बुधवार, 23 मई 2018 | 08:54 IST
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वन संपदा की तबाही से पहाडों पर मंडराये संकट के बादल


अग्निकाल की उल्टी गिनती के साथ ही वन महकमे के माथे पर पसीना छलकने लगा है। धीरे-धीरे उछाल भर रहे पारे के बीच चिंता ये सता रही कि यदि इस मर्तबा आग पांच हजार फीट से ऊपर बांज के जंगलों तक पहुंची तो यह किसी बड़े संकट से कम नहीं होगा। वजह ये कि जल संरक्षण में बांज के जंगल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जानकारों का कहना है कि बांज समेत अन्य महत्वपूर्ण वन प्रजातियां आग से महफूज रहें। इसके लिए पहाड़ की परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनानी होगी।

दरअसल राज्य में हर साल ही अग्निकाल में बड़े पैमाने वन संपदा तबाह हो जाती है। अब तो आग भी धीरे-धीरे ऊंचाई की तरफ बढ़ रही है। इसी ने चिंता बढ़ाई हुई है। अमूमून तीन-साढ़े हजार फीट की ऊंचाई तक रहने वाली जंगल की आग वर्ष 2016 में पांच हजार फीट से ऊपर बांज के जंगलों तक जा पहुंची थी। वह तो शुक्र ये कि तब बारिश होने के बाद राहत मिल मिली गई थी।

फिर इस बार तो आग ने सर्दियों से ही बेचैन करना शुरू कर दिया था। जनवरी में कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग पर छियालेख और गब्र्यांग बुग्यालों के अलावा पंचाचूली ग्लेश्यिर से लगे क्षेत्रों में हुई अग्नि दुर्घटनाएं इसे तस्दीक भी करती है।

 

 



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