बुधवार, 19 जून 2019 | 12:41 IST
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परमार्थ निकेतन में मनाया विश्व अभिभावक दिवस


 

परमार्थ निकेतन में विश्व अभिभावक दिवस मनाया गया। इस अवसर पर सभी ऋषिकुमारों ने वेद मंत्रों के साथ माँ गंगा से अपने अभिभावकों के स्वस्थ जीवन की प्रार्थना की। आज की परमार्थ गंगा आरती इस सृष्टि को आगे बढ़ाने में अभिभावकों की निःस्वार्थ भागीदारी के लिये समर्पित की गयी।
 आज परमार्थ गंगा तट पर सुश्री गंगानन्दिनी त्रिपाठी जी ने स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और साध्वी भगवती सरस्वती जी की पावन उपस्थिति में सैकड़ों लोगों को योगाभ्यास कराया। एक माह तक चलने वाली मानस कथा का श्रवण करने आये श्रद्धालुओं को श्री रामकथा के साथ अनेक अमूल्य अवसर प्राप्त हो रहे है जिसमें योग, पूज्य संतों के दर्शन, संतों का मार्गदर्शन, सत्संग, कीर्तन और अन्य आध्यात्मिक गतिविधियों का आनन्द प्राप्त हो रहा है। वास्तव में यह मास उत्सव का मास है।
 
 परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि अभिभावक अर्थात माता-पिता हमेशा अपने बच्चों के साथ खड़े रहते है चाहे परिस्थितियाँ कुछ भी हो। बच्चों की जीवन यात्रा को सफल बनाने में निःस्वार्थ परिश्रम करते है अभिभावक। अपने बच्चों के निर्माण में माता-पिता जो बलिदान देते है वास्तव में वह सराहनीय है। स्वामी जी ने बताया कि मेरी झोपड़ी में एक छोटी सी चिड़ि़या है उसने कहीं-कहीं से रूई एकत्र कर घोसला बनाया है उसमें उसके बच्चे है उन बच्चों को वह पूरी सुरक्षा देते हुये वह रात-दिन वहीं पर बैठी रहती है और जब शाम-सुबह ठंड होती है तो उन बच्चों को गर्मी देने के लिये उनके उपर बैठ जाती है और जब उन्हे गर्मी लगे तो उनके उपर रखी रूई भी खोल देती है। दिन में एक दो बार उन बच्चों के पिता अपनी चोंच में दाना लाकर उस मादा चिड़िया को देता है कभी वह नर चिड़िया को देर हो जायें फिर भी वह मादा चिड़िया वहां से कहीं नहीं जाती है यह है माता-पिता का बच्चों के प्रति सुरक्षा और समर्पण का भाव। वास्तव में माता-पिता का त्याग सबसे बड़ा होता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने आज की युवा पीढ़ी को संदेश दिया कि माता-पिता का सम्मान करे और उनका दिल कभी न दुखायें। उन्होने कहा कि युवाओं कि जिम्मेदारी और कर्तव्य अपने अभिभावक के प्रति तो बनता ही है साथ ही उन प्राकृतिक संसाधानों को सुरक्षित रखने का भी है जिनके कारण हमें जीवन प्राप्त होता है; जीवनदायिनी प्राणवायु प्राप्त होती है; जल प्राप्त होता है उनकों प्रदूषण मुक्त रखना भी हम सभी का परम कर्तव्य है। 
आज की दिव्य मानस कथा में प्रसि़द्ध कथाव्यास श्री मुरलीधर जी ने कर्म की व्याख्या करते हुये कहा कि कर्म की गति गहन है । हम उसके मर्म को समझे और धर्मपूवर्क अपने जीवन को जिये। वहीं कर्म सत्कर्म है जिसे धर्मपूवर्क भेदभाव रहित सेवाकार्यो के साथ सब के लिये जिया जाये। उन्होने कहा कि रामकथा हमें समाज के हित और मानव के उत्थान की शिक्षा देती है। साथ ही भगवान श्री राम ने नारी उत्थान और नारी सम्मान का संदेश दिया है। श्री रामचन्द्र जी ने देवी अहिल्या, सबरी का उद्धार किया तथा माता कैकेयी के वनवास देने के आदेश को सहर्ष स्वीकार कर नारी को पूर्ण सम्मान और आदर दिया है।
जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि भारत का दर्शन, भारत के संस्कार और संस्कृति हमें माता-पिता द्वारा किया गया त्याग और बलिदान की शिक्षा देते है। उन्होने कहा कि हमारी प्रकृति भी हमें त्याग करना सिखाती है अब हमारा कर्तव्य है कि हम इन दिव्य गुणों को आत्मसात करें और इसके अनुसार जीवन जिये। साध्वी जी ने कहा कि योग वह नहीं जो हम करते है बल्कि योग तो वह है जो हम है। योग के माध्यम से हम स्वयं को सम्भाल ले और फिर उस शक्ति को समाज के कल्याण हेतु लगाये यही वास्तव में जीवन योग है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने आज सभी को अभिभावकों और प्रकृति की सेवा का संकल्प कराया।


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