शुक्रवार, 15 दिसम्बर 2017 | 01:57 IST
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कलाप्रेमी कंस क्यों बन गया था क्रूर, दिल्ली में मंचित नाटक ने दिया जवाब


सुनील कुमार

दिल्ली में 4 जुलाई को गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा, तथास्तु एवं प्रिज्म थियेटर ने दिल्ली के श्रीराम सेंटर में महाभारत की महागाथा के नायकों में एक महाराज कंस की मानवीय संवेदनाओं पर आधारित नाटक 'कंस' का सफल मंचन किया। मंच पर महाराज कंस की भूमिका में जाने-माने कलाकार महेंद्र मेवाती ने अपने अभिनय और संवाद अदायगी से सभागार में उपस्थित दर्शकों को स्तब्ध कर दिया।

युवा निर्देशक अरविंद सिंह के निर्देशन में मंचित हुए इस नाटक की परिकल्पना खुद महेंद्र मेवाती ने की थी। इस नाटक के लेखक दया प्रकाश सिन्हा का कहना है कि कंस की भूमिका को जिस प्रकार से महेंद्र मेवाती ने जीवंत किया है, शायद यह काम उनसे बेहतर कोई और नहीं कर सकता था। कला, साहित्य और रंगमंच के प्रति बालक कंस का सम्मोहन और उसके पिता की इच्छाओं के बीच उसमें आसुरी प्रवृतियों के प्रभाव के बीच आवाजाही का मंचन आसान नहीं था।

इस नाटक के माध्यम से निर्देशक ने यह दिखाया है कि कंस वास्तव में बचपन से क्रूर नहीं था, बल्कि वह सहृदय कलाप्रेमी और संवेदनाओं से भरा हुआ था। लेकिन, अपनी रुचियों, आसक्तियों और कलाप्रेम के कारण वह अपने पिता से तिरस्कार झेलता है और परिणामस्वरूप अपनी संवेदनाओं की हत्या कर क्रूर कंस बन जाता है। प्रेमी कंस और हत्यारे कंस के बीच की इस भूमिका को महेंद्र मेवाती ने जिस तरीके से निभाया, उसका नतीज़ा था कि दर्शकों ने उन्हें अंत में पूरे हॉल को तालियों की आवाज से गुंजायमान कर दिया। महेंद्र मेवाती के साथ-साथ इस नाटक के मंचन में प्रकाश और संगीत का प्रभाव जबर्दस्त तरीके से दिखा। रंगमंचीय प्रकाश में यह नाटक अत्यंत प्रभावशाली दिखता है। इस नाटक की संगीत परिकल्पना मुकेश झा ने की थी।



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