शनिवार, 18 नवंबर 2017 | 11:53 IST
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एक्शन में आई उत्तराखंड सरकार, बढ़ते प्रदूषण पर उठाया ये कदम


दिल्ली के बाद बढ़ते प्रदूषण की लिस्ट में दूसरे नंबर पर उत्तराखंड की राजधानी दून का नाम है, जिस पर एक्शन में आई उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। इस फैसले के तहत सूब के 15 साल पुराने करीब पांच लाख वाहनों पर प्रतिबंध लगाने का कदम उठाया है। बता दें कि उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड लगातार बढ़ रहे वाहनों के चलते बिगड़ते प्रदूषण के स्तर को देखते हुए यह संस्तुति शासन को भेजने की तैयारी कर रहा है।

 

 

इसके अलावा बोर्ड ने पॉल्यूशन कंट्रोल रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी पीसीआरआई से हरिद्वार और देहरादून जिले की वायु गुणवत्ता का अध्ययन कराया है। इसमें दोनों जिलों के वातावरण में धूल के कणों का स्तर दो गुना होने और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे तत्वों की मात्रा बढ़ने की बात सामने आई। जानकारी के मुताबिक, उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने की कवायद पीसीआरआई की रिपोर्ट के आधार पर शुरु की जा रही है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उक्त दोनों जिलों की आबोहवा की स्थिति जानने के साथ ही इसमें सुधार के लिए एक्शन प्लान बनाने के उद्देश्य से पीसीआरआई से यह अध्ययन कराया है।

 

 

सोमवार को पीसीआरआई ने हरिद्वार जिले की ड्राफ्ट रिपोर्ट सौंप दी। वहीं, देहरादून रिपोर्ट को अंतिम स्वरूप दिया जा रहा है, जिसे 20 नवंबर को लौटाया जाएगा। वैज्ञानिकों की मानें, तो जिलों के वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भी खतरे के निशान के करीब पहुंच चुकी है, जबकि देहरादून के आईएसबीटी में धुंध की स्थिति दिल्ली जैसी और हरिद्वार जिले में भी धुंध का स्तर दो गुना हो चुका है। 

 

 

माना जा रहा है कि वक्त रहते एहतियात बरती जाए तो बढ़ते प्रदूषणपर लगाम लगाई जा सकती है। बता दें कि 15 साल पुराने वाहनों पर प्रतिबंध का फाइनल फैसला बोर्ड मीटिंग तय करेगी। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग, नगर निगम, उद्योग विभाग, ट्रैफिक पुलिस के कार्य और जिम्मेदारी से जुड़ी संस्तुति भी की जाएगी। वाहनों से जहरीली गैस का उत्सर्जन कम करने के लिए यूरो-1 से लेकर यूरो-4 मानक लागू किए गए हैं। उसी के आधार वाहन संचालित हो रहे हैं। जो पुराने वाहन हैं, उनमें जहरीली गैस का उत्सर्जन ज्यादा होता है।

 

 

पुराने वाहन रूट से हटते हैं, तो वातावरण में जहरीली गैस कम पहुुंचेंगी। वहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली में प्रदूषण में कमी लाने के लिए 10 साल पुराने डीजल वाहनों के संचालन पर रोक लगा दी थी।राज्य गठन के समय प्रदेश में वाहनों की संख्या चार लाख पांच हजार थी। इसमें तेजी से वृद्धि हुई। 17 सालों में वाहनों की संख्या करीब 25 लाख पहुंच गई है, जबकि परिवहन विभाग के पास प्रदूषण की जांच की कोई पुख्ता व्यवस्था तक नहीं है। निजी क्षेत्र के सहयोग ही काम चलाया जा रहा है।



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