रविवार, 25 जून 2017 | 05:44 IST
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आजाद भारत में उत्तराखंड के गांवो की यह कैसी दुर्दशा !


आजाद भारत में उत्तराखंड के गांवो की यह कैसी दुर्दशा !

श्रवण सेमवाल 

भारत को आज़ाद हुए भले ही 70 वर्ष बीत चुके हो।  लेकिन आजादी के बाद आज भी बहुत से ऐसे वन ग्राम है जो राजस्व ग्राम में तब्दील होने के लिए सरकार से लड़ाई लड़ रहे है। देश में आज भी ऐसे गांव है जो अपनी मूलभूत सुविधा को पाने के लिए लालायित है लेकिन यह सुविधाओ के नाम पर वह सिर्फ सपने ही देख रहे है लेकिन यह सपने शायद ही उनके पूरे हो पाये। उत्तराखण्ड प्रदेश के रामनगर विधान सभा के अंतर्गत भी दो दर्जन वनग्राम ऐसे है जो आज मूलभूत सुविधाओ से परे है। आज भी वहां के लोग अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे है। इस गांव में चुनाव के समय तो सभी राजनैतिक दल आते है लेकिन जीतने के बाद कोई जनता के हाल पूछने भी नही आता । उत्तराखंड के रामनगर सभा के अंतर्गत 24 वनग्राम आते है। यह वन ग्राम आज भी सरकारी मूलभूत सुविधाओ से बहुत दूर है। यहाँ के ग्रामीण वन ग्रामो को राजस्व ग्राम बनाने के लिए संघर्ष कर रहे है। लेकिन सरकार गांववालो की भावनाओं को ही नही समझ पायी। सरकारों ने भी इनकी मजबूरी का खूब फायदा उठाया है। ग्रामीणों को सिर्फ मतदाता तक ही सीमित रखा। साल 2012 के विधान सभा चुनाव में काँग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में वनग्रामो को राजस्व ग्राम बनाने का मुद्दा शामिल किया था बावजूद इसके काँग्रेस की सरकार बनने के बाद घोषणा पत्र का यह मुद्दा गायब हो गया। सरकार की इस बेरुखी से हज़ारो ग्रामीण और उनके बच्चो के भविष्य अधर में लटके हुए है। प्रदेश मुख्या हरीश रावत  भले ही उत्तराखण्ड में विकास की बात कर रहे  हो । लेकिन आज तक उनके पास वन ग्रामो को राजस्व ग्राम बनाने की कोई ठोस रणनीति नहीं है। या फिर उनकी सोच उन ग्रामों के विकास के लिए नही है एक और जहाँ प्रदेश में भू माफिया,शराब माफिया,खनन माफिया,को सरकार ने संरक्षण देकर उनका विकास किया है। वहीं दूसरी ओर गरीब ओर लाचारी के मारे वनो में अपना जीवन काट रहे इन गरीबों की कोई खबर तक नही ले रहे है। आज़ाद देश में जहां चकाचौंध और दुनिया हाईटैक के दौर से गुजर रही है तो वही उत्तराखंड के रामनगर में यहां के ग्रामीण वनवासी बनकर रह रहै है। अब ग्रामीण ने आगामी विधान सभा चुनाव में किसी भी पार्टी को वोट ना देने का मन बना रहे है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार को जब हमारी परवाह नहीं तो वह 2017 में किसी भी राजनैतिक पार्टी को वोट नही देंगे।  यदि इस सोच ने चिंगारी पकड़ ली तो दो दर्जन गाँवों के ग्रामीणों का हज़ारो वोट ना पढ़ना किसी भी पार्टी का समीकरण बिगाड़ सकता है।           

 



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