बुधवार, 19 जून 2019 | 12:41 IST
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जिन्होंने खुद को जलाकर हमारे भविष्य को प्रकाशित किया हम भूल गये, उस उत्तराखंड के गांधी को


जिन्होंने खुद को जलाकर हमारे भविष्य को प्रकाशित किया हम भूल गये, उस उत्तराखंड के गांधी को 

श्रवण सेमवाल

उत्तराखण्ड को अलग राज्य का दर्जा देने ओर उत्तराखंड की हर पीड़ा समझने के पीछे उत्तराखंड के गांधी इंन्द्रमणी बडोनी का गांधी अहम योगदान रहा है। आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो का नारा देने वाले और उस नारे पर सतत चलने वाले पहाड़ की तरह अडिग रहने वाले उत्तराखंड के गांधी का आज जन्मदिन है। आज ही के दिन यानी 24  दिसंबर 1925 को टिहरी जिले के अखोड़ी,पट्टी-ग्यारह गांव, को माँ श्रीमती कल्दी देवी पिताजी-श्री सुरेशानंद  जी के घर में पहाड़ के गांधी ने जन्म लिया। बड़ोनी जी का जीवन बहुत ही परेशानियों से गुजरा है। पिता का साया बेटे से तभी उठ गया था जब वह कक्षा चार में पढ़ते थे। परिवार की जिम्मेदारी के साथ ही अपनी पढ़ाई को भी  बडोनी जी ने जारी रखा। बडोनी जी प्रारम्भिक शिक्षा टिहरी के प्रताप इंटर कालेज में पूरी हुई। इंन्दरमणी जी ने उच्च शिक्षा देहरादून और मसूरी से बहुत कठिनाइयों के बीच पूरी की। साथ ही बड़ोनी जी ने अपने दो  छोटे भाई महीधर प्रसाद और मेधनीधर को उच्च शिक्षा दिलाई । बड़ोनी जी ने गांव में ही अपने सामाजिक जीवन को विस्तार देना प्रारम्भ किया जगह जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम कराये, वीर भड़ माधो सिंह भंडारी नृत्य नाटिका और रामलीला का मंचन कई गांवों और प्रदर्शनियों में किया। माना जाता है कि वह बहुत अच्छे अभिनेता ,निर्देशक,लेखक,गीतकार,गायक ,हारमोनियम और तबले के जानकार और नृतक भी थे।  संगीत की शिक्षा उन्होने श्री जबर सिंह नेगी से सीखी थी। वह बॉलीवाल के कुशल खिलाड़ी भी माने जाते है। समाज सेवा की जीवन ज्योति उनके अंदर पहले ही थी। उन्होने जगह-जगह स्कूल खोले। स्थानीय कलाकारों के एक दल को लेकर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रमों में 1956 में केदार नृत्य प्रस्तुत कर अपनी लोक कला को बड़े मंच पर लाये। 1956  में वह जखोली विकास खण्ड के प्रमुख बने। उससे पहले वह गांव के प्रधान थे। 1967  में वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुचे। 1969 को अखिल भारतीय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में दूसरी बार विधायक बने। 1974  में बड़ोनी जी गोविन्द प्रसाद गैरोला से चुनाव हारे। 1977  में तीसरी बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित होकर लखनऊ विधानसभा में पहुचे 1989  में बडोनी जी ब्रह्म दत्त जी से फिर चुनाव हारे। 1979  से ही पृथक उत्तराखंड राज्य के लिए वे सक्रिय रहे। बडोनी जी पर्वतीय विकास परिषद के उपाध्यक्ष रहे भी रहै। 1994 पौड़ी में उन्होंने पृथक उत्तराखंड राज के लिये आमरण अनशन शुरू किया। जिसके लिए सरकार द्वारा उन्हें मुज्जफरनगर जेल में डाल दिया गया, उसके बाद 2  सितम्बर और 2  अक्टूबर का काला इतिहास में घटित हुआ। उत्तराखंड आंदोलन में कई मोड़ आये पूरे आंदोलन में वे केंद्रीय भूमिका में रहे। बहुत ज्यादा धड़ो और खेमों में बंटे आंदोलनकारियों का उन्होंने सफलतापूर्वक नेतृत्व किया एक अहिंसक आंदोलन में उमड़े जन सैलाब की उनकी प्रति अटूट आस्था ,करिश्माई पर सहज -सरल व्यक्तित्व के कारण वाशिंटन पोस्ट ने उन्हें "पर्वतीय गाँधी" की संज्ञा दी। उत्तराखंड के गाधी का निधन 18  अगस्त 1999 को  विठल आश्रम ऋषिकेश में हुआ। राजनीति की इस उठा पटक में हम आज ऐसे महापुरूष को भूल गये जिन्होंने खुद को जलाकार पूरे उत्तराखंड को प्रकाशित किया। 



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