सोमवार, 23 अक्टूबर 2017 | 10:37 IST
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आखिर क्यों पसंद है माँ को उल्लू की सवारी ?


माँ लक्ष्मी संपन्नता और धनधान्य की प्रतीक हैं जिन्हें सभी देवी देवताओँ में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। क्या आप जानते हैं कि उनका प्रिय वाहन उल्लू है? अब विचार करने वाली बात ये है कि संपन्नता और ऐश्वर्य की देवी ने एक ऐसे पक्षी को अपना वाहन क्यों चुना, जिसे विपत्ति,गरीबी और नाश का प्रतीक ठहराया जाता है। क्यों माँ लक्ष्मी अभाव के इस प्रतीक पर विराजमान हुईं?

 

असल में उल्लू के बारे में बनाई गई यह धारणा बिल्कुल गलत है। इस पक्षी को धार्मिक ग्रंथों में भी विशेष स्थान दिया गया है। इसलिए नहीं कि यह माँ लक्ष्मी का वाहन है, बल्कि इसलिए क्योंकि उल्लू को धर्मग्रंथों में मूर्ख नहीं माना जाता, और अत्यंत चतुर कहा गया है। चीनी वास्तुशास्त्र फेंगशुई में तो इस अपशगुन माने जाने वाले पक्षी को सौभाग्य और सुरक्षा का पर्याय माना जाता है।

 

 

उल्लू दिन में देख नहीं सकता जिसके कारण इसको निशाचर कहा जाता है। लेकिन अपने इसी गुण के कारण न सिर्फ ये रात में देख सकता है बल्कि अपने शिकार पर नजर भी रख सकता है। ऋषियों ने गहन अवलोकन और सूझबूझ के बाद ही लक्ष्मी को उलूकवाहिनी कहा है।

 

 

महालक्ष्मी मुख्य रूप से शुक्र ग्रह की अधिष्टात्री देवी है। कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार शुक्र को धन वैभव का देवता माना जाता है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार लक्ष्मी जी समुद्र से प्रकट हुईं और भगवान विष्णु की सेवा में लग गईं। इनका स्वभाव चंचल माना गया है जिस कारण इनके उपयोग व आराधना में बेहद सावधानी की जरूरत पड़ती है। उल्लू, जो स्वभाव से अज्ञान का प्रतीक है- कहने का अर्थ है कि यदि लक्ष्मी का उपयोग अज्ञान के साथ होगा तो वह केवल भोग और नाश तक ही सीमित रह जायेगा। यदि सूझबूझ के साथ होगा तो दान, परोपकार की दिशा में लगेगा। 



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