शुक्रवार, 27 अप्रैल 2018 | 12:07 IST
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सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं क्यों नासूर बनकर दे रही हैं जख़्म


राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओँ के सारे दावे तब खोखले साबित हो जाते हैं जब इस तरह के आकंड़े सामने आते है जिसमें करोड़ों का बजट खर्च होने के बाद भी शिशु मृत्यु दर में कमी नहीं आ रही है, डिलीवरी के लिए अस्पताल आने वाली महिलाओं की संख्या में भी इजाफा न के बराबर है और न ही जागरूकता के लिहाज से स्थिति बेहतर दिख रही है। हां कुछ विभागों में जरूर सुधार हुआ है, लेकिन इतना काफी नहीं है।

 


आपको बता दें, स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर भले ही बड़ी संख्या में अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना की गई है, लेकिन डॉक्टरों के अभाव में ये स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ दिखावे भर के हैं, वहीं प्रदेश में सबसे बड़ी समस्या है विशेषज्ञ डॉक्टरों की। इस समय स्थिति ऐसी है कि प्रदेश में हृदय रोग, न्यूरो, मनोरोग आदि के कुछ गिने-चुने ही डॉक्टर है, यही नहीं पैरामेडिकल स्टाफ की स्थिति भी कुछ खास नहीं है। सरकारी हेल्थ सिस्टम में नर्सिंग स्टाफ की भी भारी कमी है। प्रदेश में इसी तरह की लचर स्वास्थ्य सेवा और जागरूकता का अभाव होने के कारण नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। यही कारण है कि आए दिन नवजात बच्चे मां की कोख में या जन्म लेते ही काल का ग्रास बन रहे हैं। 

 


बता दें, उत्तराखंड में सबसे बुरा हाल पर्वतीय क्षेत्रों का है इसके मुकाबले शहरी क्षेत्रों का हालात कुछ ठीक हैं। यही कारण है कि पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों को देहरादून और अन्य शहरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। प्रदेश के सबसे बड़े अस्पतालों में शुमार दून महिला अस्पताल में निक्कू वार्ड से लेकर तमाम अन्य इंतजाम धराशायी हो चुके हैं। हाल ये कि अभी कुछ दिन पहले सिर्फ वेंटिलेटर न मिलने के कारण एक गर्भवती महिला की जान चली गई थी। यही कारण है कि यह कहना पड़ता है कि पिछले 17 साल में तमाम सरकारें स्वास्थ्य के मोर्चे पर फेल साबित हुई हैं। हालात सुधारने के नाम पर बस पीपीपी मोड को लेकर भागमभाग दिखाई देती है।

 



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