शनिवार, 18 नवंबर 2017 | 11:40 IST
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उत्तराखंड के दस प्रसिद्ध मंदिर


केदारनाथ

चार धामों में सर्वाधिक ऊचांई पर स्थित धाम केदारनाथ ही है। केदारनाथ शिव के 12 ज्योर्ति लिंगों में से एक है। भारत के 4 धाम की स्थापना करने के बाद शंकराचार्य जी ने इस मंदिर का निर्माण कराया था मंदिर के पीछे शंकराचार्य जी की समाधि है। यह मंदिर कत्युरी निर्माण शैली का है। शीत काल में केदारनाथ की डोली को ओंमकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में रखी जाती है। यहां के पुजारी द. भारत के रावल होते है। यहां पर कुछ पवित्र कुण्ड है। जैसे गौरी कुण्ड, पार्वती कुण्ड, हंस कुण्ड आदि। भीमगुफा, ब्रह्म गुफा भी केदारनाथ में ही स्थित है।

 

बदरीनाथ मंदिर , जिसे बदरीनारायण मंदिर भी कहते हैं, अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बदरीनाथ को समर्पित है। यह हिन्दुओं के चार धाम में से एक धाम भी है। ऋषिकेश से यह २९४ किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है।

ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैंबदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।

 

 

 

 गंगोत्री

ये मंदिर  भी प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है और उत्तराखण्ड के चार धामों में से एक है। इस मंदिर का निमार्ण गोरखाओं के सेनापति अमरसिंह थापा ने 18वीं शताब्दी में कराया था तथा इसका पुर्नरुद्धार जयपुर के राजा माधो सिंह ने कराया। इसी मान्यता है कि राजा भगीरथ ने स्वर्गलोक से गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी। इस स्थान पर भागीरथी का एक मन्दिर है और इसी मन्दिर के मुख्य परिसर पर गंगा, लक्ष्मी, पार्वती आदि की मूर्तियाँ स्थापित है। यह मंदिर उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 99 किमी दूर है।  चारों धामों में सबसे कम ऊचांई पर धाम है

 

 

यमुनोत्री धाम

चार धामों में एक धाम है,  जो कि उत्तरकाशी जपनद में ही आता है। यमुनोत्री, जपनद मुख्यालय से 131 किमी दूर है। इस मंदिर का निर्माणक पंवार वंश के राजा प्रतताशाह ने कराया था। इस मंदिर के कपाट भी अप्रैल में खोले जाते है। मां यमुना का शीत प्रवास खरसाली गांव में है। यहीं से यमुना मां को अप्रैल महीने में यमुनोत्री ले जाया जाता है। खरसाली यमुनोत्री से मात्र 6 किमी दूर है। इस मंदिर के पा ही गर्म पानी का प्रमुख स्त्रोत सूर्यकुण्ड है।

 

नंदा देवी

नंदा देवी समूचे गढ़वाल मंडल और कुमाऊं मंडल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं। नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं। रुप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है। भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है। नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है। भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हर सिद्धी हैं। शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है। शक्ति के रुप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं।

 

पाताल भनुवनेश्वर गुफा मंदिर

 

भगवान गणेश के भक्तों के लिए उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा आस्था का अद्भुत केंद्र है. यह गुफा पहाड़ी के करीब 90 फीट अंदर है. यह उत्तराखंड के कुमाऊं में अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किमी. की दूरी तय करके पहाड़ी के बीच बसे गंगोलीहाट कस्बे में है. पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है. इस गुफाओं में चारों युगों के प्रतीक रूप में चार पत्थर स्थापित हैं. इनमें से एक पत्थर जिसे कलियुग का प्रतीक माना जाता है, वह धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है. माना जाता है कि जिस दिन यह कलियुग का प्रतीक पत्थर दीवार से टकरा जाएगा, उस दिन कलियुग का अंत हो जाएगा.स्कंदपुराण में वर्णन है कि स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी-देवता उनकी स्तुति करने यहां आते हैं. यह भी बताया गया है कि त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में आ गए थे तो उन्होंने इस गुफा के अंदर महादेव शिव सहित 33 कोटि देवताओं के साक्षात दर्शन किए थे.

 

 

हाट कालिका धाम

पूरे कुमाऊं में हाट कालिका के नाम से विख्यात गंगोलीहाट के महाकाली मंदिर की कहानी भी उसकी ख्याति के अनुरूप है। पांच हजार साल पूर्व लिखे गए स्कंद पुराण के मानसखंड में दारुकावन (गंगोलीहाट) स्थित देवी का विस्तार से वर्णन है। छठी सदी के अंत में भगवान शिव का अवतार माने जाने वाले जगत गुरु शंकराचार्य  महाराज नेकूर्मांचल (कुमाऊं) भ्रमण के दौरान हाट कालिका की पुनर्स्थापना की थी। कहा जाता है कि छठी सदी में गंगोली (गंगोलीहाट का प्राचीन नाम) क्षेत्र में असुरों का आतंक था। तब मां महाकाली ने रौद्र रूप धारण कर आसुरी शक्तियों का विनाश किया लेकिन माता का गुस्सा शांत नहीं हुआ। क्षेत्र में हाहाकार मच गया। इलाका जनविहीन होने लगा। इसी दौर में कूर्मांचल के भ्रमण पर निकले आदि गुरु शंकराचार्य महाराज ने जागेश्वर धाम पहुंचने पर गंगोली में किसी देवी का प्रकोप होने की बात सुनी। शंकराचार्य के मन में विचार आया कि देवी इस तरह का तांडव नहीं मचा सकती। यह किसी आसुरी शक्ति का काम है। लोगों को राहत दिलाने के उद्देश्य से वह गंगोलीहाट को रवाना हो गए।बताया जाता है कि जगतगुरु जब मंदिर के 20 मीटर पास में पहुंचे तो वह जड़वत हो गए। लाख चाहने के बाद भी उनके कदम आगे नहीं बढ़ पाए। शंकराचार्य को देवी शक्ति का आभास हो गया। वह देवी से क्षमा याचना करते हुए पुरातन मंदिर तक पहुंचे। इन सभी मंदिरों की क्षेत्र में ही नहीं दूर-दूर तक ख्याति है। नवरात्रियों में पूजा के लिए देशभर से भक्तजन पहुंचते हैं।

पाताल भुवनेश्वर से करीब .... किलोमीटर दूर गंगोलीहाट ज़िला मुख्यालय के पास हाट कालिका देवी का मंदिर पूरे देश में प्रसिद्ध है। इस मंदिर को लेकर उत्तराखण्ड और खासकर कुमाऊं के श्रद्धालुओं में खासी श्रद्धा है।

 

पूर्णागिरी मंदिर

पूर्णागिरि मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड प्रान्त के पिथौरागढ़ जनपद में अन्नपूर्णा शिखर पर 5500 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। यह 108 सिद्ध पीठों में से एक है। यह स्थान महाकाली की पीठ माना जाता है। कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की कन्या और शिव की अर्धांगिनी सती की नाभि का भाग यहाँ पर विष्णु चक्र से कट कर गिरा था। प्रतिवर्ष इस शक्ति पीठ की यात्रा करने आस्थावान श्रद्धालु कष्ट सहकर भी यहाँ आते हैं। मंदिर में विशेष रूप से मार्च के महीने में चैत्र नवरात्रि के दौरान देश क‌े भी इलाकों से बड़ी संख्या में यहां श्रद्धालु आते हैं। हर साल इस वक्त भक्तों के आने का सिलसिला लगा रहता है। चैत्र नवरात्र से शुरू होने वाला मां पूर्णागिरी का यह मेला जून माह तक चलता है। मंदिर में पहुंचने के लिए टैक्सी द्वारा ठूलीगाड़ जाते हैं। जहां से मां पूर्णागिरी की पैदल यात्रा शुरू हो जाती है। ठूलीगाड़ से कुछ दूर हनुमान चट्टी पड़ता है। यहां आपको अस्थायी दुकान और आवासीय झोपड़ियां दिखाई देंगी। फिर तीन किमी. की चढ़ाई चढ़ने के बाद आप पूर्णागिरी मंदिर पहुंच जाएंगे। जहां से आप टनकपुर की बस्ती और कुछ नेपाली गांवों देख सकते हैं। यहां से काली नदी को भी ऊंचाई से देखा जा सकता है। यह मंदिर टनकपुर लखनऊ , दिल्ली , आगरा , देहरादून , कानपुर और अन्य जिलों के साथ सीधी बस सेवा द्वारा जुड़ा हुआ है मां पूर्णागिरी की पूजा के बाद लोग भी उसके वफादार भक्त ब्रह्म देव और नेपाल में स्थित सिद्घनाथ की पूजा करते हैं। उनकी पूजा किए बिना मां पूर्णागिरी के दर्शन पूरे नहीं माने जाते हैं।

 

 

गोल्ज्यू देवता का मंदिर

गोलू देवता को पूरे उत्तराखंड में न्याय का देवता माना जाता है। जो आदमी कोर्ट- कचहरी से उम्मीद खो बैठता है, वो अपनी अर्जी गोलू देवता के दरबार में लगा देता है अब अर्जी तो अर्जी है प्रॉपर तरीके से ही लगानी होती है। इसलिए स्टाम्प पेपर पर नोटरी वगेरह के साइन करा कर के गोलू देवता के नाम पर चिट्ठी लिखी जाती है। लेकिन कुछ लोगों का कहना ये भी है कि भगवान तो सबके मन की बात जानते हैं तो वो कागज के छोटे से टुकड़े में ही अपनी समस्या लिख कर लटका देते हैं।

 

 

 

गर्जिया देवी 

उत्तराखण्ड के प्रमुख देवी मंदिरों में शुमार है रामनगर का गिरिजा देवी मंदिर. माता पार्वती का यह मंदिर समूचे पर्वतीय अंचल में श्रद्धा और विश्वास का अद्भुत केंद्र माना जाता है. उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध शहर रामनगर से तकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर सुंदरखाल गांव के निकट एक छोटी पहाड़ी के ऊपर बने इस देवीधाम की आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सौंदर्य से यहां आने वाले हर श्रद्धालु का मन सहज ही मुग्ध हो जाता है. खूबसूरत वातावरण शांति एवं रमणीयता का अहसास दिलाता है. इस मंदिर में मां गिरिजा (पार्वती) की साढ़े चार फुट की सुंदर प्रतिमा विराजमान है। यह मंदिर पर्वतीय समाज के मध्य गर्जिया देवी मंदिर के नाम से भी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि वर्तमान गर्जिया मंदिर जिस टीले में स्थित है, वह टीला पौराणिककाल में कोसी नदी की बाढ़ में किसी ऊपरी क्षेत्र से बहकर आ रहा था, मंदिर को टीले के साथ बहते हुए आता देखकर भैरव देव द्वारा उसे रोकने का प्रयास किया।  तभी से गर्जिया देवी यहीं बस गयीं।

 

 



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