बुधवार, 19 जून 2019 | 01:18 IST
समर्थन और विरोध केवल विचारों का होना चाहिये किसी व्यक्ति का नहीं!!
अरबपतियों के क्लब से अनिल अंबानी का नाम हटा, 3600 करोड़ रह गई कुल संपत्ति          पीएनबी घोटाले का आरोपी मेहुल चोकसी ने कोर्ट में कहा,मैं भागा नहीं, इलाज के लिए छोड़ा था देश          अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम की रत्नागिरी और खेड़ स्थित पैतृक संपत्तियों की होगी नीलामी           चीन के सिचुआन भूकंप से 11 लोगों की मौत 122 लोग घायल           कोटा से बीजेपी सांसद ओम बिड़ला होंगे लोकसभा अध्यक्ष           17वीं लोकसभा के पहले सत्र में नवनिर्वाचित सांसदों ने शपथ ली          आईसीसी विश्व कप 2019 के महामुकाबले में भारत ने पाकिस्तान को 89 रन से हराया          बिहार में चमकी बुखार से 108 बच्चों की मौत          प्रधानमंत्री मोदी का संदेश-पक्ष-विपक्ष के दायरे से ऊपर उठकर देशहित में काम करने की जरूरत          दिल्ली में सुहाना हुआ मौसम, हल्की फुहारों के साथ गर्मी से मिली राहत          चक्रवाती तूफान वायु का खतरा अभी टला नहीं है। मौसम विभाग के मुताबिक गुजरात में अगले सप्ताह एक बार फिर से चक्रवात वायु दस्तक दे सकता है          गुजरात के वडोदरा में एक होटल के नाले को साफ करने के दौरान दम घुटने से चार सफाईकर्मियों सहित सात लोगों की मौत          केजरीवाल सरकार के महिलाओं को मेट्रो में फ्री यात्रा देने के फैसले पर श्रीधरन ने एतराज जताया          दिल्ली के कई सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर ने कोलकाता के अपने हड़ताली सहयोगियों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए किया विरोध प्रदर्शन           दलालों पर रेलवे का ऑपरेशन थंडर: 387 गिरफ्तार, 50 हजार लोगों के टिकट रद्द         
होम | साहित्य | नोबेल के इतिहास में यह कैसी भूल जिसकी नहीं हो सकती भरपाई

नोबेल के इतिहास में यह कैसी भूल जिसकी नहीं हो सकती भरपाई


नोबेल पुरस्कारों की शुरूआत स्वीडन के एल्फ्रेड नोबेल के नाम पर 1895 में की गई, जिन्होंने डायनामाइट का आविष्कार किया। यह सर्वोच्च सम्मान वैश्विक स्तर पर चिकित्सा, भौतिकी, रसायन, साहित्य, शांति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले नामचीन लोगों को दिया जाता है। चर्चा यह भी रही कि यह पुरस्कार केवल जीवित लोगों को दिया जाता है। लेकिन कुछ व्यक्तियों को मरणोपरांत  दिया गया। सबसे पहले 1931 में स्वीडन कवि एरिक एक्सल कार्लफेल्ट उसके 30 साल बाद 1961 में  लिए डाग हामरशोल्ड ऐसे व्यक्ति है जिनकी मृत्यु नामांकन और पुरस्कार के बीच हुई थी।1974 में जब तीसरी बार ऐसा हुआ तो यह नियम बदल कर नया नियम बना दिया गया। 2011 में राल्फ स्टाइमन को कनाडा में चिकित्सा के क्षेत्र में यह पुरस्कार दिया जाना था लेकिन कमिटी को इस बात का अंदाजा नहीं था

कुछ लोग ऐसे लोग भी रहे जिन्हें दो-दो बार यह पुरस्कार मिल चुका है। अमेरिका के जॉन बारडेन को भौतिकी में पहली बार 1956 में ट्रांजिस्टर के आविष्कार करने पर व दूसरी बार 1972 में सुपरकंडक्टिविटी थ्योरी तैयार करने के लिए वहीं ब्रिटेन के फ्रेड्रिक सेंगर को केमिस्ट्री में एक बार 1958 में इंसुलिन की सरंचना को समझाने के लिए और दूसरी बार 1980 में केमिस्ट्री के अपने अतुल्य योगदान के लिए इसके अलावा वाल्टर गिल्बर्ट,कार्ले मूलिश आदि भी इसी लिस्ट  में शामिल है। महात्मा गाँधी के नामिनेशन से पहले ही उनकी हत्या कर दी गई। जिसका बाद में कमेटी ने खेद भी जताया।

मैडम मेरी क्यूरी  एकमात्र महिला रही जिन्हे दो बार नोबेल  मिला 1903 में रेडियोएक्टिविटी समझाने के लिए फिजिक्स में इसके कुछ सालों बाद 1911 में पोलोनियम व रेडियम की खोज के  केमिस्ट्री में मिला। वैसे देखा जाए तो सबसे ज्यादा नोबेल पाने वाले देशों में अमेरिका पहले स्थान पर है। इसके बाद क्रमशः जर्मनी, ब्रिटेन, और अंत में फ्रांस का नाम आता है। 2014 में मलाला युसूफजई नोबेल की सबसे युवा हकदार रही है।



© 2016 All Rights Reserved.
Follow US On: