मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018 | 11:31 IST
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आखिर क्यों 32 लाख लोगों नें छोड़ी देवभूमि


देवभूमि कहें जाने वाला उत्तराखंड वैसे तो अपनी सुंदरता और संस्कृति के लिऐ फेमस है लेकिन क्या आपको पता है कि उत्तराखंड में कुछ ऐसे गांव भी हैं, जहां अब कोई नही रहता। वहां के लोग पलायन करके कहीं और चले गए हैं। ऐसी ही सच्चाई उत्तराखंड के पौड़ी जिले के कल्जीखाल विकासखंड स्थित बलूनी गांव में बीते दस साल से अकेले रह रहे 66 वर्षीय पूर्व सैनिक श्यामा प्रसाद ने बताई है, जिसके बाद इस खबर ने उत्तराखंड के विकास की कड़वी हकीकत को एक बार फिर लोगों के सामने लाकर रख दिया है।

 


बता दें, ग्राम पंचायत के अनुसार इस गांव में पहले 45 परिवार रहते थे, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में सभी लोग धीरे-धीरे शहरों का पलायन कर गए। बलूनी गांव के लोगों को इलाज के लिए भी 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था, जहां जाने के लिए न कोई सड़क थी। एक आंकड़े के अनुसार, उत्तराखंड में 3,000 गांव तो ऐसे है जहां कोई भी नहीं रहता। सरकार भी मानती है कि राज्य गठन से अब तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार 70 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो चुकी है।

 


वहीं पलायन की तीव्र रफ्तार का अंदाजा इसी से लगाया जा रहा है कि आज कई पहाड़ी गांवों में मतदाता ही नहीं हैं। कुमाऊं के चंपावत जिले के 37 गांवों में कोई युवा वोटर ही नहीं है। वहां सारे वोटर 60 साल की उम्र पार कर चुके हैं। वहां पर बुजुर्गों की आबादी भी गिनती की बची है। अनुमान है कि पिछले 17 वर्षों में करीब 32 लाख लोगों ने अपना मूल निवास छोड़ा है। युवा वोटरों की कमी से जूझ रहे गांवों के मुकाबले शहरों में युवा वोटरों की संख्या लगातार बढ़ी है। 

 



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