भूभाग में निवास करती हैं। साथ ही हरिजन, अहीर एवं सामान्य वर्ग की जातियां भी यहां रहती हैं। 
सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से छतीसगढ़ राज्य जितना समृद्ध है, उतना ही प्राकृतिक सौंदर्य से भी। राज्य का अति रमणीय क्षेत्र मैनपाट है। चारों तरफ पसरी सघन हरियाली। शाल-सागवान का बियाबान जंगल। 1099 मीटर की ऊंचाई पर स्थित 365 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला पठारी भू-भाग है। जब मैंने मैनपाट की यात्रा की चर्चा अपनी बेटी से की थी तो, वह संभवतः किसी एक स्थान को चिन्हित नहीं कर पायी होगी। मैंने जब भी उससे पूछा था वह खामोश रही। उसने इस भू-भाग को कभी सर्च इंजन पर न देखा हो, कभी पुस्तकालय से लायी पुस्तकों में न पढ़ा हो, ऐसा सम्भव नहीं। आज यदि मुझसे वह पूछे कि मैनपाट कहां स्थित है ता,े मैं भी उसे नहीं बता सकता। क्योंकि मैनपाट कथा-कहानी एवं दंत कथा जैसी कहने-सुनाने की विधा नहीं है। यह पूरी तरह से देखने और अनुभव करने का स्थान है। जिससे सौंदर्य कीे अनुभूति की जा सकती है।
मैंने मैनपाट नाम को इस पठारी भाग के कई संदर्भांे से जोड़ने का प्रयास किया है। प्रयास असफल रहा। अब चिढ़ सी हो रही है। मैनपाट के अस्तिव के विषय में बीसियों संकाएं होने लगी हैं। एक सिरा हाथ लगता है तो उसी क्षण उम्मीद की डोर छूट जाती है। अजीब तरह की ऊब और बेचैनी। दूर-दूर तक नजर दौड़ाता हूं-कोई इंसान दीखता तो उससे आधी हकीकत आधा फसाना के अंदाज में जानकारी लेकर कोई जोड़ बिठाता। परन्त,ु यहां ऐसी किसी तरह की कोई गुंजाईश ही नहीं। कोई सुनने-कहने वाला भी नहीं। स्थानीय कैंप आफिस से दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर, रात के समय एक दीया जलता हुआ दिखा था। दीए की रोशनी में कोई हलचल नहीं। फिर भी, यह मानकर मन को समझाया बुझाया और मजबूत किया कि दीया तो इन्सानों की बस्ती में घर के आले में ही जलता है। 
मेरे कदम उस रोशनी को पकड़ने के लिये बढ़ने लगे। घनघोर काली अंधेरी रात में, मैं कदम बढ़ाने लगा। तारों भरे आसमान से बरसते उजाले में मैं अपनी छाया ढूढंने लगा -मेरी छाया ही मुझे दिखने लगी।
यह घर गोदना अहीर का है। वह यहां रहता है, अपने परिवार के साथ। उसके दादा-पडदादा चरवाहे थे। तीन सौ साल पहले यहां मवेशियां के साथ चले आये थे। यहां की हवा-पानी में इस तरह रच बस गये कि उनकी उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ लौटने की इच्छा ही नहीं हुई थी। वे लोग लौट नहीं पाये थे। सचमुच मैनपाट है ही ऐसा, जो भी एक बार यहां आता है- फिर लौटने को उसका मन नहीं करता। परन्तु, मेरे साथ ऐसा नहीं है- मेरी सप्रयोजन यात्रा में लौटने का समय निर्धारित है। मैं गोदना अहीर से, उसके जीवन पाठ से 
मैन पाट का संदर्भ जोड़ने का उपक्रम करने लगा। गोदना मेरी बात को समझ नहीं रहा है। उसकी बेटी किरन अहीर टिमटिमाती दीए की रोशनी में मेरा चेहरा देखने का प्रयास कर रही है। अब वह मुस्करा रही है जैसे उसने मेरे चेहरे को पढ़ लिया हो। वह मेरी उत्सुकता को समझ रही है। उसने घर के बरामदे में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही, बड़ी शिला पर बनी ओखल से मूसल को हटाते हुए बताया कि मैनपाट का मतलब उसे नहीं मालूम। परन्तु, उसकी मां बताती थी कि चेहरे पर निकले कील-मुहंासे पर यहां की मिट्टी का लेप दवा का काम करता है-‘‘
बस इतना भर किरन ने बताया। मेरी नजर आंगन में खुदी मिट्टी की तरफ चली गयी। गौर से देखा और उसे चुटकी भर उठाया- वह मेरे शहर की मिट्टी से अधिक भुरभुरी और सौंधी महक से लवरेज लगी। मुझे याद आया, मेरी बेटी जब किरन की उम्र की रही होगी, उसने भी एक दिन बाजार से ऐसी ही मिट्टी लाने को कहा था। मैं अपनी बेटी की बात को टाल नहीं सका। मैं उसे खुश और सुन्दर देखना चाहता था-उसके लिए बाजार से मिट्टी खरीदने चला गया। उस दिन मुझे लगा था, बेटी हुकम नहीं देती है- वह अधिकार जताती है। मैं उसकी छोटी-सी मांग पर अपनी बड़ी खुशी ढूंढ़ने लगा था। किरन को वह अधिकार प्राप्त करने का अवसर कहां से मिलता होगा वह आदिवासी है। हमारे बाजार और मैनपाट की धरती की मिट्टी में बहुत अन्तर है। मुझे लगा, सचमुच बाजार की यही तो ताकत है-जो गांव की मिट्टी को भी सोने में बदल देती है। अपने मन को समझाया- मैंने जीवन के इस पाठ े को मैनपाट के संदर्भ से जोड़ा यही संतोष मेरे लिए काफी है। 
मैन पाट कोई नया नाम नहीं, जीवन संदर्भ से जुड़ा यह नाम हो सकता है गोदना अहीर का मौन भी यही जताता है। किरन में प्रकृति का सौंदर्य भरा है। वह हमेशा ताजा हवा में सांस लेती है। वह शहर और देहात की ताजा और बासी-बदबूदार हवा में फर्क समझती है। वह समझ रही है, असमय उसके आंगन में कोई आया है। उसने मूसल और ओखल के संबंध को जान लिया है-वह मूसल उठाये हाथ को रोक लेगी तो अतिथि को भरपेट भोजन नहीं करा पायेगी-गोदना अहीर ने उसे ऐसा ही संस्कार दिया है। गोदना भी इसी उम्मीद से उसके हाथों को देख रहा है। मैं उसकी छोटी सी खुशी को चेहरे पर पढ़ने लगा हूं। मैं उसके अतिथेय और उसकी बेटी के चेहरे को अपनी बेटी से जोड़ने लगा कि उस दिन बेटी बहुत खुश हुई थी। उस खुशी को मैं यहां बैठकर आज भी, उस दिन की भांति, महसूस कर रहा हूं। सोच रहा हूं-इन्सान की छोटी-छोटी खुशियां कैसे बड़ी खुशी में बदल जाती हैं। मैं उसी बड़ी खुशी को अनुभव कर रहा हूं। वह छोटी-सी खुशी देने वाली मुलायम चिकनी मिट्टी का एक प्रायवाची नाम मैनपाट भी तो हो सकता है। 
मैनपाट के नाम की वास्तविकता को ठीक-ठाक जानने के लिए मुझे नर्मदापुर जाना पडे़गा। जो सरगुजा जिला मुख्यालय से 65 कि0 मी0 दूरी पर स्थित है। सरगुजा अंचल में आदिकाल से अनेक संस्कृतियों का प्रार्दुभाव एवं उनकी विकास यात्रा का वृतांन मिलता है। परन्तु, मेरे लिए सरगुजा मुख्यालय पहुंचना आसान नहीं। वर्ष 1962-63 में चीन युद्ध के पश्चात सरकार द्वारा बसाये गये तिब्बती शरणार्थियां को सात कैंपों के विषय में जानना मेरे लिए आवश्यक और अनिवार्य है। उससे अधिक सुविधा जनक भी। जो शरणार्थी यहां की हवा-पानी और मिट्टी में रच बस गये हैं, वे अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखने की भावना के भरसक प्रयास के बाद भी मैनपाट की संस्कृति एवं जीवन शैली में अपनत्व अनुभव करते हैं।
तिब्बती संस्कारों में पले बढे़ इन मैनपाट वासियों में अपनी पंरपरा, धार्मिकता और बौद्ध संस्कृति की उपासना की झलक प्रयाप्त रूप में देखने को मिलती है। यहां मैं भगवान बुद्ध की मूर्ति के सामने खड़ा हूं। मूर्ति ध्यानावस्था की मुद्रा में है। बुद्ध का पूरा तन-बदन सुनहरे रंग में रंगा है। वही शान्ति, सौम्य आकृति, असीम वेदनाओं को सहती हुर्इ्र, मेरी उपस्थिति से जरा भी विचलित हुए वगैर भगवान साक्षात् रूप में पूछ रहे हैं- देख आए मैन पाट वत्स! कैसे छिन्न-भिन्न कर दिया था दिगभ्रमित युवाओं ने यहां का जीवन।‘‘
मैं बुद्ध के मौन को अपने भीतर अंगीकार कर लेता हूं। बुद्ध का मौन प्रश्न गलत नहीं- प्रासंगिक है। उनका प्रश्न करना स्वाभाविक है। एक दौर वह भी था जब यहां गोलियां और हथगोलों की आवाज गूंजती थी। अब वह भयावह शोर थम गया। कहीं भी, दूर-दूर से आती बारूदी गंद का लेश भी नहीं है।एक बात यह जरूर है- भले ही बंदूकों से निकलती गोलियों की आवाज थम गयी है-किन्तु, बांसुरी का स्वर, कोयल की कुहूक अभी नहीं लौटी -उसे लौटने में समय तो लगेगा ही। सालवानों का यह द्वीप आज शान्त और कलान्त है, सन-सन बहती हवा में रह-रहकर संगीत के स्वर लौटने लगे हैं। चीख-चिल्लाहट और सिसकियों की गूंज अब यहां सुनायी नहीं देती है। इसीलिए बुद्ध अपनी साधना मैं लौट गये हैं।
मन को तसल्ली होने लगी कि बुद्ध मैनपाट के बौद्ध मठ में लौट आये हैं। इस मंदिर की प्रमुख दर्शनीय स्थलों में गणना होने लगी है। इस क्षेत्र में सरगुजा के वन जीवन एवं सादगीपूर्ण आदिवासी संस्कृति के लोग और बौद्ध धर्म के अनुयायी, तिब्बती संस्कृति का एक मिला-जुला स्वरूप, यहां देखने को मिल रहा है। यह क्षेत्र प्राकृति सौंदर्य का ही नहीं, दो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के बीच समानता, समरसता का अद्भुत् पाठ भी पढ़ाने लगा है।
प्रकृति के अद्वितीय सौंदर्य के बीच कल-कल, छल-छल करते जलप्रपात और अपने वेग से बहती नदियां बुद्ध की साधना को भंग नहीं करतीं। शान्त प्रवाह से महादेव मुडा नदी ने यहां आने वाले पर्यटकों को मंत्रमुग्ध सा कर दिया है। महादेव मुडा वन क्षेत्र में 60 मीटर की ऊंचाई से गिरते जलप्रपात में ‘‘बुद्ध शरण्ंा गच्छामि‘ का उच्चारण सुनने को मिलने लगा है। पर्यटक इस जल प्रपात के किनारे घण्टों मौन बैठकर जीवनानुभूति करते हैं। विभिन्न जातियों, रंगों की छोटी-बड़ी मछलियां यहां जीवन में एकरूपता और समरता का नैतिकता पाठ पढ़ाती हैं। इसीलिए यहां से गुजरती हुई जलधारा का नाम ही मछली नदी पड़ा है। नदी में बने जल प्रपात की ऊंचाई 48 मीटर है। जिससे गिरता पानी दूधिया और झागदार है। आकाश गंगा अब आसमान में ही नहीं बहती, वह सरगूजा के इस संघन वन क्षेत्र में पूर्ण बेग से बहने को उतर आयी है- सचमुच पृथ्वी में कहीं और एक स्वर्ग है तो वह यहीं है, इसी सरगुजा के पठारी भूभाग में, जहां 80 मीटर की ऊंचाई से गिरते एक और जल प्रपात को ‘मिल्की-वे‘ का नाम दे दिया है।
विंहगम प्राकृतिक दृश्यों से ओत-प्रोत मैनपाट में मेरे लिए एक सुखद संयोग और निष्प्रयोजन आरम्भ की गयी यात्रा का प्रयोजन स्वतः सिद्ध होने लगा है। बंदर कोट की ऊंची दुर्गम पहाड़ी, प्राकृतिक गुफा रक्सामाडा, जनजातियों का आस्था केंद्र दुल्हा-दुल्हन पर्वत, श्याम धुनधुट्टा के बांध और रामगढ़ पर्वत माला दृष्टिगोचर होने के साथ-साथ मेहता प्वाइंट, टाइगर प्वाइंट, परपटिया नान दमाली टेऊकिंग, टेऊल के अलावा कई एडवैंचर जोन भी हैं। घने जंगल के बीच चित्ताकर्ष एक पयर्टन स्थल का आनन्द लिए बगैर यहां की यात्रा का प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। यहां एक प्राकृतिक झील है, जो आगे चलकर खूबसूरत जल धारा का रूप ले लेती है। इसका नयना भिराम सौंदर्य और कल-कल छलछल के निनाद से इसे देव प्रवाह नाम दिया गया है। इसी का लोक प्रचलित नाम ‘जलजली‘ हर पर्यटक को आमंत्रित करता है-हर किसी की कोशिश रहती है-वह प्रकृति के इस रचाव को अपनी तरह से अनुभव करे और मधुर स्मृतियों को अपने मन मस्तिष्क में समेट कर ले जाए। इन्सान की छोटी-छोटी क्रीड़ाओं से भी यदि धरती का यह अति संवेदनशील भू-भाग उछलती-कूदती और मचलती प्रतीत होती है-तो यह भी दुनिया के आर्श्चयों में से एक और आश्चर्य की गणना में वृद्धि करता ही है। बहुत कुछ है मैनपाट में जीवन के रंग देखने-सुनने और अनुभव करने को वशर्ते यहां पहंुचने के लिए समय, संयम और मन में दृढ़ निश्चय हो।



© 2016 All Rights Reserved.
Follow US On: